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सत्यार्थ प्रकाशपञ्चम समुल्लास
वानप्रस्थ और संन्यास

पञ्चम समुल्लास

वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की विधि और संन्यासी के लक्षण।

पञ्चम समुल्लास

अथ पञ्चमसमुल्लासारम्भः

वानप्रस्थ और संन्यास आश्रम की विधि

जब गृहस्थ अपनी आयु के ५० वर्ष पूर्ण कर ले, सन्तान के भी सन्तान हो जाएँ, तब उसे 'वानप्रस्थ' आश्रम की ओर बढ़ना चाहिए।

ब्रह्मचर्य्याश्रमं समाप्य गृही भवेत् गृही भूत्वा वनी भवेद्वनी भूत्वा प्रव्रजेत्॥ —शत॰ का॰ १४॥

वानप्रस्थ का अर्थ है वन में जाकर तप करना और इन्द्रियों को वश में करना। वानप्रस्थी को सादगी से रहना चाहिए, भूमि पर सोना और स्वाध्याय में समय बिताना चाहिए।

संन्यास आश्रम जीवन का शिखर है। जब वैराग्य पूर्ण हो जाए, तब संन्यास लेना चाहिए। संन्यासी का मुख्य धर्म 'परोपकार' और 'सत्य का उपदेश' करना है।

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः। धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥ —मनु॰

संन्यासी को धर्म के इन दस लक्षणों का पालन करना अनिवार्य है। वह पक्षपात छोड़कर, सबको सत्य मार्ग दिखाए। वह किसी एक स्थान पर अधिक समय न रहे और संसार को अविद्या से छुड़ाने का प्रयत्न करे।

संन्यासी का कार्य है कि वह राजा और प्रजा को धर्म का मार्ग बताए और पाखण्ड का खण्डन करे।

इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिककृते सत्यार्थप्रकाशे
सुभाषाविभूषिते वानप्रस्थसंन्यासाश्रमविषये
पञ्चमः समुल्लासः सम्पूर्णः॥५॥

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