अष्टम समुल्लास
सृष्टि विज्ञान, त्रैतवाद और ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का रहस्य।
अष्टम समुल्लास
अथाष्टमसमुल्लासारम्भः
अथ सृष्ट्युत्पत्तिस्थितिप्रलयविषयान् व्याख्यास्यामः
यो अ॒स्याध्य॑क्षः पर॒मे व्यो॑म॒न्त्सो अ॒ङ्ग वे॑द॒ यदि॑ वा॒ न वेद॑॥१॥
—ऋ॰। म॰ १०। सू॰ १२९। मं॰ ७॥
तु॒च्छ्येना॒भ्वपि॑हितं॒ यदासी॒त्तप॑स॒स्तन्म॑हि॒ना जा॑य॒तैक॑म्॥२॥
—ऋ॰। मं॰ [१०]। सू॰ [१२९]। मं॰ [३]॥
स दा॑धार पृथि॒वीं द्यामु॒तेमां कस्मै॑ दे॒वाय॑ ह॒विषा॑ विधेम॥३॥
—ऋ॰। म॰ १०। सू॰ १२१। मं॰ १॥
उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति॥४॥
—यजुः॰ अ॰ ३१। मं॰ २॥
यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद्विजिज्ञासस्व तद् ब्रह्मेति॥५॥
—तैत्तिरीयोपनि॰ [भृगुवल्ली। अनु॰ १]॥
हे (अङ्ग) मनुष्य! जिससे यह विविध सृष्टि प्रकाशित हुई है, जो धारण और प्रलयकर्त्ता है, जो इस जगत् का स्वामी, जिस व्यापक में यह सब जगत् उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय को प्राप्त होता है, सो परमात्मा है, उसको तू जान और दूसरे को सृष्टिकर्त्ता मत मान॥१॥
यह सब जगत् सृष्टि के पहिले अन्धकार से आवृत, रात्रिरूप में जानने के अयोग्य, आकाशरूप सब जगत् था। ‘तुच्छ’ अर्थात् अनन्त परमेश्वर के सामने एकदेशी आच्छादित था, पश्चात् परमेश्वर ने अपने महिमा (सामर्थ्य) से कारणरूप से कार्यरूप कर दिया॥२॥
हे मनुष्यो! जो सब सूर्यादि तेजस्वी पदार्थों का आधार और जो यह जगत् हुआ था, है और होगा, उसका एक अद्वितीय पति परमात्मा सृष्टि के पहिले=इस जगत् की उत्पत्ति के पूर्व विद्यमान था, और जिसने पृथिवी से लेकर सूर्य्यपर्यन्त जगत् को उत्पन्न किया है, उस परमात्मा देव की प्रेम से हम भक्ति करें॥३॥
हे मनुष्यो! जो सब में पूर्ण पुरुष और जो नाशरहित कारण और जीव का स्वामी, जो पृथिव्यादि जड़ और जीव से अतिरिक्त है, वही पुरुष इस सब भूत, भविष्यत् और वर्तमानस्थ जगत् को बनाने वाला है॥४॥
जिस परमात्मा की रचना से ये सब पृथिव्यादि भूत उत्पन्न होते हैं, जिससे जीवते और जिसमें प्रलय को प्राप्त होते हैं, वह ‘ब्रह्म’ है, उसके जानने की इच्छा करो॥५॥
जन्माद्यस्य यतः॥ —शारीरक सू॰ अ॰ १। [पा॰ १]। सू॰ २॥
जिससे इस जगत् का जन्म, स्थिति और प्रलय होता है, वही ‘ब्रह्म’ जानने के योग्य है।
प्रश्न—यह जगत् परमेश्वर से उत्पन्न हुआ है, वा अन्य से?
उत्तर—निमित्त कारण परमात्मा से उत्पन्न हुआ है, परन्तु इसका उपादान कारण प्रकृति है।
प्रश्न—क्या प्रकृति परमेश्वर ने उत्पन्न नहीं की?
उत्तर—नहीं। वह अनादि है।
प्रश्न—अनादि किसको कहते और कितने पदार्थ अनादि हैं?
उत्तर—[जिसका आदि कारण कोई न हो, उसे अनादि कहते हैं।] ईश्वर, जीव और जगत् का कारण, ये तीन ‘अनादि’ हैं?
प्रश्न—इसमें क्या प्रमाण है?
उत्तर—
द्वा सु॑प॒र्णा स॒युजा॒ सखा॑या समा॒नं वृ॒क्षं परि॑ षस्वजाते।
तयो॑र॒न्यः पिप्प॑लं स्वा॒द्वत्त्यन॑श्नन्न॒न्यो अ॒भि चा॑कशीति॥१॥
—ऋ॰। म॰ १। सू॰ १६४। मं॰ २०॥
शाश्व॒तीभ्यः॒ समा॑भ्यः॥२॥
—यजुः॰ अ॰ ४०।मं ८॥
(द्वा) जो ब्रह्म और जीव दोनों (सुपर्ण) चेतनता और पालनादि गुणों से कुछ सदृश (सयुजा) व्याप्य-व्यापक भाव से संयुक्त (सखाया) परस्पर मित्रतायुक्त, सनातन अनादि हैं; और (समानम्) वैसा ही (वृक्षम्) अनादि मूलरूप कारण और शाखारूप कार्ययुक्त वृक्ष अर्थात् जो स्थूल होकर प्रलय में छिन्न-भिन्न हो जाता है, वह तीसरा अनादि पदार्थ; इन तीनों के गुण, कर्म, स्वभाव भी अनादि हैं। (तयोरन्यः) इन जीव और ब्रह्म में से एक जो जीव है वह इस वृक्षरूप संसार में पापपुण्यरूप फलों को (स्वाद्वत्ति) अच्छे प्रकार भोगता है और दूसरा परमात्मा कर्मों के फलों को (अनश्नन्) न भोगता हुआ चारों ओर अर्थात् भीतर-बाहर सर्वत्र प्रकाशमान हो रहा है। जीव से ईश्वर, ईश्वर से जीव और दोनों से प्रकृति भिन्न-स्वरूप, तीनों ‘अनादि’ हैं॥१॥
(शाश्वती॰) अर्थात् अनादि सनातन जीवरूप प्रजा के लिये वेद द्वारा परमात्मा ने सब विद्याओं का बोध किया है॥२॥
अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते, जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्यः॥
यह उपनि॰ [श्वे॰ उप॰। अ॰ ४।मं॰ ५ का वचन है]॥
प्रकृति, जीव और परमात्मा तीनों ‘अज’ अर्थात् जिनका जन्म कभी नहीं होता, कभी ये जन्म नहीं लेते, अर्थात् ये तीन सब जगत् के कारण हैं, इनका कारण कोई नहीं। इस अनादि प्रकृति का भोग अनादि जीव करता हुआ फसता है और उसमें परमात्मा न फसता और न उसका भोग करता है।
ईश्वर और जीव का लक्षण ईश्वर-विषय में कह आये। अब प्रकृति का लक्षण लिखते हैं—
सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः प्रकृतेर्महान् महतोऽ-हङ्कारोऽहङ्कारात् पञ्चतन्मात्राण्युभयमिन्द्रियं पञ्चतन्मात्रेभ्यः स्थूलभूतानि पुरुष इति पञ्चविंशतिर्गणः॥ —यह सांख्यसूत्र है [अ॰ १।सू॰ ६१]
(सत्त्व) शुद्ध, (रजः) मध्य, (तमः) जाड्य अर्थात् जड़ता तीन वस्तु मिलकर जो एक संघात है, उसका नाम ‘प्रकृति’ है। उससे ‘महत्तत्व’ बुद्धि, उससे ‘अहङ्कार’, अहंकार से पांच ‘तन्मात्रा’, सूक्ष्म-भूत और दश इन्द्रियां तथा ग्यारहवां मन, पांच तन्मात्राओं से पृथिव्यादि पांच भूत, ये चौबीस और पच्चीसवां ‘पुरुष’ अर्थात् जीव और परमेश्वर है। इनमें से प्रकृति अविकारिणी; और महत्तत्व, अहङ्कार तथा पांच सूक्ष्म-भूत प्रकृति का कार्य्य और इन्द्रियां मन तथा स्थूल-भूतों का कारण हैं। और पुरुष न किसी की प्रकृति, उपादानकारण और न किसी का कार्य्य है।
प्रश्न—सदेव सोम्येदमग्र आसीत्॥१॥ [छां॰ उप॰। प्र॰ ६। खं॰ २॥ १॥] असद्वा इदमग्र आसीत्॥२॥ [तै॰ उप॰। ब्र॰ वल्ली। अनु॰ ७] आत्मा वा इदमग्र आसीत्॥३॥ [तु॰—बृ॰ उप॰। अ॰ १। ब्रा॰ ४। कं॰ १] ब्रह्म वा इदमग्र आसीत्॥४॥ —ये उपनिषदों के वचन हैं [शत॰ ११।१।११।१]॥
हे श्वेतकेतो! यह जगत् सृष्टि के पूर्व—सत्॥१॥ असत्॥२॥ आत्मा॥३॥ और ब्रह्मरूप था॥४॥ पश्चात्—तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति॥१॥ [छां॰ उप॰ प्र॰ ६। खं॰ २। मं॰ ३] सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति॥२॥ —यह तैत्तिरीयोपनिषद् [ब्र॰ वल्ली। अनु॰ ६] का वचन है॥ वही परमात्मा अपनी इच्छा से बहुरूप हो गया है॥१-२॥
सर्वं खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचन॥ —यह उपनिषद् का वचन है॥
जो यह जगत् है, वह सब निश्चय करके ब्रह्म है। उसमें दूसरे नाना प्रकार के पदार्थ कुछ भी नहीं किन्तु सब ब्रह्मरूप है।
उत्तर—क्यों इन वचनों का अनर्थ करते हो? क्योंकि उन्हीं उपनिषदों में—
सोम्यान्नेन शुङ्गेनापो मूलमन्विच्छाद्भिस्सोम्य शुङ्गेन तेजो-मूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः॥ —छान्दोग्य उपनि॰ [प्र॰ ६। खं॰ ८। मं॰ ४]॥
हे श्वेतकेतो! अन्नरूप पृथिवी कार्य्य से जलरूप मूल कारण को तू जान। कार्यरूप जल से तेजोरूप मूल और तेजोरूप कार्य से सद्रूप कारण जो नित्य प्रकृति है उसको जान। यही सत्यस्वरूप प्रकृति सब जगत् का मूल घर और स्थिति का स्थान है। यह सब जगत् सृष्टि के पूर्व असत् के सदृश और जीवात्मा, ब्रह्म और प्रकृति में लीन होकर वर्त्तमान था, अभाव न था।
और जो (सर्वं खलु॰) यह वचन ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानमती ने कुड़वां जोड़ा’ ऐसी लीला का है। क्योंकि—सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत॥ —छान्दोग्य॰ [प्र॰ ३। खं॰ १४। मं॰ १] और—नेह नानास्ति किंचन॥ —कठवल्ली [४। ११] का वचन है॥
जैसे शरीर के अङ्ग जब तक शरीर के साथ रहते हैं, तब तक काम के और अलग होने से निकम्मे हो जाते हैं, वैसे ही प्रकरणस्थ वाक्य सार्थक और प्रकरण से अलग करने वा किसी अन्य के साथ जोड़ने से अनर्थक हो जाते हैं। सुनो! इसका अर्थ यह है—
हे जीव! तू उस ब्रह्म की उपासना कर, जिस ब्रह्म से जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और जीवन होता है; जिसके बनाने और धारण से यह सब जगत् विद्यमान हुआ है, वा ब्रह्म से सहचरित है, उसको छोड़ दूसरे की उपासना न करनी। इस चेतनमात्र अखण्डैकरस ब्रह्मस्वरूप में नाना वस्तुओं का मेल नहीं है, किन्तु ये सब पृथक्-पृथक् स्वरूप में परमेश्वर के आधार में स्थित हैं।
प्रश्न—जगत् के कारण कितने होते हैं?
उत्तर—तीन। एक निमित्त, दूसरा उपादान, तीसरा साधारण। ‘निमित्त कारण’ उसको कहते हैं कि जिसके बनाने से कुछ बने, न बनाने से न बने, आप स्वयं बने नहीं, दूसरे को प्रकारान्तर बना देवे। दूसरा ‘उपादान कारण’ उसको कहते हैं जिसके विना कुछ न बने, वही अवस्थान्तर रूप होके बने और बिगड़े भी। तीसरा ‘साधारण कारण’ उसको कहते हैं कि जो बनाने में साधन और साधारण निमित्त हो।
निमित्त कारण दो हैं। एक—सब सृष्टि को कारण से बनाने, धारने और प्रलय करने तथा सबकी व्यवस्था रखनेवाला ‘मुख्य निमित्त कारण’ परमात्मा। दूसरा—परमेश्वर की सृष्टि में से पदार्थों को लेकर अनेकविध कार्य्यान्तर बनानेवाला ‘साधारण निमित्त कारण’ जीव।
उपादानकारण—‘प्रकृति’ ‘परमाणु’ जिसको सब संसार के बनाने की सामग्री कहते हैं। वह जड़ होने से आपसे आप न बन और न बिगड़ सकती है किन्तु दूसरे के बनाने से बनती और दूसरे के बिगाड़ने से बिगड़ती है। कहीं-कहीं जड़ के निमित्त से जड़ भी बन और बिगड़ भी जाता है, जैसे परमेश्वर के रचित बीज पृथिवी में गिरने और जल पाने से वृक्षाकार हो जाते हैं और अग्नि आदि जड़ के संयोग से बिगड़ भी जाते हैं। परन्तु इनका नियमपूर्वक बनना वा बिगड़ना परमेश्वर और जीव के आधीन है।
जब कोई वस्तु बनाई जाती है, तब जिन-जिन साधनों से अर्थात् ज्ञान, दर्शन, बल, हाथ और नाना प्रकार के औजार और दिशा, काल और आकाश ‘साधारण कारण’। जैसे घड़े को बनाने वाला कुम्हार निमित्त, मिट्टी उपादान; और दण्ड, चक्र आदि सामान्य निमित्त; दिशा, काल, आकाश, प्रकाश, आंख, हाथ, ज्ञान, क्रिया आदि निमित्त साधारण और निमित्त कारण भी होते हैं। इन तीन कारणों के विना कोई भी वस्तु नहीं बन सकती और न बिगड़ सकती।
प्रश्न—नवीन वेदान्ती केवल परमेश्वर ही को जगत् का ‘अभिन्न-निमित्तोपादानकारण’ मानते हैं—यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च। —यह [मुण्डक] उपनिषत् का वचन है [मु॰ १। ख॰ १। मं॰ ७] जैसे मकरी बाहर से कोई पदार्थ नहीं लेती, अपने ही में से तन्तु निकाल जाला बनाकर आप ही उसमें खेलती है, वैसे ब्रह्म अपने में से जगत् को बना, आप जगदाकार बन, आप ही क्रीडा कर रहा है। सो ब्रह्म इच्छा और कामना करता हुआ कि मैं ‘बहुरूप’ अर्थात् जगदाकार हो जाऊं। सङ्कल्पमात्र से सब जगद्रूप बन गया। क्योंकि—आदावन्ते च यन्नास्ति वर्त्तमानेऽपि तत्तथा॥ —यह माण्डूक्योनिषत् पर कारिका है [गौड़पादीयकारिका वैतथ्याख्य प्रकरण २।६, अलातशान्ताख्य प्रकरण ४।३१] जो प्रथम न हो, अन्त में न रहै, वह वर्त्तमान में भी नहीं है। किन्तु सृष्टि की आदि में जगत् न था, ब्रह्म था। प्रलय के अन्त में संसार न रहेगा, ब्रह्म रहेगा तो वर्त्तमान में सब जगत् ब्रह्म क्यों नहीं?
उत्तर—जो तुम्हारे कहने के अनुसार जगत् का उपादान कारण ब्रह्म होवे तो वह परिणामी, अवस्थान्तरयुक्त विकारी होजावे। और उपादानकारण के गुण-कर्म-स्वभाव कार्य में भी आते हैं—कारणगुणपूर्वकः कार्य्यगुणो दृष्टः॥ —वैशेषिक सू॰ [अ॰ २। आ॰ १। सू॰ २४]॥ उपादानकारण के सदृश कार्य में गुण होते हैं। तो ब्रह्म सच्चिदानन्द-स्वरूप; जगत् कार्य्यरूप से असत्, जड़ और आनन्दरहित; ब्रह्म अज और जगत् उत्पन्न हुआ है, ब्रह्म अदृश्य और जगत् दृश्य है, ब्रह्म अखण्ड और जगत् खण्डरूप है, जो ब्रह्म से पृथिव्यादि कार्य्य उत्पन्न होवे तो पृथिव्यादि कार्य के जड़ादि गुण ब्रह्म में भी होवें। अर्थात् जैसे पृथिव्यादि जड़ हैं, वैसा ब्रह्म भी जड़ हो जाय और जैसा परमेश्वर चेतन है, वैसा पृथिव्यादि कार्य्य भी चेतन होना चाहिये। और जो मकरी का दृष्टान्त दिया, वह तुम्हारे मत का साधक नहीं किन्तु बाधक है क्योंकि वह जड़रूप-शरीर तन्तु का उपादान और जीवात्मा निमित्तकारण है। और यह भी परमात्मा की अद्भुत रचना का प्रभाव है क्योंकि अन्य जन्तु के शरीर से जीव तन्तु नहीं निकाल सकता। वैसे ही व्यापक ब्रह्म ने अपने भीतर व्याप्य प्रकृति और परमाणुकारण से स्थूल जगत् को बना कर, बाहर स्थूलरूप कर, आप उसी में व्यापक रहके साक्षीभूत आनन्दमय हो रहा है।
और जो परमात्मा ने ‘ईक्षण’ अर्थात् दर्शन, विचार और कामना की कि मैं सब जगत् को बनाकर प्रसिद्ध होऊं, अर्थात् जब जगत् उत्पन्न होता है तभी जीवों के विचार, ज्ञान, ध्यान, उपदेश श्रवण में परमेश्वर प्रसिद्ध और बहुत स्थूल पदार्थों से सह वर्त्तमान होता है। जब प्रलय होता है तब परमेश्वर और मुक्तजीवों को छोड़के उसको कोई नहीं जानता। और जो वह कारिका है वह भ्रममूलक है। क्योंकि सृष्टि की आदि अर्थात् प्रलय में जगत् प्रसिद्ध नहीं था और सृष्टि के अन्त अर्थात् प्रलय के आरम्भ से जब तक दूसरी वार सृष्टि नहीं होती तब तक भी जगत् का कारण सूक्ष्म होकर अप्रसिद्ध रहता है। क्योंकि—तम॑ आसी॒त्तम॑सा गू॒ळ्हमग्रे॑॥१॥ —ऋग्वेद [म॰ १०। सू॰ १२९। मं॰ ३] का वचन है। आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः॥२॥ —मनु॰ [१।५]॥ यह सब जगत् सृष्टि के पहिले प्रलय में अन्धकार से आवृत्त आच्छादित था और प्रलयारम्भ के पश्चात् भी वैसा ही होता है। उस समय न किसी के जानने, न तर्क में लाने और न प्रसिद्ध चिह्नों से युक्त इन्द्रियों से जानने योग्य था, और न होगा, किन्तु वर्त्तमान में जाना जाता है और प्रसिद्ध चिह्नों से युक्त जानने के योग्य होता और यथावत् उपलब्ध है॥१-२॥
पुनः उस कारिकाकार ने वर्त्तमान में भी जगत् का अभाव लिखा सो सर्वथा अप्रमाण है, क्योंकि जिसको प्रमाता प्रमाणों से जानता और प्राप्त होता है, वह अन्यथा कभी नहीं हो सकता।
प्रश्न—जगत् के बनाने में परमेश्वर का क्या प्रयोजन है?
उत्तर—नहीं बनाने में क्या प्रयोजन है?
प्रश्न—जो न बनाता तो आनन्द में बना रहता और जीवों को भी सुख-दुःख प्राप्त न होता।
उत्तर—यह आलसी और दरिद्र लोगों की बातें हैं, पुरुषार्थी की नहीं। और जीवों को प्रलय में क्या सुख वा दुःख है? जो सृष्टि के सुख-दुःख की तुलना की जाय तो सुख कई गुना अधिक होता और बहुत-से पवित्रात्मा जीव मुक्ति के साधन कर मोक्ष के आनन्द को भी प्राप्त होते हैं। प्रलय में निकम्मे जैसे सुषुप्ति में पड़े रहते हैं, वैसे रहते हैं और प्रलय के पूर्व सृष्टि में जीवों के किये पाप-पुण्य कर्मों का फल ईश्वर कैसे दे सकता और जीव क्योंकर भोग सकते? जो तुमसे कोई पूछे कि आँख के होने में क्या प्रयोजन है? तुम यही कहोगे कि देखना। तो जो ईश्वर में जगत् की रचना करने का विज्ञान, बल और क्रिया है, उसका क्या प्रयोजन? विना जगत् की उत्पत्ति करने के दूसरा कुछ भी न कह सकोगे। और परमात्मा के न्याय, धारण, दया आदि गुण भी तभी सार्थक हो सकते हैं कि जब जगत् को बनावे। उसका अनन्त सामर्थ्य जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय और व्यवस्था करने ही से सफल है। जैसा नेत्र का स्वाभाविक गुण देखना है, वैसा परमेश्वर का स्वाभाविक गुण जगत् की उत्पत्ति करके सब जीवों को असंख्य पदार्थ देकर परोपकार करना है।
प्रश्न—बीज पहले है वा वृक्ष?
उत्तर—बीज। क्योंकि बीज, हेतु, निदान, निमित्त और कारण इत्यादि शब्द एकार्थवाचक हैं। कारण का नाम बीज होने से कार्य के प्रथम ही होता है।
प्रश्न—जब परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है तो वह कारण और जीव को भी उत्पन्न कर सकता है। जो नहीं कर सकता तो सर्वशक्तिमान् भी नहीं रह सकता?
उत्तर—सर्वशक्तिमान् शब्दार्थ पूर्व लिख आये हैं। परन्तु क्या सर्वशक्तिमान् वह कहाता है कि जो असम्भव बात को भी कर सके? जो असम्भव बात को भी कर सकता है अर्थात् जैसा कारण के विना कार्य्य को कर सकता है तो विना कारण दूसरे ईश्वर की उत्पत्ति कर और स्वयं मृत्यु को प्राप्त, जड, दुःखी, अन्यायकारी, अपवित्र और कुकर्मी आदि हो सकता है, वा नहीं? जो स्वाभाविक नियम, अर्थात् जैसा अग्नि उष्ण, जल शीतल और पृथिव्यादि सब जड़ों को विपरीत गुणवाले ईश्वर भी नहीं कर सकता। जैसे आप जड़ नहीं हो सकता, वैसे जड़ को चेतन भी नहीं कर सकता। और ईश्वर के नियम सत्य और पूरे हैं इसलिये परिवर्त्तन नहीं कर सकता। इसलिये ‘सर्वशक्तिमान्’ का अर्थ इतना ही है कि परमात्मा विना किसी के सहाय के अपने सब कार्य पूर्ण कर सकता है।
प्रश्न—ईश्वर साकार है वा निराकार? जो निराकार है तो विना हाथ आदि साधनों के जगत् को न बना सकेगा और जो साकार है तो कोई दोष नहीं आता।
उत्तर—ईश्वर निराकार है। जो साकार अर्थात् शरीरयुक्त है, वह ईश्वर ही नहीं। क्योंकि वह परिमित शक्तियुक्त, देश काल वस्तुओं में परिच्छिन्न, क्षुधा, तृषा, छेदन, भेदन, शीतोष्ण, ज्वर, पीडादि सहित होवे। उसमें जीव के विना ईश्वर के गुण कभी नहीं घट सकते। जैसे तुम और हम ‘ साकार’ अर्थात् शरीरधारी हैं, इससे त्रसरेणु, अणु, परमाणु और प्रकृति को अपने वश में नहीं ला सकते और न उन सूक्ष्म पदार्थों को पकड़ कर स्थूल बना सकते हैं, वैसे ही स्थूल देहधारी परमेश्वर भी उन सूक्ष्म पदार्थों से स्थूल जगत् नहीं बना सकता। जो परमेश्वर भौतिक—इन्द्रियगोलक हस्त-पादादि अवयवों से रहित है, परन्तु उसकी अनन्त शक्ति बल पराक्रम हैं, उनसे सब काम करता है, जो जीव और प्रकृति से कभी न हो सकते। जब वह प्रकृति से भी सूक्ष्म और उनमें व्यापक है, तभी उनको पकड़ कर जगदाकार कर देता है। और सर्वगत होने से सबका धारण और प्रलय भी कर सकता है।
प्रश्न—जैसे मनुष्यादि के मा-बाप साकार हैं, उनका सन्तान भी साकार होता है, जो ये निराकार होते, तो इनके लड़के भी निराकार होते, वैसे परमेश्वर निराकार हो, तो उसका बनाया जगत् भी निराकार होना चाहिये।
उत्तर—यह तुम्हारा प्रश्न अविद्या के=लड़के के समान है। क्योंकि हम अभी कह चुके हैं कि परमेश्वर जगत् का उपादानकारण नहीं, किन्तु निमित्तकारण है। और जो स्थूल होता है, वह प्रकृति और परमाणु जगत् का उपादानकारण है। और वे सर्वथा निराकार नहीं, किन्तु परमेश्वर से स्थूल और अन्य कार्य्य से सूक्ष्म आकार रखते हैं।
प्रश्न—क्या कारण के विना परमेश्वर कार्य्य को नहीं कर सकता?
उत्तर—नहीं। क्योंकि जिसका ‘अभाव’ अर्थात् जो वर्त्तमान ही नहीं है, उसका ‘भाव’ वर्त्तमान होना सर्वथा असम्भव है। जैसा कोई गपोड़ा हाँक दे कि “मैंने वन्ध्या के पुत्र और वन्ध्या की पुत्री का विवाह देखा, वह नरशृङ्ग का धनुष और वे दोनों खपुष्प की माला पहिरे हुए थे, मृगतृष्णिका के जल में स्नान करते और गन्धर्वनगर में रहते थे, वहां बद्दल के विना वर्षा, पृथिवी के विना सब अन्नों की उत्पत्ति आदि होती थी।” वैसा ही कारण के विना कार्य्य का होना असम्भव है। जैसे कोई कहे कि—“मम मातापितरौ न स्तोऽहमेवमेव जातः। मम मुखे जिह्वा नास्ति वदामि च” अर्थात् मेरे माता-पिता न थे, ऐसे ही मैं उत्पन्न हुआ हूं। मेरे मुख में जीभ नहीं है, परन्तु बोलता हूँ। “बाम्बी में सर्प नहीं था, निकल आया।” “मैं कहीं नहीं था, ये भी कहीं नहीं थे और हम सब जने आये हैं।” ऐसी असम्भव बात प्रमत्तगीत अर्थात् पागल लोगों की है।
प्रश्न—जो कारण के विना कार्य्य नहीं होता तो कारण का कारण कौन है?
उत्तर—जो केवल कारणरूप ही हैं, वे कार्य्य किसी के नहीं होते। और जो किसी का कारण और किसी का कार्य्य होता है, वह दूसरा कहाता है। जैसे पृथिवी घट और घर आदि का कारण और जल आदि का कार्य्य होता है। परन्तु जो आदिकारण प्रकृति है, वह अनादि है। मूले मूलाभावादमूलं मूलम्॥ —सांख्य सू॰ [अ॰ १। सू॰ ६७]॥ मूल का मूल अर्थात् कारण का कारण नहीं होता। इससे अकारण सब कार्य्यों का कारण होता है। क्योंकि किसी कार्य्य के आरम्भ समय के पूर्व तीनों कारण अवश्य होते हैं। जैसे कपड़े बनाने के पूर्व तन्तुवाय, रूई का सूत और नलिका आदि पूर्व वर्त्तमान होने से वस्त्र बनता है, वैसे जगत् की उत्पत्ति के पूर्व परमेश्वर, प्रकृति, काल और आकाश तथा जीवों के अनादि होने से इस जगत् की उत्पत्ति होती है। यदि इन में से एक भी न हो तो जगत् भी न हो।
प्रश्न—इस जगत् का कर्ता न था, न है और न होगा किन्तु अनादि काल से यह जैसा का वैसा बना है। न कभी इसकी उत्पत्ति हुई, न कभी विनाश होगा।
उत्तर—विना कर्त्ता के कोई भी क्रिया वा क्रियाजन्य पदार्थ नहीं बन सकता। जिन पृथिवी आदि पदार्थों में संयोग-विशेष से रचना दीखती है, वे अनादि कभी नहीं हो सकते। और जो संयोग से बनता है, वह संयोग के पूर्व नहीं होता और वियोग के अन्त में नहीं रहता। जो तुम इसको न मानो तो कठिन से कठिन पाषाण, हीरा और फोलाद आदि तोड़ के, टुकड़े कर, गला वा भस्म कर देखो कि इनमें परमाणु पृथक्-पृथक् मिले हैं वा नहीं? जो मिले हैं तो वे समय पाकर अलग-अलग भी अवश्य होते हैं॥१०॥
प्रश्न—अनादि ईश्वर कोई नहीं किन्तु जो योगाभ्यास से अणिमादि ऐश्वर्य को प्राप्त होकर सर्वज्ञादिगुणयुक्त केवल-ज्ञानी होता है, वही जीव ‘ईश्वर’ ‘परमेश्वर’ कहाता है।
उत्तर—जो अनादि ईश्वर जगत् का स्रष्टा न हो, तो साधनों से सिद्ध होने वाले जीवों का आधार जीवनरूप जगत्, शरीर और इन्द्रियों के गोलक कैसे बनते? इनके विना जीव साधन ही न कर सकता। जब साधन न होते, तो सिद्ध कहां से होता? जीव चाहै जैसा साधन कर सिद्ध होवे, तो भी ‘ईश्वर’ जो कि स्वयं सनातन अनादि सिद्ध है, जिसमें अनन्त सिद्धि हैं,—उसके तुल्य कोई भी जीव नहीं हो सकता। क्योंकि जीव का परम अवधि तक ज्ञान बढ़े, तो भी परिमित ज्ञान और सामर्थ्यवाला होता है। अनन्त ज्ञान और सामर्थ्यवाला कभी नहीं हो सकता। देखो! कोई भी योगी आज तक ईश्वरकृत सृष्टिक्रम को बदलनेहारा नहीं हुआ है, और न होगा। जैसा अनादि-सिद्ध परमेश्वर ने नेत्र से देखने और कानों से सुनने का निबन्ध किया है, इसको कोई भी योगी बदल नहीं सका है। जीव ‘ईश्वर’ कभी नहीं हो सकता।
प्रश्न—कल्प-कल्पान्तर में ईश्वर सृष्टि विलक्षण-विलक्षण बनाता है, अथवा एकसी?
उत्तर—जैसी कि अब है, वैसी पहले थी और आगे होगी, भेद नहीं करता। सू॒र्या॒च॒न्द्र॒मसौ॑ धा॒ता य॑थापू॒र्वम॑कल्पयत्। दिवं॑ च पृथि॒वीं चा॒न्तरि॑क्ष॒मथो॒ स्वः॑॥ —ऋ॰। म॰ १०। सू॰ १९० [मं॰ ३]॥ ‘धाता’ परमात्मा ने जिस प्रकार के सूर्य, चन्द्र, द्यौ, भूमि, अन्तरिक्ष और तत्रस्थ सुख विशेष पदार्थ पूर्वकल्प में रचे थे, वैसे ही इस कल्प अर्थात् इस सृष्टि में रचे हैं, तथा सब लोक-लोकान्तरों में भी बनाये हैं। भेद किंचित्-मात्र नहीं होता।
प्रश्न—जिन वेदों का इस लोक में प्रकाश है, उन्हीं वेदों का उन लोकों में भी प्रकाश है, वा नहीं?
उत्तर—उन्हीं का है। जैसे एक राजा की राज्यव्यवस्था, नीति सब देशों में समान होती है, उसी प्रकार परमात्मा राजराजेश्वर की वेदोक्त नीति अपने सृष्टिरूप सब राज्य में एक-सी है।
प्रश्न—जब ये जीव और प्रकृतिस्थ तत्त्व अनादि और ईश्वर के बनाये नहीं हैं, तो ईश्वर का अधिकार भी इन पर न होना चाहिये, क्योंकि सब हुए?
उत्तर—जैसे राजा और प्रजा समकाल में होते हैं और राजा के आधीन प्रजा होती है, वैसे ही परमेश्वर के आधीन जीव और जड़ पदार्थ हैं। जब परमेश्वर सब सृष्टि का बनाने, जीवों के कर्मफलों के देने, सबका यथावत् रक्षक और अनन्त सामर्थ्य वाला है, तो अल्प सामर्थ्य [जीव] भी और जड़ पदार्थ उसके आधीन क्यों न हों? इसलिये जीव कर्म करने में स्वतन्त्र, परन्तु कर्मों के फल भोगने में ईश्वर की व्यवस्था से परतन्त्र हैं, वैसे ही सर्वशक्तिमान् सृष्टि, संहार और पालन सब विश्व का कर रहा है। इसके आगे विद्या, अविद्या, बन्ध और मोक्ष-विषय में लिखा जायगा। यह आठवां समुल्लास पूरा हुआ। इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिककृते सत्यार्थप्रकाशे सुभाषाविभूषिते सृष्ट्युत्पत्तिस्थितिप्रलय- विषयेऽष्टमः समुल्लासः सम्पूर्णः॥८॥
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