त्रयोदश समुल्लास
ईसाई धर्मग्रन्थों और उनके सिद्धांतों की समीक्षा।
त्रयोदश समुल्लास
ओ३म्
अनुभूमिका (३)
जो यह बाइबल का मत है, वह केवल ईसाइयों का है सो नहीं, किन्तु इससे यहूदी आदि भी गृहीत होते हैं। जो यहाँ (१३) तेरहवें समुल्लास में ईसाई मत के विषय में लिखा है, इसका यही अभिप्राय है कि आजकल बाइबल के मत में ईसाई मुख्य हो रहे हैं और यहूदी आदि गौण हैं। मुख्य के ग्रहण से गौण का ग्रहण हो जाता है, इससे यहूदियों का भी ग्रहण समझ लीजिये।
इनका जो विषय यहां लिखा है सो केवल बाइबल में से कि जिसको ईसाई और यहूदी आदि सब मानते हैं और इसी पुस्तक को अपने धर्म का मूलकारण समझते हैं। इस पुस्तक के भाषान्तर बहुत से हुए हैं, जो कि इनके मत में बड़े-बड़े पादरी हैं, उन्हीं ने किये हैं। उनमें से देवनागरी वा संस्कृत भाषान्तर देखकर मुझको बाइबल में बहुत सी शङ्का हुई हैं, उनमें से कुछ थोड़ी सी इस १३ तेरहवें समुल्लास में सबके विचारार्थ लिखी हैं। यह लेख केवल सत्य की वृद्धि और असत्य के ह्रास होने के लिये है, न कि किसी को दुःख देने वा हानि करने अथवा मिथ्या दोष लगाने के अर्थ है। इसका अभिप्राय उत्तर लेख में सब कोई समझ लेंगे कि यह पुस्तक कैसा है और इनका मत भी कैसा है?
इस लेख से यही प्रयोजन है कि सब मनुष्यमात्र को देखना, सुनना, लिखना आदि करना सहज होगा और पक्षी-प्रतिपक्षी होके विचार कर ईसाई मत का आन्दोलन सब कोई कर सकेंगे। इससे एक यह प्रयोजन सिद्ध होगा कि मनुष्यों को धर्मविषयक ज्ञान बढ़कर यथायोग्य सत्याऽसत्य मत और कर्त्तव्याऽकर्त्तव्य कर्मसम्बन्धी विषय विदित होकर सत्य और कर्त्तव्य कर्म का स्वीकार, असत्य और अकर्त्तव्य कर्म का परित्याग करना सहजता से हो सकेगा।
सब मनुष्यों को उचित है कि सबके मतविषयक पुस्तकों को देख समझकर कुछ सम्मति वा असम्मति देवें वा लिखें, नहीं तो सुना करें। क्योंकि जैसे पढ़ने से ‘पण्डित’ होता है, वैसे सुनने से ‘बहुश्रुत’ होता है। यदि श्रोता दूसरे को नहीं समझा सके, तथापि आप स्वयं तो समझ ही जाता है। जो कोई पक्षपातरूप यानारूढ़ होके देखते हैं, उनको न अपने और न पराये गुण-दोष विदित हो सकते हैं।
मनुष्य का आत्मा यथायोग्य सत्याऽसत्य के निर्णय करने का सामर्थ्य रखता है। जितना अपना पठित वा श्रुत है, उतना निश्चय कर सकता है। यदि एक मत वाले दूसरे मत वाले के विषयों को जानें और अन्य न जानें तो यथावत् संवाद नहीं हो सकता, किन्तु अज्ञानी किसी भ्रमरूप बाड़े में गिर जाते हैं। ऐसा न हो इसलिए इस ग्रंथ में प्रचरित सब मतों का विषय थोड़ा-थोड़ा लिखा है। इतने ही से शेष विषयों में अनुमान कर सकता है कि वे सच्चे हैं वा झूठे?
जो-जो सर्वमान्य सत्य विषय हैं, वे तो सबमें एक से हैं। झगड़ा झूठे विषयों में होता है। अथवा एक सच्चा और दूसरा झूठा हो, तो भी कुछ थोड़ा-सा विवाद चलता है। यदि वादी-प्रतिवादी सत्याऽसत्य निश्चय के लिये वाद-प्रतिवाद करें, तो अवश्य निश्चय हो जाय।
अब मैं इस १३वें समुल्लास में ईसाई मत विषयक थोड़ा-सा लिखकर सबके सन्मुख स्थापित करता हूँ, विचारिये कि कैसा है?
अलमतिलेखेन विचक्षणवरेषु॥
अथ त्रयोदशसमुल्लासारम्भः
अथ कृश्चीनाख्यमतविषयं व्याख्यास्यामः
अब इसके आगे ईसाइयों के मत-विषय में लिखते हैं, जिससे सबको विदित हो जायगा कि इनका मत निर्दोष और इनका बाइबल पुस्तक ईश्वरकृत है वा नहीं? प्रथम बाइबल के तौरेत का विषय लिखा जायगा। उसमें से प्रथम उत्पत्ति के विषय में कुछ-कुछ विषय दिखलाया जाता है—
समीक्षक—आरम्भ किसको कहते हो?
ईसाई—सृष्टि के प्रथमोत्पत्ति को।
समीक्षक—क्या यही सृष्टि प्रथम हुई, इसके पूर्व कभी नहीं हुई थी?
ईसाई—हम नहीं जानते, थी वा नहीं, ईश्वर जाने।
समीक्षक—जब नहीं जानते तो तुमने इस पुस्तक पर विश्वास क्यों किया क्योंकि जिससे सन्देह का निवारण नहीं हो सकता। और इसी के भरोसे लोगों को उपदेश कर इस सन्देह के भरे हुए मत में क्यों फसाते हो? और निःसन्देह सर्वशङ्कानिवारक वेदमत का स्वीकार क्यों नहीं करते? जब तुम ईश्वर की सृष्टि का हाल नहीं जानते, तो ईश्वर को कैसे जानते होगे?
आकाश किसको मानते हो?
ईसाई—पोल और ऊपर को।
समीक्षक—पोल की उत्पत्ति किस प्रकार हुई! क्योंकि यह विभु पदार्थ और अति सूक्ष्म है और ऊपर-नीचे एक-सा है। जब आकाश नहीं सृजा था तब पोल और अवकाश था वा नहीं? जो नहीं था तो ईश्वर, जगत् का कारण और जीव कहाँ रहते थे? विना अवकाश के कोई पदार्थ स्थित नहीं हो सकता, इसलिए तुम्हारी बायबिल का कथन युक्त नहीं। ईश्वर बेडौल, उसका ज्ञान-कर्म बेडौल होता है वा सब डौलवाला?
ईसाई—डौलवाले होते है।
समीक्षक—तो यहाँ ईश्वर की बनाई पृथिवी बैडौल थी, ऐसा क्यों लिखा? ईश्वर का काम बेडौल कभी नहीं हो सकता, क्योंकि वह सर्वज्ञ है। उसके काम में भूल चूक कभी नहीं होती है। और बायबिल में ईश्वर की सृष्टि बेडौल लिखी, इसलिए यह पुस्तक ईश्वरकृत नहीं हो सकता।
समीक्षक—प्रथम ईश्वर का आत्मा क्या पदार्थ है?
ईसाई—चेतन।
समीक्षक—वह साकार है वा निराकार तथा व्यापक है वा एकदेशी?
ईसाई—निराकार, चेतन और व्यापक है। परन्तु किसी एक ‘सनाई पर्वत’, ‘चौथा आसमान’ आदि में विशेष करके रहता है।
समीक्षक—जो निराकार है तो उसको किसने देखा? और व्यापक का जल पर डोलना कभी नहीं हो सकता। भला, जब ईश्वर का आत्मा जल पर डोलता था, तब ईश्वर कहाँ था? इससे यही सिद्ध होता है कि ईश्वर का शरीर कहीं अन्यत्र स्थित होगा अथवा अपने कुछ आत्मा के एक टुकड़े को जल पर डुलाया होगा। जो ऐसा है तो विभु और सर्वज्ञ कभी नहीं हो सकता। जो विभु नहीं तो जगत् की रचना, धारण, पालन और जीवों के कर्मों की व्यवस्था वा प्रलय कभी नहीं कर सकता। क्योंकि जिस पदार्थ का स्वरूप एकदेशी है, उसके गुण, कर्म, स्वभाव भी एकदेशी होते हैं। जो ऐसा है तो वह ईश्वर नहीं हो सकता। क्योंकि ईश्वर सर्वव्यापक, अनन्त गुण-कर्म-स्वभावयुक्त, सच्चिदानन्दस्वरूप, नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाव, अनादि, अनन्तादि लक्षणयुक्त वेदों में कहा है, उसी को मानो तभी तुम्हारा कल्याण होगा, अन्यथा नहीं॥१॥
समीक्षक—क्या ईश्वर की बात जड़स्वरूप उजियाले ने सुन ली? जो सुनी हो, तो इस समय भी सूर्य्य और दीप अग्नि का प्रकाश हमारी तुम्हारी बात क्यों नहीं सुनता? प्रकाश जड़ होता है, वह कभी किसी की बात नहीं सुन सकता। क्या जब ईश्वर ने उजियाले को देखा तभी जाना कि उजियाला अच्छा है? पहिले नहीं जानता था? जो जानता होता, तो देखकर अच्छा क्यों कहता? जो नहीं जानता था, तो वह ईश्वर ही नहीं। इसीलिए तुम्हारी बायबिल ईश्वरोक्त और उसमें कहा हुआ ईश्वर सर्वज्ञ नहीं है॥२॥
समीक्षक—क्या आकाश और जल ने भी ईश्वर की बात सुन ली? और जो जल के बीच में आकाश न होता तो जल रहता ही कहाँ? प्रथम आयत में आकाश को सृजा था, पुनः आकाश का बनाना व्यर्थ हुआ। जो आकाश को स्वर्ग कहा तो वह सर्वव्यापक हैइसलिए सर्वत्र स्वर्ग हुआ, फिर ऊपर को स्वर्ग है, यह कहना व्यर्थ है। जब सूर्य्य उत्पन्न ही नहीं हुआ था तो पुनः दिन और रात कहां से हो गई? ऐसी ही असम्भव बातें आगे की आयतों में भरी हैं॥३॥
समीक्षक—यदि आदम को ईश्वर ने अपने स्वरूप में बनाया तो ईश्वर का स्वरूप पवित्र, ज्ञानस्वरूप, आनन्दमय आदि लक्षणयुक्त है, उसके सदृश आदम क्यों नहीं हुआ? जो नहीं हुआ तो उसके स्वरूप में नहीं बना। और आदम को उत्पन्न किया तो ईश्वर ने अपने स्वरूप ही को उत्पत्तिवाला किया, पुनः वह अनित्य क्यों नहीं और आदम को उत्पन्न कहाँ से किया?
ईसाई—मट्टी से बनाया।
समीक्षक—मट्टी कहां से बनाई?
ईसाई—अपनी ‘कुदरत’ अर्थात् सामर्थ्य से।
समीक्षक—ईश्वर का सामर्थ्य अनादि है वा नवीन?
ईसाई—अनादि है।
समीक्षक—जब अनादि है तो जगत् का कारण सनातन हुआ, फिर अभाव से भाव क्यों मानते हो?
ईसाई—सृष्टि के पूर्व ईश्वर के विना कोई वस्तु नहीं था।
समीक्षक—जो नहीं था तो यह जगत् कहाँ से बना? और ईश्वर का सामर्थ्य गुण है वा द्रव्य? जो द्रव्य है तो ईश्वर से भिन्न दूसरा पदार्थ था और गुण है तो गुण से द्रव्य कभी नहीं बन सकता जैसे रूप से अग्नि और रस से जल नहीं बन सकता। और जो ईश्वर से जगत् बना होता तो ईश्वर के सदृश गुण, कर्म, स्वभाववाला होता। उसके गुण-कर्म-स्वभाव के सदृश न होने से यही निश्चय है कि ईश्वर से नहीं बना, किन्तु जगत् के कारण अर्थात् परमाणु आदि नामवाले जड़ से बना है।
जैसी कि जगत् की उत्पत्ति वेदादि शास्त्रों में लिखी है, वैसी ही मान लो, जिससे ईश्वर जगत् को बनाता है। जो आदम का भीतर का स्वरूप जीव और बाहर का मनुष्य के सदृश है तो वैसा ईश्वर का स्वरूप क्यों नहीं? क्योंकि जब आदम ईश्वर के सदृश बना तो ईश्वर आदम के सदृश अवश्य होना चाहिये॥४॥
समीक्षक—जब ईश्वर ने अदन में बाड़ी बनाकर उसमें आदम को रक्खा तब ईश्वर नहीं जानता था कि इसको पुनः निकालना पड़ेगा? और जब ईश्वर ने आदम को धूली से बनाया तो ईश्वर के स्वरूप नहीं हुआ, और जो है तो ईश्वर भी धूली से बना होगा? जब उसके नथुनों में ईश्वर ने श्वास फूंका तो वह श्वास ईश्वर का स्वरूप था वा भिन्न? जो भिन्न था तो आदम ईश्वर के स्वरूप में नहीं बना। जो एक है तो आदम और ईश्वर एक से हुए। और जो एक से हैं तो आदम के सदृश जन्म, मरण, वृद्धि, क्षय, तृषा आदि दोष ईश्वर में आये फिर वह ईश्वर क्योंकर हो सकता है?इसलिए यह तौरेत की बात ठीक नहीं विदित होती और यह पुस्तक भी ईश्वरकृत नहीं है॥५॥
समीक्षक—जो ईश्वर ने आदम को धूली से बनाया तो उसकी स्त्री को धूली से क्यों नहीं बनाया? और जो नारी को हड्डी से बनाया तो आदम को हड्डी से क्यों नहीं बनाया? और जैसे नर से निकलने से नारी नाम हुआ तो नारी से निकलकर नर भी होना चाहिए। और उनमें परस्पर प्रेम भी रहै, जैसे स्त्री के साथ पुरुष प्रेम करे, वैसे ही स्त्री भी पुरुष के साथ प्रेम करे।
देखो विद्वान् लोगो! ईश्वर की कैसी पदार्थविद्या अर्थात् ‘फिलासफ़ी’ चलकती है! जो आदम की एक पसली निकालकर नारी बनाई तो सब मनुष्यों की एक पसली कम क्यों नहीं होती? और स्त्री के शरीर में एक पसली होनी चाहिये,क्योंकि वह एक पसली से बनी है। क्या जिस सामग्री से सब जगत् बनाया, उस सामग्री से स्त्री का शरीर नहीं बन सकता था? इसलिए यह बाइबल का सृष्टिक्रम सृष्टिविद्या से विरुद्ध है॥६॥
समीक्षक—जो ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ होता तो इस ‘धूर्त सर्प्प’ अर्थात् शैतान को क्यों बनाता? और जो बनाया तो वही ईश्वर अपराध का भागी है, क्योंकि जो वह उसको दुष्ट न बनाता तो वह दुष्टता क्यों करता? और वह पूर्वजन्म नहीं मानता तो विना अपराध उसको पापी क्यों बनाया? और सच पूछो तो वह सर्प्प नहीं था किन्तु मनुष्य था। क्योंकि जो मनुष्य न होता तो मनुष्य की भाषा क्योंकर बोल सकता?
और जो आप झूठा और दूसरे को झूठ में चलावे, उसीको शैतान कहना चाहिए। सो यहां शैतान सत्यवादी और इससे उसने उस स्त्री को नहीं बहकाया किन्तु सच कहा और ईश्वर ने आदम और हव्वा से झूठ कहा कि इसके खाने से तुम मर जाओगे। जब वह पेड़ ज्ञानदाता और अमर करनेवाला था तो उसके फल खाने से क्यों वर्जा? और जो वर्जा तो वह ईश्वर झूठा और बहकानेवाला ठहरा। क्योंकि उस वृक्ष के फल मनुष्यों को ज्ञान और सुखकारक थे, अज्ञान और मृत्युकारक नहीं।
जब ईश्वर ने फल खाने से वर्जा तो उन वृक्षों की उत्पत्ति किसलिए की थी? जो अपने लिए की; तो क्या आप अज्ञानी और मृत्युधर्मवाला था? और जो दूसरों के लिये बनाया तो फल खाने में अपराध कुछ भी न हुआ। और आजकल कोई भी वृक्ष ज्ञानकारक और मृत्युनिवारक देखने में नहीं आता, क्या ईश्वर ने उसका बीज भी नष्ट कर दिया? ऐसी बातों से मनुष्य छली-कपटी होता है तो ईश्वर वैसा क्यों नहीं हुआ? क्योंकि जो कोई दूसरे से छल-कपट करेगा, वह छली-कपटी क्यों न होगा? और जो इन तीनों को शाप दिया, वह विना अपराध से है, पुनः वह ईश्वर अन्यायकारी भी हुआ और यह शाप ईश्वर को होना चाहिये, क्योंकि वह झूठ बोला और उनको बहकाया। यह ‘फिलासफी’ देखो! क्या विना पीड़ा के गर्भधारण और बालक का जन्म हो सकता था? और विना श्रम के कोई अपनी जीविका कर सकता है? क्या प्रथम काँटे आदि के वृक्ष न थे? और जब शाक-पात खाना सब मनुष्यों को ईश्वर के कहने से उचित हुआ तो जो उत्तर में मांस का खाना बायबिल में लिखा, वह झूठा क्यों नहीं? और जो वह सच्चा हो, तो यह झूठा है।
जब आदम का कुछ भी अपराध सिद्ध नहीं होता तो ईसाई लोग सब मनुष्यों को आदम के अपराध से सन्तान होने पर अपराधी क्यों कहते हैं? भला ऐसा पुस्तक और ऐसा ईश्वर कभी बुद्धिमानों के मानने योग्य हो सकता है?॥७॥
समीक्षक—भला! ईश्वर को ऐसी ईर्ष्या और भ्रम क्यों हुआ कि ज्ञान में हमारे तुल्य हुआ? क्या यह बुरी बात हुई? यह शङ्का ही क्यों पड़ी? क्योंकि ईश्वर के तुल्य कभी कोई नहीं हो सकता। परन्तु इस लेख से यह भी सिद्ध हो सकता है कि वह ईश्वर नहीं था किन्तु एक मनुष्यविशेष था। बायबिल में जहाँ कहीं ईश्वर की बात आती है वहां मनुष्य के तुल्य ही लिखी आती है।
अब देखो! आदम के ज्ञान की बढ़ती में ईश्वर कितना दुःखी हुआ और फिर अमर-वृक्ष के फल खाने में कितनी ईर्ष्या की, और प्रथम जब उसको बारी में रक्खा तब उसको भविष्य का ज्ञान नहीं था कि इसको पुनः निकालना पड़ेगा, इसलिए ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ नहीं था। और चमकते खड्ग का पहिरा रक्खा यह भी मनुष्य का काम है, ईश्वर का नहीं। हमको बड़ा आश्चर्य होता है कि ऐसे गुणवाले को ईसाई लोग ईश्वर क्यों मानते हैं? क्योंकि ये बातें सब मनुष्य के स्वभाव में घट सकती हैं, ईश्वर में नही॥८॥
समीक्षक—यदि ईश्वर मांसाहारी न होता तो भेड़ की भेंट और हाबिल का सत्कार और काइन तथा उसकी भेंट का तिरस्कार क्यों करता? और ऐसा झगड़ा लगाने और हाबिल के मत्यु का कारण भी ईश्वर ही हुआ। और जैसे आपस में मनुष्य लोग एक दूसरे से बातें करते हैं, वैसी ही ईसाइयों के ईश्वर की बातें हैं। बगीचे में आना-जाना,उसका बनाना भी मनुष्यों का कर्म है। इससे विदित होता है कि यह बाइबल मनुष्यों की बनाई है, ईश्वर की नहीं॥९॥
समीक्षक—क्या ईश्वर क़ाइन से पूछे विना हाबिल का हाल नहीं जानता था और लोहू का शब्द भूमि से किसी को कभी पुकार सकता है? ये सब बातें अविद्वानों की हैं, इसीलिए यह पुस्तक न ईश्वर और न विद्वान् का बनाया हो सकता है॥१०॥
समीक्षक—भला! ईसाइयों का ईश्वर मनुष्य न होता, तो हनूक के साथ-साथ क्यों चलता? इससे जो वेदोक्त, निराकार,व्यापक ईश्वर है, उसी को ईसाई लोग मानें, तो उनका कल्याण होवे॥११॥
समीक्षक—ईसाइयों से पूछना चाहिए कि ईश्वर के बेटे कौन हैं? और ईश्वर की स्त्री, सास, श्वसुर, साला और सम्बन्धी कौन हैं? क्या ऐसी बात ईश्वर और ईश्वर के पुस्तक की हो सकती है? किन्तु यह सिद्ध होता है कि उन जङ्गली मनुष्यों ने यह पुस्तक बनाया है।
वह ईश्वर ही नहीं, जो सर्वज्ञ न हो, न भविष्यत् की बात जाने। वह जीव है। क्या जब सृष्टि की थी तब ‘आगे मनुष्य दुष्ट होंगे’ ऐसा नहीं जानता था? और पछताना,अति शोकादि होना, भूल से काम करके पीछे पश्चात्ताप करना आदि ईसाइयों के ईश्वर में घट सकता है, वेदोक्त ईश्वर में नहीं। भला,पशु-पक्षी भी दुष्ट हो गये! यदि वह ईश्वर सर्वज्ञ होता तो ऐसा विषादी क्यों होता? इसलिये न यह ईश्वर और न यह ईश्वरकृत पुस्तक हो सकता है।॥१२॥
समीक्षक—भलाकोई भी विद्वान् ऐसी विद्या से विरुद्ध असम्भव बात के वक्ता को ईश्वर मान सकता है? क्योंकि इतनी बड़ी, चौड़ी, ऊँची नाव में हाथी-हथिनी, ऊँट-ऊँटनी आदि करोड़ों जन्तु और उनके खाने-पीने की चीजें, वे सब कुटुम्ब के भी, समा सकते हैं? यह इसीलिये मनुष्यकृत पुस्तक है। जिसने यह लेख किया है, वह विद्वान् भी नहीं था॥१३॥
समीक्षक—वेदी के बनाने, होम के करने के लेख से यही सिद्ध होता है कि ये बातें वेदों से बायबिल में गई हैं। क्या परमेश्वर के नाक भी है कि जिससे सुगन्ध सूंघा? क्या यह ईसाइयों का ईश्वर मनुष्यवत् अल्पज्ञ नहीं है कि कभी स्राप देता है और कभी पछताता है? प्रथम सबको मार डाला और अब कहता है कि कभी न मारूंगा। ये बातें सब लड़केपन की हैं, ईश्वर की नहीं और न किसी विद्वान् की।॥१४॥
समीक्षक—क्या एक को प्राणकष्ट देवाकर दूसरों को आनन्द कराने से दयाहीन ईसाइयों का ईश्वर नहीं है? जो माता-पिता एक लड़के को मरवाकर दूसरे को खिलावें तो महापापी नहीं हों? इसी प्रकार यह बात है, क्योंकि ईश्वर के सब प्राणी पुत्रवत् हैं। परमेश्वर ऐसा काम कभी नहीं कर सकता।॥१५॥
समीक्षक—जब सारी पृथिवी पर एक भाषा और बोली होगी, उस समय सब मनुष्यों को परस्पर अत्यन्त आनन्द प्राप्त हुआ होगा। परन्तु क्या किया जाय? यह ईसाइयों के ईर्ष्यक ईश्वर ने सबकी भाषा गड़बड़ाके सबका सत्यानाश किया। क्या यह शैतान के काम से भी बुरा काम नहीं है? और इससे यह भी विदित होता है कि ईसाइयों का ईश्वर सनाई पहाड़ आदि पर रहता था और जीवों की उन्नति भी नहीं चाहता था।॥१६॥
समीक्षक—अब देखिये! जो अबिरहाम बड़ा पैग़म्बर ईसाई और मुसलमानों का बजता है और उसके कर्म मिथ्याभाषणादि बुरे हैं, और अपनी स्त्री का पातिव्रत्य धर्म भङ्ग कराके व्यभिचारिणी बनाता है। भला! जिनके ऐसे पैग़म्बर हों, उनको विद्या वा कल्याण का मार्ग कैसे मिल सके?॥१७॥
समीक्षक—अब देखिये! ईश्वर की अन्यथा आज्ञा, कि जो यह ख़तनः करना ईश्वर को इष्ट होता तो उस चमड़े को आदि-सृष्टि में नहीं बनाता, और जो यह बनाया गया है वह रक्षार्थ है। इसका काटना बुरा है और अब ईसाई लोग इस आज्ञा को क्यों नहीं करते?॥१८॥
समीक्षक—इससे यह सिद्ध होता है कि ईश्वर मनुष्य वा पक्षिवत् था जो ऊपर से नीचे और नीचे से ऊपर आता-जाता रहता था। यह कोई इन्द्रजाली पुरुषवत् विदित होता है॥१९॥
समीक्षक—अब देखिये सज्जन लोगो! जिनका ईश्वर बछड़े का मांस खावे, उसके उपासक गाय-बछड़े आदि को क्यों छोड़ें? वह विना हिंसक मनुष्य के ईश्वर कभी हो सकता है? इससे विदित होता है कि जङ्गली मनुष्यों की एक मण्डली थी, उनका जो प्रधान मनुष्य था, उसका नाम बायबिल में ईश्वर रक्खा होगा।॥२०॥
समीक्षक—अब विचारिये कि सरः से भेंट कर गर्भवती की, यह काम कैसे हुआ? ऐसा विदित होता है कि सरः परमेश्वर की कृपा से गर्भवती हुई॥२४॥
समीक्षक—अब स्पष्ट हो गया कि यह बायबिल का ईश्वर अल्पज्ञ है, सर्वज्ञ नहीं। ईश्वर सर्वज्ञ होता तो क्यों कराता और उसकी भविष्यत् श्रद्धा को भी सर्वज्ञता से क्यों न जान लेता?॥२६॥
समीक्षक—मुर्दों के गाड़ने से संसार की बड़ी हानि होती है, क्योंकि वह सड़के वायु को दुर्गन्धमय कर रोग फैला देता है। कबर के देखने से भय भी होता है, इसलिए जलाना सर्वोत्तम है।॥२७॥
समीक्षक—जब ईसाइयों का ईश्वर अखाड़मल्ल है! जब ईश्वर को प्रत्यक्ष देखा और मल्लयुद्ध किया, यह बात विना शरीरवाले के कैसे हो सकती है? यह केवल लड़केपन की लीला है॥३५॥
समीक्षक—अब देखिये! ऐसे कर्मों का करनेहारा मूसा पैगम्बर बन गया। इससे विदित होता है कि ईसाइयों के जो मूल पुरुषा हुए हैं, वे सब मूसा आदि से ले करके जंगली अवस्था में थे, विद्यावस्था में नहीं।॥ ३८॥
समीक्षक—वाह! अच्छा आधी रात को डाकू के समान निर्दयी होकर ईसाइयों के ईश्वर ने लड़के, बाले, वृद्ध और पशु तक भी विना अपराध मार दिये। ऐसा काम ईश्वर के तो क्या किन्तु किसी साधारण मनुष्य के भी करने का नहीं है।॥४२॥
समीक्षक—क्या परमेश्वर ने छः दिन तक बड़ा परिश्रम किया था कि जिससे थक के सातवें दिन सो गया? ऐसा काम विद्वान् का भी नहीं तो ईश्वर का क्योंकर हो सकता है?॥४५॥
समीक्षक—ईसाइयों का परमेश्वर गाय, बैल आदि की भेंट लेनेवाला, वह बैल गाय आदि पशुओं के लोहू-मांस का प्यासा-भूखा है वा नहीं? इसी से वह अहिंसक और ईश्वर कोटि में गिना कभी नहीं जा सकता।॥५०॥
समीक्षक—वाहजी! मूसा पैग़म्बर और तुम्हारा ईश्वर धन्य है कि जो स्त्री, बाल, वृद्ध और पशु हत्या करने से भी अलग न रहे। क्या यह ईश्वर की आज्ञा हो सकती है?॥५७॥
समीक्षक—इन बातों को कोई विद्वान् नहीं मान सकता कि जो प्रत्यक्षादि प्रमाण और सृष्टिक्रम से विरुद्ध हैं। जो परमेश्वर का नियम है उसको कोई नहीं तोड़ सकता।॥६३॥
समीक्षक—इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि ईसाइयों का ईश्वर सर्वज्ञ नहीं। क्योंकि जो सर्वज्ञ होता तो उसकी परीक्षा शैतान से क्यों कराता? और वह ईसा भूखा क्यों रहता?॥६५॥
समीक्षक—ऐसी फूट कराके, लड़ाई झगड़ा मचा के, पिता-पुत्र, माँ-बेटी, पतोहू-सास आदि से फूट करा, परस्पर वैर बढ़ानेहारा मनुष्य के लिये बहुत बुरा काम है। यह केवल दोष है।॥८२॥
समीक्षक—भला, यह ऐसी बात कोई भी सभ्य करेगा? विना अविद्वान् जङ्गली मनुष्य के, शिष्यों से खाने की चीज को अपने माँस और पीने की चीजों को लोहू नहीं कह सकता।॥९५॥
समीक्षक—सर्वथा यीशु के साथ उन दुष्टों ने बुरा काम किया। परन्तु यीशु का भी दोष है, क्योंकि ईश्वर का न कोई पुत्र न वह किसी का बाप है। जो वह करामाती हो[ता], तो पुकार-पुकार के प्राण क्यों त्यागता? इससे यह सिद्ध हुआ कि यीशु एक उस समय के जङ्गली मनुष्यों में से कुछ अच्छा था। न वह करामाती, न ईश्वर का पुत्र और न विद्वान् था।॥९९॥
समीक्षक—अब सुनिये! ईसाइयों के स्वर्ग में विवाह भी होते हैं। क्योंकि ईसा का विवाह ईश्वर ने वहीं किया। अबतक ईसाइयों ने उसके विश्वास में धोखा खाया और न जाने कबतक धोखे में रहेंगे॥१३५॥
समीक्षक—ये सब बातें केवल भोले-भाले मनुष्यों को बहकाकर फसाने की लीला है। भला ऊंचाई साढ़े सात सौ कोश क्योंकर हो सकती है? यह सर्वथा मिथ्या कपोलकल्पना की बात है।॥१३९॥
अब कहाँ तक लिखें, इनकी बायबिल में लाखों बातें खण्डनीय हैं। यह तो थोड़ा-सा चिह्नमात्र ईसाइयों की बायबिल पुस्तक का दिखलाया है, इतने ही से बुद्धिमान् लोग बहुत-सा समझ लेंगे। थोड़ी सी बातों को छोड़ शेष सब झूठ भरा है। जैसे झूठ के संग से सत्य भी शुद्ध नहीं रहता, वैसा ही बायबिल पुस्तक भी माननीय नहीं हो सकता किन्तु वह सत्य तो वेदों के स्वीकार में गृहीत होता ही है॥
इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिनिर्मिते सत्यार्थप्रकाशे
सुभाषाविभूषिते कृश्चीनाख्यमतविषये
त्रयोदशः समुल्लासः सम्पूर्णः॥१३॥
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