Arya Samaj Temple
सत्यार्थ प्रकाशचतुर्थ समुल्लास
विवाह और गृहाश्रम

चतुर्थ समुल्लास

विवाह की विधि, गृहस्थाश्रम के कर्तव्य और पञ्च महायज्ञ।

चतुर्थ समुल्लास

अथ चतुर्थसमुल्लासारम्भः

समावर्त्तन, विवाह और गृहाश्रम विधि

जब विद्यार्थी अपनी शिक्षा पूर्ण कर लेता है, तब 'समावर्त्तन' (दीक्षान्त) संस्कार होता है। इसके पश्चात् वह गृहाश्रम में प्रवेश का अधिकारी होता है।

वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम्। अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममाविशेत्॥१॥ —मनु॰ [३।२]

जब यथावत् ब्रह्मचर्य आचार्यानुकूल वर्त्तकर, धर्म से चारों, तीन, दो वा एक वेद को साङ्गोपाङ्ग पढ़के जिसका ब्रह्मचर्य खण्डित न हुआ हो, वह पुरुष वा स्त्री गृहाश्रम में प्रवेश करे॥१॥

विवाह के लिए आयु का नियम महत्वपूर्ण है। कन्या की आयु कम से कम १६ वर्ष और पुरुष की २५ वर्ष होनी चाहिए। पूर्ण ब्रह्मचर्य के साथ ४८ वर्ष तक विद्या पढ़ना सर्वोत्तम है।

असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः। सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने॥४॥ —मनु॰ [३।५]

विवाह के लिए उत्तम कन्या वह है जो माता के कुल की छः पीढ़ियों में न हो और पिता के गोत्र की न हो। वर और कन्या के गुण, कर्म और स्वभाव मिलने चाहिए।

विवाह आठ प्रकार के माने गए हैं—ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। इनमें से 'ब्राह्म' विवाह सर्वोत्तम है। स्वयंवर विवाह ही सबसे उत्तम है।

गृहाश्रम सब आश्रमों का आधार है। गृहस्थ को पञ्च महायज्ञ—ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, बलिवैश्वदेवयज्ञ और अतिथियज्ञ—प्रतिदिन करने चाहिए।

पति-पत्नी का व्यवहार प्रेमपूर्ण और धर्मयुक्त होना चाहिए। जिस कुल में पति से पत्नी और पत्नी से पति सदा प्रसन्न रहते हैं, वहाँ सुख और सौभाग्य सदा निवास करते हैं।

इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिककृते सत्यार्थप्रकाशे
सुभाषाविभूषिते समावर्त्तनविवाहगृहाश्रमविषये
चतुर्थः समुल्लासः सम्पूर्णः॥४॥

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