नवम समुल्लास
विद्या-अविद्या का स्वरूप, बन्धन के कारण और मुक्ति का मार्ग।
नवम समुल्लास
अथ नवमसमुल्लासारम्भः
विद्या, अविद्या, बन्ध और मोक्ष
अवि॑द्यया मृ॒त्युं ती॒र्त्वा वि॒द्यया॒ऽमृत॑मश्नुते॥
—यजुः॰ अ॰ ४०। मं॰ १४॥
विद्या वह है जिससे पदार्थों का यथार्थ स्वरूप बोध हो। अविद्या वह है जिससे अनित्य में नित्य, दुःख में सुख और अनात्मा में आत्मा की बुद्धि हो।
बन्धन अज्ञान और अधर्म के कारण होता है। जीव अल्पज्ञ है, इसलिए वह पाप करता है और जन्म-मरण के चक्र में फंस जाता है।
मोक्ष का अर्थ है दुखों से पूर्ण निवृत्ति और परमानन्द परमेश्वर की प्राप्ति। मुक्त जीव ब्रह्म में रहकर स्वतंत्र विचरण करता है।
मोक्ष के साधन—सत्य भाषण, परोपकार, योगाभ्यास, ईश्वरोपासना और विद्या की प्राप्ति। जो जीवन्मुक्त है, वही मृत्यु के बाद परमपद को प्राप्त होता है।
मुक्ति में जीव के पास भौतिक शरीर नहीं होता, वह अपनी स्वाभाविक शक्तियों से आनंद भोगता है।
इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिनिर्मिते सत्यार्थप्रकाशे
सुभाषाविभूषिते विद्याऽविद्याबन्धमोक्षविषये
नवमः समुल्लासः सम्पूर्णः॥९॥
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