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सत्यार्थ प्रकाशषष्ठ समुल्लास
राजधर्म

षष्ठ समुल्लास

आदर्श शासन व्यवस्था, दण्डनीति और राजा के कर्तव्य।

षष्ठसमुल्लास

अथ षष्ठसमुल्लासारम्भः

अथ राजप्रजाधर्मान् व्याख्यास्यामः

राजधर्मान् प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नृपः।
संभवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा॥१॥
ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि।
सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्त्तव्यं परिरक्षणम्॥२॥ —मनु॰ [७।१-२]॥

अब मनुजी ऋषियों से कहते हैं कि चारों वर्ण और चार आश्रमों के व्यवहार-कथन के पश्चात् राजधर्मों को कहेंगे, कि जिस प्रकार का राजा होना चाहिये, और जैसे इसके होने का सम्भव और जैसे इसको परमसिद्धि प्राप्त होवे, वह प्रकार सब कहते हैं॥१॥

कि जैसा परम विद्वान् ब्राह्मण होता है, वैसा विद्वान् सुशिक्षित होकर क्षत्रिय को योग्य है कि इस सब राज्य की रक्षा न्याय से यथावत् करे॥२॥

उसका प्रकार यह है—

त्रीणि॑ राजाना वि॒दथे॑ पु॒रूणि॒ परि विश्वा॑नि भूषथः॒ सदां॑सि॥
—ऋ॰ मं॰ ३। सू॰ ३८। मं॰ ६॥

ईश्वर उपदेश करता है कि (राजाना) राजा और प्रजा के पुरुष मिलके (विदथे) सुखप्राप्ति और विज्ञानवृद्धिकारक राजा-प्रजा के सम्बन्धरूप व्यवहार में (त्रीणि सदांसि) तीन सभा अर्थात् विद्यार्य्यसभा, धर्मार्य्यसभा और राजार्य्यसभा नियत करके (पुरूणि) बहुत प्रकार के (विश्वानि) समग्र प्रजासम्बन्धी मनुष्यादि प्राणियों को (परिभूषथः) सब ओर से विद्या, स्वातन्त्र्य, धर्म, सुशिक्षा और धनादि से अलंकृत करें।

तं स॒भा च॒ समि॑तीश्च॒ सेना॑ च॒॥१॥ —अथर्व॰ कां॰ १५। अनु॰ २। व॰ ९। मं॰ २॥

सभ्य॑ स॒भां मे॑ पाहि॒ ये च॒ सभ्याः॑ सभा॒सदः॑॥२॥ —अथर्व॰ कां॰ १९। अनु॰ ७। व॰ ५५। मं॰ ६॥

(तम्) उस राजधर्म को (सभा च) तीनों सभा (समितिश्च) संग्रामादि की व्यवस्था, और (सेना च) सेना मिलकर पालन करें॥१॥

सभासद् और राजा को योग्य है कि राजा सब सभासदों को आज्ञा दे कि—हे (सभ्य) सभा के योग्य मुख्य सभासद्! तू (मे) मेरी (सभाम्) सभा की धर्मयुक्त व्यवस्था की (पाहि) रक्षाकर, और (ये च) जो (सभ्याः) सभा के योग्य (सभासदः) सभासद् हैं, वे भी सभा की व्यवस्था का पालन किया करें॥२॥

इसका अभिप्राय यह है कि एक को स्वतन्त्र राज्य का अधिकार न देना चाहिए किन्तु राजा जो सभापति तदधीन सभा, सभाधीन राजा, राजा और सभा प्रजा के आधीन, और प्रजा राजसभा के आधीन रहे। यदि ऐसा न करोगे तोः—

राष्ट्रमेव विश्याहन्ति तस्माद्राष्ट्री विशं घातुकः। विशमेव राष्ट्रा-याद्यां करोति तस्माद्राष्ट्री विशमत्ति न पुष्टं पशुं मन्यत इति॥१॥
—शत॰। का॰ १३। [प्रपा॰] २। ब्रा॰ ३। [कं॰ ७-८]॥

जो प्रजा से स्वतन्त्र स्वाधीन राजवर्ग रहै तो राजपुरुष (राष्ट्रमेव विश्याहन्ति) राज्य में प्रवेश करके प्रजा का नाश किया करें। जिसलिये अकेला राजा स्वाधीन वा उन्मत्त होके (राष्ट्री विशं घातुकः) प्रजा का नाशक होता है अर्थात् (विशमेव राष्ट्रायाद्यां करोति) वह राजा प्रजा को खाये जाता (अत्यन्त पीडा करता) है, इसलिये किसी एक को राज्य में स्वाधीन न करना चाहिए। जैसे—सिंह वा मांसाहारी पुष्ट पशु को मार कर खा लेते हैं, वैसे (राष्ट्री विशमत्ति) स्वतन्त्र राजा प्रजा का नाश करता है, अर्थात् किसी को अपने से अधिक न होने देता। श्रीमान् को लूट, खूँच, अन्याय से दण्ड देके अपना प्रयोजन पूरा करेगा। इसलिए—

इन्द्रो॑ जयाति॒ न परा॑ जयाता अधिरा॒जो राज॑सु राजयातै।
च॒र्कृत्य॒ ईड्यो॒ वन्द्य॑श्चोप॒सद्यो॑ नम॒स्योऽभवे॒ह॥१॥
—अथर्व॰ कां॰ ६। अनु॰ १०। व॰ ९८। मं॰ १॥

हे मनुष्यो! जो (इह) इस मनुष्य के समुदाय में (इन्द्रः) परम ऐश्वर्य का कर्त्ता, शत्रुओं को (जयाति) जीत सके (न पराजयातै) जो शत्रुओं से पराजित न हो (राजसु) राजाओं में (अधिराजः) सर्वोपरि विराजमान (राजयातै) प्रकाशमान हो (चर्कृत्यः) सभापति होने को अत्यन्त योग्य (ईड्यः) प्रशंसनीय गुणकर्मस्वभावयुक्त (वन्द्यः) सत्करणीय (चोपसद्यः) समीप जाने और शरण लेने योग्य (नमस्यः) सबका माननीय (भव) होवे, उसी को सभापति राजा करें।

इ॒मं दे॑वाऽअसप॒त्नꣳ सु॑वध्वं मह॒ते क्ष॒त्राय॑ मह॒ते ज्यैष्ठ्या॑य
मह॒ते जान॑राज्या॒येन्द्र॑स्येन्द्रि॒याय॑॰॥१॥ —यजुः॰ अ॰ ९। मं॰ ४०॥

हे (देवाः) विद्वानो! राजप्रजाजनो! तुम (इमम्) इस प्रकार के पुरुष को (महते क्षत्राय) बड़े चक्रवर्त्तिराज्य (महते ज्यैष्ठ्याय) सबसे बड़े होने (महते जानराज्याय) बड़े-बड़े विद्वानों से युक्त राज्य पालने, और (इन्द्रस्येन्द्रियाय) परम ऐश्वर्ययुक्त राज्य और धन के पालने के लिए (असपत्नꣳसुवध्वम्) सम्मति करके सर्वत्र पक्षपातरहित, पूर्णविद्या-विनययुक्त सबके मित्र सभापति राजा को सर्वाधीश मानके सब भूगोल को शत्रुरहित करो। और—

स्थि॒रा वः॑ स॒न्त्वायु॑धा परा॒णुदे॑ वी॒ळू उ॒त प्र॑ति॒ष्कभे॑।
यु॒ष्माक॑मस्तु॒ तवि॑षी॒ पनी॑यसी॒ मा मर्त्य॑स्य मा॒यिनः॑॥१॥
—ऋ॰ मं॰ १। सू॰ ३९। मं॰ २॥

ईश्वर उपदेश करता है कि हे राजपुरुषो! (वः) तुम्हारे (आयुधा) आग्नेयादि अस्त्र ‘शतघ्नी’ तोप, ‘भुशुण्डी’ बन्दूक, धनुष-बाण, ‘असि’ तलवार आदि शस्त्र; शत्रुओं के (पराणुदे) पराजय करने (उत प्रतिष्कभे) और रोकने के लिए (वीळू) प्रशंसित और (स्थिरा) दृढ़ (सन्तु) हों (युष्माकम्) और तुम्हारी (तविषी) सेना (पनीयसी) प्रशंसनीय (अस्तु) होवे कि जिससे तुम सदा विजयी होओ, परन्तु (मा मर्त्यस्य मायिनः) जो निन्दित अन्यायरूप काम करता है, उसके लिये पूर्व चीजें मत हों।

अर्थात् जब तक मनुष्य धार्मिक रहते हैं तभी तक राज्य बढ़ता रहता है और जब दुष्टाचारी होते हैं तब नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है। महाविद्वानों को विद्यासभाऽधिकारी, धार्मिक विद्वानों को धर्मसभा के अधिष्ठाता और प्रशंसनीय धार्मिक पुरुषों को राजसभा के सभासद् और सब के बीच में जो उत्तम पुरुष हो, उसको राजा सभा का पतिरूप मानके सब प्रकार से उन्नति करें। तीनों सभाओं की सम्मति से राजनीति के उत्तम नियम और नियमों के आधीन सब लोग वर्त्तें, सब के हितकारक कामों में सम्मति करें। परसर्वहित करने के लिए परतन्त्र और धर्मयुक्त कामों में जो-जो निज के काम हैं, [उन-उन में] स्वतन्त्र रहैं।

सभापति के गुण

इन्द्राऽनिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च।
चंद्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः॥१॥
तपत्यादित्यवच्चैष चक्षूंषि च मनांसि च।
न चैनं भुवि शक्नोति कश्चिदप्यभिवीक्षितुम्॥२॥
सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कः सोमः स धर्मराट्।
स कुबेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रभावतः॥३॥
— मनु॰ [७।४, ६, ७]॥

वह सभेश राजा ‘इन्द्र’ विद्युत् के तुल्य शीघ्र ऐश्वर्यकर्त्ता, ‘वायु’ के समान सब के प्राणवत् प्रिय और हृदय की बात जाननेहारा, ‘यम’ पक्षपातरहित-न्यायाधीश के समान वर्त्तनेवाला, ‘सूर्य्य’ के समान न्याय, धर्म, विद्या का प्रकाशक, अन्धकार अर्थात् अविद्या अन्याय का निरोधक, ‘अग्नि’ के समान दुष्टों को भस्म करनेहारा, ‘वरुण’ अर्थात् बांधने वाले के सदृश दुष्टों को अनेक प्रकार से बाँधने वाला ‘चंद्र’ के तुल्य श्रेष्ठ पुरुषों को आनन्ददाता, ‘धनाध्यक्ष’ के समान कोशों का पूर्ण करने वाला सभापति होवे॥१॥

जो सूर्यवत् प्रतापी सबके बाह्य और भीतर मनों को अपने तेज से तपानेहारा, जिसको पृथिवी में करड़ी दृष्टि से देखने को कोई भी समर्थ न हो॥२॥

और जो अपने प्रभाव से अग्नि, वायु, सूर्य्य, सोम, धर्मप्रकाशक, धनवर्द्धक, दुष्टों का बन्धनकर्त्ता, बड़े ऐश्वर्यवाला होवे, वही ‘सभाध्यक्ष’ ‘सभेश’ होवे॥३॥

सच्चा राजा कौन है

स राजा पुरुषो दण्डः स नेता शासिता च सः।
चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभूः स्मृतः॥१॥
दण्डः शास्ति प्रजाः सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति।
दण्डः सुप्तेषु जागर्त्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधाः॥२॥
समीक्ष्य स धृतः सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजाः।
असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वतः॥३॥
दुष्येयुः सर्ववर्णाश्च भिद्येरन्सर्वसेतवः।
सर्वलोकप्रकोपश्च भवेद्दण्डस्य विभ्रमात्॥४॥
यत्र श्यामो लोहिताक्षो दण्डश्चरति पापहा।
प्रजास्तत्र न मुह्यन्ति नेता चेत्साधु पश्यति॥५॥
तस्याहुः संप्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्।
समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम्॥६॥
तं राजा प्रणयन्सम्यक् त्रिवर्गेणाभिवर्द्धते।
कामात्मा विषमः क्षुद्रो दण्डेनैव निहन्यते॥७॥
दण्डो हि सुमहत्तेजो दुर्धरश्चाकृतात्मभिः।
धर्माद्विचलितं हन्ति नृपमेव सबान्धवम्॥८॥
सोऽसहायेन मूढेन लुब्धेनाकृतबुद्धिना।
न शक्यो न्यायतो नेतुं सक्तेन विषयेषु च॥९॥
शुचिना सत्यसन्धेन यथाशास्त्रानुसारिणा।
प्रणेतुं शक्यते दण्डः सुसहायेन धीमता॥१०॥
—मनु॰ अ॰ ७। [१७-१९, २४-२८, ३०-३१]॥

जो दण्ड है वही पुरुष राजा, वही न्याय का प्रचारकर्त्ता, और सबका शासनकर्त्ता, वही चार वर्ण और चार आश्रमों के धर्म का ‘प्रतिभू’ अर्थात् जामिन है॥१॥

वही प्रजा का शासनकर्त्ता, सब प्रजा का रक्षक, सोते हुए प्रजास्थ मनुष्यों में जागता है, इसीलिये बुद्धिमान् लोग दण्ड ही को ‘धर्म’ कहते हैं॥२॥

जो दण्ड अच्छे प्रकार विचार से धारण किया जाय तो वह सब प्रजा को आनन्दित कर देता है और जो विना विचारे चलाया जाय तो सब ओर से राजा का विनाश कर देता है॥३॥

विना दण्ड के सब वर्ण दूषित और सब मर्यादा छिन्न-भिन्न हो जांय। दण्ड के यथावत् न होने से सब लोगों का प्रकोप हो जावे॥४॥

जहाँ कृष्णवर्ण रक्तनेत्र भयङ्कर पुरुष के समान पापों का नाश करनेहारा दण्ड विचरता है, वहां प्रजा मोह को प्राप्त न होके आनन्दित होती है, परन्तु जो दण्ड का चलानेवाला पक्षपातरहित विद्वान् हो तो॥५॥

जो उस दण्ड का चलानेवाला सत्यवादी; विचार के करनेहारा; बुद्धिमान्; धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि करने में पण्डित राजा है; उसी को उस दण्ड का चलानेहारा विद्वान् लोग कहते हैं॥६॥

जो दण्ड को अच्छे प्रकार राजा चलाता है; वह धर्म, अर्थ और काम की सिद्धि से बढ़ता है; और जो विषय में लम्पट, टेढ़ा, ईर्ष्या करनेहारा, क्षुद्र, नीचबुद्धि न्यायाधीश, राजा होता है; वह दण्ड से ही मारा जाता है॥७॥

जब दण्ड बड़ा तेजोमय है, उसको अविद्वान् अधर्मात्मा धारण नहीं कर सकता, तब वह दण्ड धर्म से रहित कुटुम्बसहित राजा ही का नाश कर देता है॥८॥

क्योंकि जो आप्त पुरुषों के सहाय, विद्या, सुशिक्षा से रहित, विषयों में आसक्त मूढ़ है; वह न्याय से दण्ड को चलाने में समर्थ कभी नहीं हो सकता॥९॥

और जो पवित्र आत्मा, सत्याचार और सत्पुरुषों का सङ्गी, यथावत् नीतिशास्त्र के अनुकूल चलनेहारा, श्रेष्ठ पुरुषों के सहाय से युक्त बुद्धिमान् है, वही न्यायरूपी दण्ड को चलाने में समर्थ होता है॥१०॥ इसलिये—

सैन्यापत्यं च राज्यं च दण्डनेतृत्वमेव च।
सर्वलोकाधिपत्यं च वेदशास्त्रविदर्हति॥१॥
दशावरा वा परिषद् यं धर्मं परिकल्पयेत्।
त्र्यवरा वापि वृत्तस्था तं धर्मं न विचालयेत्॥२॥
त्रैविद्यो हैतुकस्तर्की नैरुक्तो धर्मपाठकः।
त्रयश्चाश्रमिणः पूर्वे परिषत्स्याद्दशावरा॥३॥
ऋग्वेदविद्यजुर्विच्च सामवेदविदेव च।
त्र्यवरा परिषज्ज्ञेया धर्मसंशयनिर्णये॥४॥
एकोऽपि वेदविद्धर्मं यं व्यवस्येद् द्विजोत्तमः।
स विज्ञेयः परो धर्मो नाज्ञानामुदितोऽयुतैः॥५॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम्।
सहस्रशः समेतानां परिषत्त्वं न विद्यते॥६॥
यं वदन्ति तमोभूता मूर्खा धर्ममतद्विदः।
तत्पापं शतधा भूत्वा तद्वक्तॄननुगच्छति॥७॥
—मनु॰ [१२।१००, ११०-११५]॥

सब सेना और सेनापतियों के ऊपर राज्याधिकार, दण्ड देने की व्यवस्था के सब कार्यों का आधिपत्य, और सबके ऊपर वर्त्तमान सर्वाधीश राजाधिकार, इन चारों अधिकारों में सम्पूर्ण वेद-शास्त्रों में प्रवीण, पूर्ण विद्यावाले, धर्मात्मा, जितेन्द्रिय, सुशील जनों को स्थापित करना चाहिये। अर्थात् मुख्य सेनापति, मुख्य राज्याधिकारी, मुख्य न्यायाधीश, प्रधान और राजा ये चार सब विद्याओं में पूर्ण विद्वान् होने चाहियें॥१॥

न्यून से न्यून दश विद्वानों अथवा बहुत न्यून हों तो तीन विद्वानों की सभा जैसी व्यवस्था करे, उस ‘धर्म’ अर्थात् व्यवस्था का उल्लङ्घन कोई भी न करे॥२॥

इस सभा में चारों वेद, न्यायशास्त्र, निरुक्त, धर्मशास्त्र आदि के वेत्ता विद्वान् सभासद् हों परन्तु वे ब्रह्मचारी, गृहस्थ और वानप्रस्थ हों तब वह सभा कि जिसमें दश विद्वानों से न्यून न होने चाहियें॥३॥

और जिस सभा में ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद के जानने वाले तीन सभासद् होके व्यवस्था करें, उस सभा की की हुई व्यवस्था को भी कोई उल्लङ्घन न करे॥४॥

यदि एक अकेला सब वेदों का जाननेहारा द्विजों में उत्तम संन्यासी जिस धर्म की व्यवस्था करे, वही श्रेष्ठ धर्म है, क्योंकि अज्ञानियों के सहस्रों, लाखों और करोड़ों मिलके जो कुछ व्यवस्था करें, उसको कभी न मानना चाहिये॥५॥

जो ब्रह्मचर्य-सत्यभाषणादि-व्रत, वेदविद्या वा विचार से रहित, जन्ममात्र से शूद्रवत् वर्त्तमान हैं उन सहस्रों मनुष्यों के मिलने से भी सभा नहीं कहाती॥६॥

अविद्यायुक्त मूर्ख, वेदों के न जानने वाले मनुष्य जिस धर्म को कहैं, उसको कभी न मानना चाहिये। क्योंकि जो मूर्खों के कहे हुए धर्म के अनुसार चलते हैं, उनके पीछे सैकड़ों प्रकार के पाप लग जाते हैं॥७॥

इसलिये तीनों अर्थात् विद्यासभा, धर्मसभा और राजसभाओं में मूर्खों को कभी भरती न करें। किन्तु सदा विद्वान् और धार्मिक पुरुषों का स्थापन करे।

त्रैविद्येभ्यस्त्रयीं विद्यां दण्डनीतिं च शाश्वतीम्।
आन्वीक्षिकीं चात्मविद्यां वार्त्तारम्भाँश्च लोकतः॥१॥
इन्द्रियाणां जये योगं समातिष्ठेद्दिवानिशम्।
जितेन्द्रियो हि शक्नोति वशे स्थापयितुं प्रजाः॥२॥
दश कामसमुत्थानि तथाष्टौ क्रोधजानि च।
व्यसनानि दुरन्तानि प्रयत्नेन विवर्जयेत्॥३॥
कामजेषु प्रसक्तो हि व्यसनेषु महीपतिः।
वियुज्यतेऽर्थधर्माभ्यां क्रोधजेष्वात्मनैव तु॥४॥
मृगयाक्षो दिवास्वप्नः परिवादः स्त्रियो मदः।
तौर्य्यत्रिकं वृथाट्या च कामजो दशको गणः॥५॥
पैशुन्यं साहसं द्रोह ईर्ष्यासूयार्थदूषणम्।
वाग्दण्डजं च पारुष्यं क्रोधजोऽपि गणोऽष्टकः॥६॥
द्वयोरप्येतयोर्मूलं यं सर्वे कवयो विदुः।
तं यत्नेन जयेल्लोभं तज्जावेतावुभौ गणौ॥७॥
पानमक्षाः स्त्रियश्चैव मृगया च यथाक्रमम्।
एतत्कष्टतमं विद्याच्चतुष्कं कामजे गणे॥८॥
दण्डस्य पातनं चैव वाक्पारुष्यार्थदूषणे।
क्रोधजेऽपि गणे विद्यात्कष्टमेतत्त्रिकं सदा॥९॥
सप्तकस्यास्य वर्गस्य सर्वत्रैवानुषङ्गिणः।
पूर्वं पूर्वं गुरुतरं विद्याद् व्यसनमात्मवान्॥१०॥
व्यसनस्य च मृत्योश्च व्यसनं कष्टमुच्यते।
व्यसन्यधोऽधो व्रजति स्वर्यात्यव्यसनी मृतः॥११॥
—मनु॰ [७।४३-५३]॥

राजा और राजसभा के सभासद् तब हो सकते हैं कि जब चारों वेदों की कर्मोपासना-ज्ञान-विद्याओं के जानने वालों से तीनों विद्या, सनातन दण्डनीति, न्यायविद्या, आत्मविद्या अर्थात् परमात्मा के गुण-कर्म-स्वभाव-स्वरूप को यथावत् जाननेरूप ब्रह्मविद्या और लोक से वार्ताओं का आरम्भ कहना और पूछना सीखकर सभासद् वा सभापति हो सकें॥१॥

सब सभासद् और सभापति इन्द्रियों के जीतने अर्थात् अपने वश में रखके सदा धर्म में वर्तें और अधर्म से हठे-हठाये रहें। इसलिये रात-दिन नियत समय में योगाभ्यास भी करते रहें। क्योंकि जो जितेन्द्रिय कि अपनी इन्द्रियों (मन, प्राण और शरीर प्रजा है, इस) को जीते विना बाहर की प्रजा को अपने वश में स्थापन करने को समर्थ कभी नहीं हो सकता॥२॥

दृढ़ोत्साही होकर जो काम से दश और क्रोध से आठ दुष्ट व्यसन कि जिनमें फसा हुआ मनुष्य कठिनता से निकल सके, उनको प्रयत्न से छोड़ और छुड़ा देवे॥३॥

क्योंकि जो राजा काम से उत्पन्न हुए दश दुष्ट व्यसनों में फसता है, वह अर्थ अर्थात् राज्य, धनादि और धर्म से रहित हो जाता है। और जो क्रोध से उत्पन्न हुए आठ बुरे व्यसनों में फसता है, वह शरीर से भी रहित हो जाता है॥४॥

काम से उत्पन्न हुए व्यसन—मृगया करना; चौपड़ खेलना, (द्यूत) अर्थात् जुवा करना; दिन में सोना; कामकथा वा दूसरे की निन्दा किया करना; स्त्रियों का अति सङ्ग; मादकद्रव्य मद्य, अफीम, भाँग, गांजा आदि का सेवन; गाना, बजाना, नाचना, [नाच] करना वा करवाना वा सुनना, देखना; वृथा इधर-उधर घूमते फिरना ये दश कामोत्पन्न व्यसन हैं॥५॥

क्रोध से उत्पन्न व्यसन—‘पैशुन्य’ अर्थात् चुग़ली करना; विना विचारे बलात्कार किसी की स्त्री से बुरा काम करना; द्रोह रखना; ‘ईर्ष्या’ अर्थात् दूसरे की बड़ाई वा उन्नति देख-सुन जला करना; ‘असूया’ दोषों में गुण, गुणों में दोषारोपण करना; ‘अर्थदूषण’ अर्थात् अधर्मयुक्त बुरे कामों में धनादि का व्यय करना; कठोर वचन [बोलना] और विना अपराध करड़ा वा अधिक दण्ड देना; ये आठ दुर्गुण क्रोध से उत्पन्न होते हैं॥६॥

जिसे सब विद्वान् लोग कामज और क्रोधजों का मूल जानते हैं कि जिससे ये सब दुर्गुण मनुष्य को प्राप्त होते हैं, उस लोभ को प्रयत्न से छोड़े॥७॥

काम व्यसनों में बड़े दुर्गुण एक मद्यादि मादक द्रव्यों का सेवन, दूसरा पासों आदि से खेलना, तीसरा स्त्रियों का विशेष सङ्ग, चौथा मृगया करना, ये चार महादुष्ट व्यसन हैं और कामजों में अत्यन्त दुःखदायक दोष हैं॥८॥

विना अपराध दण्ड का निपातन, कठोर वचन बोलना और धनादि का अन्याय में खर्च करना, ये तीन क्रोध से उत्पन्न हुए बड़े दुःखदायक दोष हैं॥९॥

जो ये सात दुर्गुण दोनों कामज और क्रोधज दोषों में से गिने हैं, इनमें से पूर्व-पूर्व अर्थात् व्यर्थ व्यय से कठोर वचन, कठोर वचन से अन्याय से दण्ड देना, इससे मृगया खेलना, इससे स्त्रियों का अत्यन्त सङ्ग, इससे जुआ अर्थात् द्यूत करना और इससे भी मद्यादि सेवन करना बड़ा भारी दुष्ट व्यसन है॥१०॥

इसमें यह निश्चय है कि दुष्ट व्यसन में फसने से मर जाना अच्छा है। क्योंकि जो दुष्टाचारी पुरुष है, वह अधिक जियेगा तो अधिक-अधिक पाप करके नीच-नीच गति अर्थात् अधिक-अधिक दुःख को प्राप्त होता जायगा और जो किसी व्यसन में नहीं फसा, वह मर भी जायगा तो भी सुख को प्राप्त होता। इसलिये विशेष राजा और सब मनुष्यों को उचित है कि कभी मृगया और मद्यपानादि दुष्ट कामों में न फसें और दुष्ट व्यसनों से पृथक् होकर, धर्मयुक्त गुण-कर्म-स्वभावों में सदा वर्त्तके अच्छे-अच्छे काम किया करें॥११॥

राजसभासद् और मन्त्री

मौलान्शास्त्रविदः शूराँल्लब्धलक्ष्यान्कुलोद्गतान्।
सचिवान्सप्त चाष्टौ वा प्रकुर्वीत परीक्षितान्॥१॥
अपि यत्सुकरं कर्म तदप्येकेन दुष्करम्।
विशेषतोऽसहायेन किन्नु राज्यं महोदयम्॥२॥
तैः सार्द्धं चिन्तयेन्नित्यं सामान्यं सन्धिविग्रहम्।
स्थानं समुदयं गुप्तिं लब्धप्रशमनानि च॥३॥
तेषां स्वं स्वमभिप्रायमुपलभ्य पृथक् पृथक्।
समस्तान्च कार्येषु विदध्याद्धितमात्मनः॥४॥
अन्यानपि प्रकुर्वीत शुचीन् प्राज्ञानवस्थितान्।
सम्यगर्थसमाहर्तॄनमात्यान्सुपरीक्षितान् ॥५॥
निवर्त्तेतास्य यावद्भिरितिकर्तव्यता नृभिः।
तावतोऽतन्द्रितान् दक्षान् प्रकुर्वीत विचक्षणान्॥६॥
तेषामर्थे नियुञ्जीत शूरान् दक्षान् कुलोद्गतान्।
शुचीनाकरकर्मान्ते भीरूनन्तर्निवेशने॥७॥
दूतं चैव प्रकुर्वीत सर्वशास्त्रविशारदम्।
इङ्गिताकारचेष्टज्ञं शुचिं दक्षं कुलोद्गतम्॥८॥
अनुरक्तः शुचिर्दक्षः स्मृतिमान् देशकालवित्।
वपुष्मान्वीतभीर्वाग्मी दूतो राज्ञः प्रशस्यते॥९॥
—मनु॰ ७। [५४-५७, ६०-६४]॥

स्वराज्य स्वदेश में उत्पन्न हुए, वेदादि शास्त्रों के जाननेहारे, शूरवीर, जिनों का लक्ष्य अर्थात् विचार निष्फल न हो, और कुलीन, अच्छे प्रकार परीक्षित, सात वा आठ उत्तम धार्मिक चतुर ‘सचिवान्’ अर्थात् मन्त्री करे॥१॥

क्योंकि विशेषकर सहाय के विना जो सुगम कर्म है, वह भी एक के करने में कठिन हो जाता है, जब ऐसा है तो महान् राज्यकर्म एक से कैसे हो सकता है? इसलिये एक को राजा और एक की बुद्धि पर राज्य के कार्य्य का निर्भर रखना बहुत ही बुरा काम है॥२॥

इससे सभापति को उचित है कि मन्त्रियों के साथ सन्धि, विग्रह, स्थान, समुदय, गुप्ति और लब्धप्रशमन इन छः गुणों का विचार नित्यप्रति किया करे॥३॥

उन अधिकारियों के दोष और गुण जानकर व्यवस्था करे॥४-७॥ जो कुलीन, चतुर, पवित्र और शास्त्रों का ज्ञाता हो, उसे ‘दूत’ नियुक्त करे॥८-९॥

अमात्ये दण्ड आयत्तो दण्डे वैनयिकी क्रिया।
नृपतौ कोशराष्ट्रे च दूते सन्धिविपर्ययौ॥१॥
दूत एव हि संधत्ते भिनत्त्येव च संहतान्।
दूतस्तत्कुरुते कर्म भिद्यन्ते येन मानवाः॥२॥
बुद्ध्वा च सर्वं तत्त्वेन परराजचिकीर्षितम्।
तथा प्रयत्नमातिष्ठेद्यथात्मानं न पीडयेत्॥३॥
धनुर्दुर्गं महीदुर्गमब्दुर्गं वार्क्षमेव वा।
नृदुर्गं गिरिदुर्गं वा समाश्रित्य वसेत्पुरम्॥४॥
एकः शतं योधयति प्राकारस्थो धनुर्धरः।
शतं दशसहस्राणि तस्माद् दुर्गं विधीयते॥५॥
तत्स्यादायुधसम्पन्नं धनधान्येन वाहनैः।
ब्राह्मणैः शिल्पिभिर्यन्त्रैर्यवसेनोदकेन च॥६॥
तस्य मध्ये सुपर्याप्तं कारयेद् गृहमात्मनः।
गुप्तं सर्वर्त्तुकं शुभ्रं जलवृक्षसमन्वितम्॥७॥
तदध्यास्योद्वहेद्भार्यां सवर्णां लक्षणान्विताम्।
कुले महति सम्भूतां हृद्यां रूपगुणान्विताम्॥८॥
पुरोहितं प्रकुर्वीत वृणुयादेव चर्त्विजम्।
तेऽस्य गृह्याणि कर्माणि कुर्य्युर्वैतानिकानि च॥९॥
—मनु॰ [७।६५-६६, ६८, ७०, ७४-७८]॥

अमात्य को दण्डाधिकार, राजा के आधीन कोश और राजकार्य्य, और दूत के आधीन सन्धि और विग्रह का अधिकार देवे॥१-३॥

नगर की रक्षा के लिये दुर्ग (किला) बनाना उचित है॥४-५॥ वह दुर्ग शस्त्रास्त्र, धन, धान्य, शिल्पी और विद्वानों से सम्पन्न हो॥६-७॥

राजा अपने सदृश उत्तम कुल की विदुषी कन्या से विवाह करे और राजकार्य्य में सदा तत्पर रहै॥८-९॥

साँवत्सरिकमाप्तैश्च राष्ट्रादाहारयेद् बलिम्।
स्याच्चाम्नायपरो लोके वर्त्तेत पितृवन्नृषु॥१॥
अध्यक्षान्विविधान्कुर्यात् तत्र तत्र विपश्चितः।
तेऽस्य सर्वाण्यवेक्षेरन् नॄणां कार्याणि कुर्वताम्॥२॥
आवृत्तानां गुरुकुलाद्विप्राणां पूजको भवेत्।
नृपाणामक्षयो ह्येष निधिर्ब्राह्मोऽभिधीयते॥३॥
समोत्तमाधमै राजा त्वाहूतः पालयन् प्रजाः।
न निवर्तेत संग्रामात् क्षात्रं धर्ममनुस्मरन्॥४॥
आहवेषु मिथोऽन्योन्यं जिघांसन्तो महीक्षितः।
युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः॥५॥
न च हन्यात्स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम्।
न मुक्तकेशं नासीनं न तवास्मीति वादिनम्॥६॥
न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम्।
नायुध्यमानं पश्यन्तं न परेण समागतम्॥७॥
नायुधव्यसनं प्राप्तं नार्त्तं नातिपरिक्षतम्।
न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन्॥८॥
यस्तु भीतः परावृत्तः सङ्ग्रामे हन्यते परैः।
भर्त्तुर्यद्दुष्कृतं किञ्चित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते॥९॥
यच्चास्य सुकृतं किञ्चिदमुत्रार्थमुपार्जितम्।
भर्त्ता तत्सर्वमादत्ते परावृत्तहतस्य तु॥१०॥
रथाश्वं हस्तिनं छत्रं धनं धान्यं पशून्स्त्रियः।
सर्वद्रव्याणि कुप्यं च यो यज्जयति तस्य तत्॥११॥
राज्ञश्च दद्युरुद्धारमित्येषा वैदिकी श्रुतिः।
राज्ञा च सर्वयोधेभ्यो दातव्यमपृथग्जितम्॥१२॥
—मनु॰ [७।८०-८२, ८७, ८९, ९१-९७]

प्रजा से वार्षिक कर यथायोग्य लेवे और प्रजा के साथ पिता के समान वर्ते॥१-३॥

युद्ध में क्षत्रिय धर्म का पालन करे और कभी विमुख न होवे॥४-५॥ युद्ध के भी कुछ नैतिक नियम हैं—निहत्थे, शरण आये, सोये हुए वा डरे हुए पर शस्त्र न चलावे॥६-८॥ युद्ध में जो जीत कर प्राप्त हो, उसका विभाग योद्धाओं और राजा में उचित रीति से हो॥११-१२॥

अलब्धं चैव लिप्सेत लब्धं रक्षेत्प्रयत्नतः।
रक्षितं वर्द्धयेच्चैव वृद्धं पात्रेषु निःक्षिपेत्॥१॥
अलब्धमिच्छेद्दण्डेन लब्धं रक्षेदवेक्षया।
रक्षितं वर्द्धयेद् वृद्ध्या वृद्धं दानेन निःक्षिपेत्॥३॥
बकवच्चिन्तयेदर्थान् सिंहवच्च पराक्रमेत्।
वृकवच्चावलुम्पेत शशवच्च विनिष्पतेत्॥६॥
—मनु॰ ७। [९९, १०१, १०६]॥

राजा अलब्ध की प्राप्ति, लब्ध की रक्षा, रक्षित की वृद्धि और बढ़े हुए धन का सत्पात्रों में दान करे॥१-३॥

बगुले के समान अर्थ का विचार, सिंह के समान पराक्रम, चीते के समान शत्रु को पकड़ना और आवश्यकता पड़ने पर खरगोश के समान छिप जाना—ये युद्ध की नीतियाँ हैं॥६॥

द्वयोस्त्रयाणां पञ्चानां मध्ये गुल्ममधिष्ठितम्।
तथा ग्रामशतानां च कुर्य्याद्राष्ट्रस्य संग्रहम्॥१३॥
ग्रामस्याधिपतिं कुर्य्याद्दशग्रामपतिं तथा।
विंशतीशं शतेशं च सहस्रपतिमेव च॥१४॥
—मनु॰ ७। [११४-११५]॥

शासन व्यवस्था के लिये ग्रामों के समूह पर अधिकारियों की नियुक्ति करे—एक ग्राम का पति, दश ग्रामों का पति, सौ और हजार ग्रामों के पति॥१३-१४॥ अधिकारियों के भ्रष्टाचार पर राजा कड़ी दृष्टि रक्खे॥२०-२१॥

यथा फलेन युज्येत राजा कर्त्ता च कर्मणाम्।
तथाऽवेक्ष्य नृपो राष्ट्रे कल्पयेत्सततं करान्॥१॥
यथाऽल्पाऽल्पमदन्त्याद्यं वार्य्योकोवत्सषट्पदाः।
तथाऽल्पाऽल्पो ग्रहीतव्यो राष्ट्राद्राज्ञाब्दिकः करः॥२॥
क्षत्रियस्य परो धर्मः प्रजानामेव पालनम्।
निर्दिष्टफलभोक्ता हि राजा धर्मेण युज्यते॥७॥
—मनु॰ अ॰ ७। [१२८-१२९, १४४]॥

जैसे जोंक और मधुमक्खी थोड़ा-थोड़ा रस लेते हैं, वैसे ही राजा प्रजा से थोड़ा-थोड़ा वार्षिक कर लेवे ताकि प्रजा को कष्ट न हो॥१-२॥ प्रजा का पालन ही राजा का परम धर्म है॥७॥

न्याय व्यवस्था (Judiciary)

धर्मो विद्धस्त्वधर्मेण सभां यत्रोपतिष्ठते।
शल्यं चास्य न कृन्तन्ति विद्धास्तत्र सभासदः॥७॥
सभां वा न प्रवेष्टव्यं वक्तव्यं वा समञ्जसम्।
अब्रुवन्विब्रुवन्वापि नरो भवति किल्विषी॥८॥
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत्॥१०॥
—मनु॰ ८। [१२-१३, १५]॥

जिस सभा में अधर्म से धर्म मारा जाता है, वहां के सभासद् पाप के भागी होते हैं॥७-८॥ धर्म की रक्षा करने से धर्म हमारी रक्षा करता है। मरे हुए धर्म के साथ ही सब मर्यादाएं नष्ट हो जाती हैं॥१०॥

साक्षी (Witness) के विषय में महर्षि कहते हैं कि सब वर्णों में धार्मिक और सत्यवादी पुरुषों को ही साक्षी करना चाहिये। झूठी साक्षी देने वालों को कठोर दण्ड देना राजा का कर्तव्य है।

कार्षापणं भवेद्दण्ड्यो यत्रान्यः प्राकृतो जनः।
तत्र राजा भवेद्दण्ड्यः सहस्रमिति धारणा॥३॥
—मनु॰ [८।३३६]

जिस अपराध में साधारण मनुष्य पर एक पैसा दण्ड हो, उसी अपराध में राजा पर हजार पैसा दण्ड होना चाहिये। अर्थात् राजपुरुषों को प्रजा से अधिक दण्ड मिलना चाहिये ताकि वे न्याय के मार्ग से न डिग सकें॥३॥

व्यभिचारी स्त्री और पुरुष के लिये महर्षि ने लोहे के तप्त पलंग पर भस्म करने जैसे कठोर दण्डों का विधान किया है ताकि समाज में पवित्रता बनी रहे।

अन्त में महर्षि कहते हैं कि ‘यथा राजा तथा प्रजा’—जैसा राजा का आचरण होगा, प्रजा भी वैसी ही होगी। इसलिये राजा और राजपुरुषों को धर्म और न्याय का आदर्श प्रस्तुत करना चाहिये।

इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिककृते सत्यार्थप्रकाशे
सुभाषाविभूषिते राजधर्मविषये
षष्ठः समुल्लासः सम्पूर्णः॥६॥

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