षष्ठ समुल्लास
आदर्श शासन व्यवस्था, दण्डनीति और राजा के कर्तव्य।
षष्ठ समुल्लास
अथ षष्ठसमुल्लासारम्भः
राजधर्म और शासन व्यवस्था
इस समुल्लास में राजा, राजसभा और शासन के नियमों का वर्णन है। राजा अकेला शासन नहीं कर सकता, उसे विद्वानों की सभा के अधीन होना चाहिए।
राजधर्मान् प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नृपः। संभवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा॥१॥ —मनु॰ [७।१]
राजा को धर्मनिष्ठ, जितेन्द्रिय और प्रजापालक होना चाहिए। शासन के लिए तीन सभाएँ होनी चाहिए—विद्यार्य्य सभा, धर्मार्य्य सभा और राजार्य्य सभा।
दण्ड की व्यवस्था बहुत महत्वपूर्ण है। दण्ड ही वास्तव में राजा है, दण्ड ही धर्म का रक्षक है। 'दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वाः'। यदि दण्ड न हो, तो दुष्ट लोग बलवान हो जाएँगे।
कर (Tax) की व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि प्रजा को कष्ट न हो। जैसे जोंक, बछड़ा और मधुमक्खी थोड़ा-थोड़ा रस, दूध और शहद लेते हैं, वैसे ही राजा को प्रजा से उचित भाग लेना चाहिए।
सेना और युद्ध के नियम भी बताए गए हैं। युद्ध में कभी कायरता न दिखाएँ, पीठ न फेरें। राजा का मुख्य लक्ष्य अपनी प्रजा की सुख-समृद्धि और देश की रक्षा होना चाहिए।
इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिककृते सत्यार्थप्रकाशे
सुभाषाविभूषिते राजधर्मविषये
षष्ठः समुल्लासः सम्पूर्णः॥६॥
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