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सत्यार्थ प्रकाशद्वादश समुल्लास
नास्तिक मत समीक्षा

द्वादश समुल्लास

चार्वाक, बौद्ध और जैन मतों की समीक्षा।

द्वादश समुल्लास

ओ३म्

अनुभूमिका (२)

जब आर्य्यावर्त्तस्थ मनुष्यों में सत्याऽसत्य का यथावत् निर्णय कारक वेदविद्या छूटकर अविद्या फैलके मतमतान्तर खड़े हुए, यही जैन आदि के विद्याविरुद्धमतप्रचार का निमित्त हुआ। क्योंकि ‘वाल्मीकीय’ और ‘महाभारतादि’ में जैनियों का नाममात्र भी नहीं लिखा और जैनियों के ग्रन्थों में ‘वाल्मीकीय’ और भारत में कथित ‘राम-कृष्णादि’ की गाथा बड़े विस्तारपूर्वक लिखी हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि यह मत इनके पीछे चला, क्योंकि जैसा अपने मत को बहुत प्राचीन जैनी लोग लिखते हैं, वैसा होता तो वाल्मीकीय आदि ग्रन्थों में उनकी कथा अवश्य होती, इसलिये जैनमत इन ग्रन्थों के पीछे चला है।

कोई कहे कि जैनियों के ग्रन्थों में से कथाओं को लेकर वाल्मीकीय आदि ग्रन्थ बने होंगे तो उनसे पूछना चाहिये कि वाल्मीकीय आदि में तुम्हारे ग्रन्थों का नाम लेख भी क्यों नहीं? और तुम्हारे ग्रन्थों में क्यों है? क्या पिता के जन्म का दर्शन पुत्र कर सकता है? कभी नहीं। इससे यही सिद्ध होता है कि जैन-बौद्ध मत; शैव-शाक्तादि मतों के पीछे चला है।

अब इस १२ बारहवें समुल्लास में जो-जो जैनियों के मतविषयक लिखा गया है, सो-सो उनके ग्रन्थों के पतेपूर्वक लिखा है। इसमें जैनी लोगों को बुरा न मानना चाहिये, क्योंकि जो-जो हमने इनके मतविषय में लिखा है, वह केवल सत्याऽसत्य के निर्णयार्थ है, न कि विरोध वा हानि करने के अर्थ। इस लेख को जब जैनी, बौद्ध वा अन्य लोग देखेंगे तब सबको सत्याऽसत्य के निर्णय में विचार और लेख करने का समय मिलेगा और बोध भी होगा। जबतक वादी-प्रतिवादी होकर प्रीति से वाद वा लेख न किया जाय तबतक सत्याऽसत्य का निर्णय नहीं हो सकता। जब विद्वान् लोगों में सत्याऽसत्य का निश्चय नहीं होता तभी अविद्वानों को महा अन्धकार में पड़कर बहुत दुःख उठाना पड़ता है, इसलिये सत्य के जय और असत्य के क्षय के अर्थ सुहृदता से वाद वा लेख करना हम मनुष्य जाति का मुख्य काम है। यदि ऐसा न हो तो मनुष्यों की उन्नति कभी न हो सके।

और यह बौद्ध-जैन मत का विषय विना इनके अन्य-मतवालों को अपूर्व लाभ और बोध करनेवाला होगा, क्योंकि ये लोग अपने पुस्तकों को किसी अन्य मतवाले को देखने, पढ़ने वा लिखने को भी नहीं देते। बड़े परिश्रम से मेरे और विशेष आर्यसमाज मुम्बई के मन्त्री ‘सेठ सेवकलाल कृष्णदास’ के पुरुषार्थ से ग्रन्थ प्राप्त हुए हैं। तथा काशीस्थ ‘जैनप्रभाकर’ यन्त्रालय में छपने और मुम्बई में ‘प्रकरणरत्नाकर’ ग्रन्थ के छपने से भी सब लोगों को जैनियों का मत देखना सहज हुआ है।

भला, यह किन विद्वानों की बात है कि अपने मत के पुस्तक आप ही देखना और दूसरों को न दिखलाना? इसी से विदित होता है कि इन ग्रन्थों के बनानेवालों को प्रथम ही शङ्का थी कि इन ग्रन्थों में असम्भव बातें हैं, जो दूसरे मतवाले देखेंगे तो खण्डन करेंगे और हमारे मतवाले दूसरों के ग्रन्थ देखेंगे तो इस मत में श्रद्धा न रहेगी।

अस्तु, जो हो परन्तु बहुत मनुष्य ऐसे हैं, कि जिनको अपने दोष तो नहीं दीखते, किन्तु दूसरों के दोष देखने में अति उद्युक्त रहते हैं। यह न्याय की बात नहीं, क्योंकि प्रथम अपने दोष देख निकालके पश्चात् दूसरे के दोषों में दृष्टि देके निकालें।

अब इन बौद्ध-जैनियों के मत का विषय सब सज्जनों के सन्मुख धरता हूँ, जैसा है, वैसा विचारें।

किमधिकलेखेन बुद्धिमद्वर्य्येषु

अथ द्वादशसमुल्लासारम्भः

अथ नास्तिकमतान्तर्गतचार्वाकबौद्धजैनमत- खण्डनमण्डनविषयान् व्याख्यास्यामः

कोई एक ‘बृहस्पति’ नामा पुरुष हुआ था जो वेद, ईश्वर और यज्ञादि उत्तम कर्मों को भी नहीं मानता था। देखिये! उनका मत—

यावज्जीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥
[सर्वदर्शनसंग्रह चार्वाकदर्शन]

कोई मनुष्यादि प्राणी मृत्यु के अगोचर नहीं है अर्थात् सबको मरना है, इसलिये जबतक शरीर में जीव रहै, तबतक सुख से रहै। जो कोई कहे कि “धर्माचरण से कष्ट होता है, जो धर्म को छोड़ें तो पुनर्जन्म में बड़ा दुःख पावें।” उसको ‘चार्वाक’ उत्तर देता है कि अरे भोले भाई! जो मरे के पश्चात् शरीर भस्म हो जाता है कि जिसने खाया-पीया है, वह पुनः संसार में न आवेगा। इसलिये जैसे हो सके वैसे आनन्द में रहो, लोक में नीति से चलो, ऐश्वर्य्य को बढ़ाओ और उससे इच्छित भोग करो। यही लोक समझो, परलोक कुछ नहीं।

देखो! पृथिवी, जल, अग्नि, वायु इन चार भूतों के परिणाम से यह शरीर बना है, इसमें इनके योग से चैतन्य उत्पन्न होता है। जैसे मादक द्रव्य खाने-पीने से मद (नशा) उत्पन्न होता है, इसी प्रकार जीव शरीर के साथ उत्पन्न होकर शरीर के नाश के साथ आप भी नष्ट हो जाता है, फिर किसको पाप-पुण्य का फल होगा?

तच्चैतन्यविशिष्टदेह एव आत्मा देहातिरिक्त आत्मनि प्रमाणाभावात्॥ [चार्वाक दर्शन]

इस शरीर में चारों भूतों के संयोग से जीवात्मा उत्पन्न होकर उन्हीं के वियोग के साथ ही नष्ट हो जाता है, क्योंकि मरे पीछे कोई भी जीव प्रत्यक्ष नहीं होता। हम एक प्रत्यक्ष ही को मानते हैं, क्योंकि प्रत्यक्ष के विना अनुमानादि होते ही नहीं। इसलिए मुख्य प्रत्यक्ष के सामने अनुमानादि गौण होने से उनका ग्रहण नहीं करते। सुन्दर स्त्री के आलिङ्गन से आनन्द का करना पुरुषार्थ का फल है।

उत्तर—ये पृथिव्यादि भूत जड़ हैं, उनसे चेतन की उत्पत्ति कभी नहीं हो सकती। जैसे अब माता-पिता के संयोग से देह की उत्पत्ति होती है, वैसे ही आदि सृष्टि में मनुष्यादि शरीरों की आकृति परमेश्वर कर्त्ता के विना कभी नहीं हो सकती। मद के समान चेतन की उत्पत्ति और विनाश नहीं होता, क्योंकि मद चेतन को होता है, जड़ को नहीं। पदार्थ ‘नष्ट’ अर्थात् अदृष्ट होते हैं परन्तु अभाव किसी का नहीं होता, इसी प्रकार अदृश्य होने से जीव का भी अभाव न मानना चाहिये। जब जीवात्मा सदेह होता है तभी उसकी प्रकटता होती है। जब शरीर को छोड़ देता है, तब यह शरीर जो मृत्यु को प्राप्त हुआ है, वह जैसा चेतनयुक्त पूर्व था, वैसा नहीं हो सकता। यही बात बृहदारण्यक में कही है—

नाहं मोहं ब्रवीमि अनुच्छित्तिधर्मायमात्मेति॥ [तुलना—अ॰ ४।ब्रा॰ ५। कं॰ १४]

याज्ञवल्क्य कहते हैं कि “हे मैत्रेयि! मैं मोह से बात नहीं करता किन्तु आत्मा अविनाशी है, जिसके योग से शरीर चेष्टा करता है।” जब जीव शरीर से पृथक् हो जाता है तब शरीर में ज्ञान कुछ भी नहीं रहता। जो देह से पृथक् आत्मा न हो, तो जिसके संयोग से चेतनता और वियोग से जड़ता होती है वह देह से पृथक् है। जैसे आँख सबको देखती है परन्तु अपने को नहीं, इसी प्रकार प्रत्यक्ष का करनेवाला अपने ऐन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं कर सकता। जैसे अपनी आँख से सब घट-पटादि पदार्थ देखता है, वैसे आँख को अपने ज्ञान से देखता है। जो द्रष्टा है वह द्रष्टा ही रहता है, दृश्य कभी नहीं होता। जैसे विना आधार आधेय, कारण के विना कार्य्य, अवयवी के विना अवयव और कर्त्ता के विना कर्म नहीं रह सकते, वैसे कर्त्ता के विना प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है?

जो सुन्दर स्त्री के साथ समागम करने ही को पुरुषार्थ का फल मानो तो क्षणिक सुख और उससे दुःख भी होता है, वह भी पुरुषार्थ ही का फल होगा। जब ऐसा है तो स्वर्ग की हानि होने से दुःख भोगना पड़ेगा। जो कहो दुःख के छुड़ाने और सुख के बढ़ाने में यत्न करना चाहिये तो मुक्ति-सुख की हानि हो जाती है, इसलिये वह पुरुषार्थ का फल नहीं।

चार्वाक—जो दुःख-संयुक्त सुख का त्याग करते हैं, वे मूर्ख हैं। जैसे धान्यार्थी धान्य का ग्रहण और बुस का त्याग करता है, वैसे इस संसार में बुद्धिमान् सुख का ग्रहण और दुःख का त्याग करें। क्योंकि इस लोक के उपस्थित सुख को छोड़के अनुपस्थित स्वर्ग के सुख की इच्छा कर धूर्तकथित वेदोक्त अग्निहोत्रादि कर्म, उपासना और ज्ञानकाण्ड का अनुष्ठान परलोक के लिये करते हैं, वे अज्ञानी हैं। जो परलोक है ही नहीं, तो उसकी आशा करना मूर्खता का काम है। क्योंकि—

अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम्।
बुद्धिपौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पतिः॥
[चार्वाकदर्शन]

चार्वाकमतप्रचारक ‘बृहस्पति’ कहता है कि—“अग्निहोत्र, तीन वेद, तीन दण्ड और भस्म का लगाना बुद्धि और पुरुषार्थरहित पुरुषों ने जीविका बना ली है।” किन्तु काँटे लगने आदि से उत्पन्न हुए दुःख का नाम ‘नरक’, लोकसिद्ध राजा ‘परमेश्वर’ और देह का नाश होना ‘मोक्ष’, अन्य कुछ भी नहीं है।

उत्तर—विषयरूपी सुखमात्र को पुरुषार्थ का फल मानकर विषयदुःख-निवारणमात्र में कृतकृत्यता और स्वर्ग मानना मूर्खता है। अग्निहोत्रादि यज्ञों से वायु, वृष्टि, जल की शुद्धि द्वारा आरोग्यता का होना, उससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है, उसको न जानकर वेद, ईश्वर और वेदोक्त धर्म की निन्दा करना धूर्तों का काम है। जो त्रिदण्ड और भस्मधारण का खण्डन है, सो ठीक है।

यदि कण्टकादि से उत्पन्न ही दुःख का नाम नरक हो तो उससे अधिक महारोगादि नरक क्यों नहीं? यद्यपि राजा को ऐश्वर्यवान् और प्रजापालन में समर्थ होने से श्रेष्ठ मानें, तो ठीक है परन्तु जो अन्यायकारी पापी राजा हो, उसको भी परमेश्वरवत् मानते हो, तो तुम्हारे जैसा कोई भी मूर्ख नहीं। शरीर का विच्छेद होना मात्र मोक्ष है, तो गदहे, कुत्ते आदि और तुममें क्या भेद रहा, किन्तु आकृति ही मात्र भिन्न रही।

चारवाक—

अग्निरुष्णो जलं शीतं समस्पर्शस्तथाऽनिलः।
केनेदं चित्रितं तस्मात् स्वभावात्तद्व्यवस्थितिः॥१॥
न स्वर्गो नाऽपवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिकः।
नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फलदायिकाः॥२॥
पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति।
स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते॥३॥
मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारणम्।
गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थं पाथेयकल्पनम्॥४॥
स्वर्गस्थिता यदा तृप्तिं गच्छेयुस्तत्र दानतः।
प्रासादस्योपरिस्थानामत्र कस्मान्न दीयते॥५॥
यावज्जीवेत्सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिबेत्।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥६॥
यदि गच्छेत्परं लोकं देहादेष विनिर्गतः।
कस्माद् भूयो न चायाति बन्धुस्नेहसमाकुलः॥७॥
ततश्च जीवनोपायो ब्राह्मणैर्विहितस्त्विह।
मृतानां प्रेतकार्याणि न त्वन्यद्विद्यते क्वचित्॥८॥
त्रयो वेदस्य कर्त्तारो भण्डधूर्तनिशाचराः।
जर्फरीतुर्फरीत्यादि पण्डितानां वचः स्मृतम्॥९॥
अश्वस्यात्र हि शिश्नन्तु पत्नीग्राह्यं प्रकीर्त्तितम्।
भण्डैस्तद्वत्परं चैव ग्राह्यजातं प्रकीर्त्तितम्॥१०॥
मांसानां खादनं तद्वन्निशाचरसमीरितम्॥११॥
[चार्वाकदर्शन, श्लोक ११-१२। श्लोक १४-२२]

‘चार्वाक’, ‘आभाणक’, ‘बौद्ध’ और ‘जैन’ भी जगत् की उत्पत्ति स्वभाव से मानते हैं। जो-जो स्वाभाविक गुण हैं, उस-उससे द्रव्य संयुक्त होकर सब पदार्थ बनते हैं, कोई जगत् का कर्त्ता नहीं॥१॥ परन्तु इनमें से चार्वाक ऐसा मानता है। किन्तु परलोक और जीवात्मा बौद्ध-जैन मानते हैं, चार्वाक नहीं। शेष इन तीनों का मत कोई-कोई बात छोड़के एक सा है। न कोई स्वर्ग, न कोई नरक और न कोई परलोक में जानेवाला आत्मा है और न वर्णाश्रम की क्रिया फलदायक है॥२॥ जो यज्ञ में पशु को मार होम करने से वह स्वर्ग को जाता हो, तो यजमान अपने पिता आदि को मार यज्ञ में होम करके स्वर्ग को क्यों नहीं भेजता?॥३॥ जो मरे हुए जीवों को श्राद्ध और तर्पण तृप्तिकारक होता है तो परदेश में जानेवाले मार्ग में निर्वाहार्थ अन्न, वस्त्र, धन को क्यों ले जाते? ले[जा]ना व्यर्थ हो जाय। क्योंकि जैसे मृतक के नाम से अर्पण किया हुआ स्वर्ग में पहुँचता है, तो परदेश में जानेवालों के लिए उनके सम्बन्धी भी घर में अर्पण कर देशान्तर में पहुँचा देवें। जो यह नहीं पहुँचता, तो स्वर्ग में क्योंकर पहुँच सकता है?॥४॥ जो मर्त्यलोक में दान करने से स्वर्गवासी तृप्त होते हैं, तो नीचे देने से घर के ऊपर स्थित पुरुष तृप्त क्यों नहीं होता?॥५॥ इसलिए जबतक जीवे, तबतक सुख से जीवे। जो घर में पदार्थ न हो तो ऋण करके आनन्द करे, ऋण देना नहीं पड़ेगा। क्योंकि जिस शरीर में जीव ने खाया-पीया है, उन दोनों का पुनरागमन न होगा, फिर किससे कौन माँगे और देवेगा?॥६॥ जो लोग कहते हैं कि मृत्युसमय जीव शरीर से निकलके परलोक को जाता है, यह बात मिथ्या है, क्योंकि जो ऐसा होता, तो कुटुम्ब के मोह से बद्ध होकर पुनः घर में क्यों नहीं आ जाता?॥७॥ इसलिए यह सब ब्राह्मणों ने अपनी जीविका का उपाय किया है। जो दशगात्रादि मृतकक्रिया करते हैं, यह सब उनकी जीविका की लीला है॥८॥ वेद के करनेहारे भांड, धूर्त्त और राक्षस, ये तीन हैं। ‘जर्फरी’ ‘तुर्फरी’ इत्यादि पण्डितों के धूर्त्ततायुक्त वचन हैं॥९॥ देखो धूर्त्तों की रचना! “घोड़े के लिङ्ग को स्त्री ग्रहण करे।” उसके साथ समागम यजमान की स्त्री से कराना, कन्या से ठट्ठा आदि लिखना, धूर्त्तों के विना नहीं हो सकता॥१०॥ और जो मांस का खाना लिखा है, वह वेदभाग राक्षस का बनाया है॥११॥

उत्तर—विना चेतन परमेश्वर के निर्माण किये जड़ पदार्थ आपस में स्वभाव से नियमपूर्वक मिलकर उत्पन्न नहीं हो सकते। इस वास्ते सृष्टि का कर्त्ता अवश्य होना चाहिये। जो स्वभाव से हों तो द्वितीय पृथिवी, सूर्य, चन्द्र आप से आप क्यों नहीं होते॥१॥ ‘स्वर्ग’ सुखभोग और ‘नरक’ दुःखभोग का नाम है। जो जीवात्मा न होता, तो सुख-दुःख का भोक्ता कौन हो सके? जैसे इस समय सुख-दुःख का भोक्ता जीव है, वैसे परजन्म में भी होता है। क्या सत्यभाषणादि दया आदि क्रिया भी वर्णाश्रमियों की निष्फल होगी? कभी नहीं॥२॥ पशु मारके होम करना वेद में कहीं नहीं है, इसलिये यह खण्डन अखण्डनीय है और मृतकों का श्राद्ध भी कपोलकल्पित होने से वेदविरुद्ध पुराण मत-वालों का है॥३, ४, ५॥ जो वस्तु है, उसका अभाव कभी नहीं होता। तो विद्यमान जीव का अभाव कभी नहीं हो सकता। देह भस्म हो जाता है, जीव नहीं। जीव तो दूसरे शरीर में जाता है, इसलिए जो कोई ऋणादि पाप से सुख भोग करेगा, वह दूसरे जन्म में अवश्य भोगेगा॥६॥ देह से निकलके जीव स्थानान्तर और शरीरान्तर [को] प्राप्त होता है, उसको पूर्वजन्म का ज्ञान कुछ भी नहीं रहता, इसलिए पुनश्च कुटुम्ब में नहीं आता॥७॥ हाँ ब्राह्मणों ने प्रेत का कर्म जीविका के लिये किया है, वेदोक्त नहीं॥८॥ जो चार्वाक आदि ने असल वेद देखे होते, तो वेद की निन्दा कभी न करते। भाँड, धूर्त्त और निशाचरवत् पुरुष टीकाकार हुए हैं, उन्हीं की धूर्त्तता है, वेद की नहीं। परन्तु शोक है चार्वाक, आभाणक, बौद्ध और जैनियों पर कि इन्होंने मूल वेद न सुने, न देखे और न किसी विद्वान् से पढ़े, इसीलिए भ्रष्ट टीका और वाममार्गियों की लीला देखके वेदों से विरोध करके, नष्ट-भ्रष्ट बुद्धि होकर वेदों की निन्दा करने लगे हैं। यही वाममार्गियों की दुष्ट चेष्टा चार्वाक, बौद्ध और जैन मत के होने का कारण है, क्योंकि चार्वाक आदि भी वेदों का सत्य अर्थ [नहीं जान सके]॥९॥ भला! विचार करना चाहिए कि स्त्री [से] अश्व के उपस्थ ग्रहण आदि लीला, और मांस का खाना आदि टीकाकारों की धूर्तता है, वेद की नहीं। सिवाय वाममार्गी लोगों के अन्य भ्रष्ट, वेदार्थ से विपरीत, अशुद्ध व्याख्यान कौन करता? ॥ १०। ११॥ यही चार्वाक बौद्धों के होने का कारण है, क्योंकि बौद्ध लोगों ने चार्वाकों में से बहुत-सा चार्वाकों का मत और थोड़ा-सा अपना भी गाँठ का लगाया है, इसी से बौद्धों की शाखा पृथक् चली है। अब जो चार्वाकादिकों में भेद है, सो लिखते हैं—ये चारवाकादि बहुत सी बातों में एक हैं परन्तु चार्वाक देह की उत्पत्ति के साथ जीवोत्पत्ति और उसके नाश के साथ ही जीवन का भी नाश मानता है। पुनर्जन्म और परलोक को नहीं मानता। एक प्रत्यक्ष प्रमाण के विना अनुमानादि प्रमाणों को भी नहीं मानता। चारवाक का अर्थ—जो बोलने में प्रगल्भ और विशेषार्थ वैतण्डिक होता है। और बौद्घ-जैन प्रत्यक्षादि चारों प्रमाण, अनादि जीव, पुनर्जन्म, परलोक और मुक्ति को भी मानते हैं। इतना ही चार्वाक से बौद्घ और जैनियों का भेद है परन्तु नास्तिकता, वेद ईश्वर की निन्दा, परमतद्वेष, छः यतना और जगत् का कर्त्ता कोई नहीं, इत्यादि बातों में सब एक ही हैं। यह चार्वाक का मत संक्षेप से दर्शा दिया है।

अब बौद्धमत के विषय में संक्षेप से लिखते हैं—

कार्य्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात्।
अविनाभावनियमो दर्शनान्तरदर्शनात्॥ [सर्वदर्शनसंग्रह बौद्धदर्शन]

‘कार्य्यकारणभाव’ अर्थात् कार्य्य के दर्शन से कारण और कारण के दर्शन से कार्य्यादि का साक्षात्कार प्रत्यक्ष से शेष में अनुमान होता है, इसके विना प्राणियों के सम्पूर्ण व्यवहार पूर्ण नहीं हो सकते, इत्यादि लक्षण से अनुमान को अधिक मानकर चारवाक से भिन्न शाखा बौद्धों की हुई, अन्य बहुत-सी बातें चारवाकों की ली हैं। ये बौद्ध चार प्रकार के होते हैं—एक ‘माध्यमिक’, दूसरा ‘योगाचार’, तीसरा ‘सौत्रान्तिक’ और चौथा ‘वैभाषिक’। ‘बुद्ध्या निर्वर्त्तते सः बौद्धः’ जो बुद्धि से सिद्ध हो अर्थात् जो-जो बात अपनी बुद्धि में आवे उस-उस को माने और जो न आवे उसको न मानते।

इनमें से पहला ‘माध्यमिक’ सर्वशून्य मानता है। अर्थात् जितने पदार्थ हैं, वे सब ‘शून्य’ हैं अर्थात् आदि में नहीं होते, अन्त में नहीं रहते, मध्य में जो प्रतीत होता है वह भी प्रतीत समय में है, पश्चात् शून्य हो जाता है। जैसे उत्पत्ति के पूर्व घट नहीं था, प्रध्वंस के पश्चात् नहीं रहता और घटज्ञान समय में भासता और पदार्थान्तर में ज्ञान जाने से घटज्ञान नहीं रहता, इसलिए शून्य ही एक तत्त्व है, ऐसा मानता है। दूसरा ‘योगाचार’ जो बाह्य शून्य मानता है। अर्थात् पदार्थ भीतर ज्ञान में भासते हैं, बाहर नहीं। जैसे घट का ज्ञान आत्मा में है तभी मनुष्य कहता है कि “यह घट है”, जो भीतर ज्ञान न हो तो नहीं कह सकता, ऐसा मानता है। तीसरा ‘सौत्रान्तिक’ जो बाहर अर्थ का अनुमान मानता है, क्योंकि बाहर कोई पदार्थ साङ्गोपाङ्ग प्रत्यक्ष नहीं होता किन्तु एकदेश प्रत्यक्ष होने से शेष में अनुमान किया जाता है, इसका ऐसा मत है। चौथा ‘वैभाषिक’ है, उसका मत बाहर पदार्थ प्रत्यक्ष होता है, भीतर नहीं। जैसे ‘अयं नीलो घटः’ इस प्रतीति में नीलयुक्त घटाकृति बाहर प्रतीत होती है, यह ऐसा मानता है। यद्यपि इनका आचार्य्य बुद्ध उपदेष्टा जनानेवाला एक था तथापि सुननेवाले पुरुषों और शिष्यों के बुद्धिभेद से चार प्रकार शाखा हो गई हैं। जैसे सूर्य के अस्त होने में जार पुरुष जारकर्म, चोर चौरीकर्म और पूर्ण विद्वान् सदाचरण करते हैं। समय एक और अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार भिन्न-भिन्न चेष्टा करते हैं।

अब इन पूर्वोक्त चारों में ‘माध्यमिक’—सबको क्षणिक मानता है। अर्थात् क्षण-क्षण में बुद्धि का परिणाम होने से जो पूर्व क्षण में ज्ञात वस्तु था, वैसा ही दूसरे क्षण में नहीं रहता, इसलिए सबको क्षणिक मानना चाहिए, ऐसे मानता है। दूसरा ‘योगाचार’ जो-जो प्रवृत्ति है सो-सो सब दुःखरूप है, क्योंकि प्राप्ति में संतुष्ट कोई भी नहीं होता। एक की प्राप्ति में दूसरे अप्राप्तों की इच्छा बनी ही रहती है, इस प्रकार मानता है। तीसरा ‘सौत्रान्तिक’—सब पदार्थ अपने-अपने लक्षणों से लक्षित होते हैं, जैसे गाय के चिह्नों से गाय और घोड़े के चिह्नों से घोड़ा ज्ञात होता है, वैसे लक्षण लक्ष्य में सदा रहते हैं, ऐसा कहता है। चौथा ‘वैभाषिक’—शून्य को एक पदार्थ मानता है। प्रथम माध्यमिक सबको शून्य मानता था, उसी का पक्ष वैभाषिक का भी है, इत्यादि बौद्धों में बहुत-से विवाद पक्ष हैं। इस प्रकार चार प्रकार की भावना मानते हैं।

उत्तर—जो सब शून्य हो तो शून्य का जाननेवाला शून्य नहीं होता और जो सब शून्य होवे तो शून्य को शून्य नहीं जान सके, इसलिए शून्य का ज्ञाता और ज्ञेय शून्य दो पदार्थ सिद्ध होते हैं। और जो योगाचार बाह्य-शून्यत्व मानता है तो पर्वत इसके भीतर होना चाहिये। जो कहे कि पर्वत भीतर है तो उसके हृदय में पर्वत के समान अवकाश कहाँ है? इसलिए बाहर पर्वत है और पर्वतज्ञान आत्मा में रहता है। सौत्रान्तिक किसी पदार्थ को प्रत्यक्ष नहीं मानता, तो वह आप स्वयं और उसका वचन भी अनुमेय होना चाहिये, प्रत्यक्ष नहीं। जो प्रत्यक्ष न हो तो ‘अयं घटः’ यह प्रयोग न होना चाहिये, किन्तु ‘अयं घटैकदेशः’ यह घड़ा का एक देश है और एक देश का नाम घड़ा नहीं, किन्तु समुदाय का नाम घट है। ‘यह घड़ा है’ वह प्रत्यक्ष है, अनुमेय नहीं, क्योंकि सब अवयवों में अवयवी एक है, उसके प्रत्यक्ष होने से सब घट के अवयव भी प्रत्यक्ष होते हैं, अर्थात् सावयव घट प्रत्यक्ष होता है। चौथा वैभाषिक जो बाह्य पदार्थों को प्रत्यक्ष मानता है, वह भी ठीक नहीं। क्योंकि जहाँ ज्ञाता और ज्ञान होता है, वहीं प्रत्यक्ष होता है। अर्थात् आत्मा में सबका प्रत्यक्ष होता है। यद्यपि प्रत्यक्ष का विषय बाहर होता है, तथापि तदाकार ज्ञान आत्मा को होता है। वैसे जो क्षणिक पदार्थ और उसका ज्ञान क्षणिक हो तो ‘प्रत्यभिज्ञा’ अर्थात् ‘मैंने वह बात की थी’ अथवा ‘वह चीज देखी थी’ स्मरण न होना चाहिये, परन्तु पूर्व दृष्ट-श्रुत का स्मरण होता है, इसलिये क्षणिकवाद भी ठीक नहीं। जो सब दुःख ही हो और सुख न हो तो सुख की अपेक्षा के विना दुःख सिद्ध नहीं हो सकता, जैसे रात्रि की अपेक्षा से दिन और दिन की अपेक्षा से रात्रि होती है, इसलिये सबको दुःख मानना ठीक नहीं। जो स्वलक्षण ही मानें तो नेत्र रूप का लक्षण है और रूप लक्ष्य है जैसे घट का रूप। घट के रूप का लक्षण चक्षु, लक्ष्य से भिन्न है और गन्ध पृथिवी से अभिन्न है, इसी प्रकार भिन्नाऽभिन्न लक्ष्य लक्षण मानना चाहिये। शून्य का उत्तर जो पूर्व दिया है वही अर्थात् शून्य का जाननेवाला शून्य से भिन्न होता है।

सर्वस्य संसारस्य दुःखात्मकत्वं सर्वतीर्थङ्करसंम्मतम्॥ [बौद्धदर्शन]

[सब संसार दुःखमय है, यह सब तीर्थंकरों का मत है।] जिनको बौद्ध तीर्थंकर मानते हैं, उन्हीं को जैन भी मानते हैं, इसीलिये ये दोनों एक हैं। और पूर्वोक्त ‘ भावनाचतुष्टय’ अर्थात् चार भावनाओं से सकल वासनाओं की निवृत्ति से शून्यरूप ‘निर्वाण’ अर्थात् मुक्ति मानते हैं। अपने शिष्यों को ‘योग’ और ‘आचार’ का उपदेश करते हैं—गुरु के वचन का प्रमाण करना, अनादि बुद्धि में वासना होने से बुद्धि ही अनेकाकार भासती है। और चित्तचैत्तात्मक स्कन्ध पांच प्रकार का मानते हैं—रूपविज्ञानवेदनासंज्ञासंस्कारसंज्ञकः॥ [बौद्धदर्शन]

उनमें से प्रथम स्कन्ध—जो इन्द्रियों से रूपादि विषय ग्रहण किया जाता है, वह ‘रूपस्कन्ध’। (दूसरा) आलयविज्ञान, प्रवृत्ति अर्थात् जिसमें रूपादि विषय रहते हैं उनका विज्ञान-प्रवृत्ति का जाननारूप व्यवहार को ‘विज्ञानस्कन्ध’। (तीसरा) रूपस्कन्ध और विज्ञानस्कन्ध से उत्पन्न हुआ सुख-दुःख आदि प्रतीतिरूप व्यवहार को ‘वेदनास्कन्ध’। (चौथा) गौ आदि संज्ञा का सम्बन्ध नामी के साथ मानने रूप को ‘संज्ञास्कन्ध’। (पाँचवाँ) वेदनास्कन्ध से रागद्वेषादि क्लेश और क्षुधा-तृषादि उपक्लेश, मद, प्रमाद, अभिमान, धर्म और अधर्मरूप व्यवहार को ‘संस्कारस्कन्ध’ मानते हैं। सब संसार को दुःखरूप, दुःख का घर और दुःख का साधनरूप भावना करके संसार से छूटना, चारवाकों से अधिक मुक्ति, अनुमान और जीव को मानना, बौद्ध मानते हैं।

देशना लोकनाथानां सत्त्वाशयवशानुगाः।
भिद्यन्ते बहुधा लोके उपायैर्बहुभिः किल॥१॥
गम्भीरोत्तानभेदेन क्वचिच्चोभयलक्षणा।
भिन्ना हि देशनाऽभिन्ना शून्यताऽद्वयलक्षणा॥२॥
द्वादशायतनपूजा श्रेयस्करीति बौद्धा मन्यन्ते—
अर्थानुपाद्य बहुशो द्वादशायतनानि वै।
परितः पूजनीयानि किमन्यैरिह पूजितैः॥३॥
ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा कर्मेन्द्रियाणि च।
मनो बुद्धिरिति प्रोक्तं द्वादशायतनं बुधैः॥४॥
[बौद्धदर्शन]

अर्थ—लोकों के स्वामी बुद्ध आदि महान् गुरुओं के उपदेश, समझने वाले शिष्यों की बुद्धि के वश होकर अर्थात् उनकी बुद्धि के भेद के अनुसार और लोक प्रचलित विभिन्न मार्गों या उपायों के कारण भिन्न-भिन्न हो जाते हैं॥ १॥ उनके उपदेश कहीं गम्भीर हैं, कहीं सुस्पष्ट हैं; कहीं गम्भीर और सुस्पष्ट दोनों विशेषताओं से युक्त हैं। इन भेदों के कारण से वे भिन्न प्रतीत होते हैं; किन्तु मूल तत्त्व वा उपदेश सबका एकमात्र ‘शून्यता’ का है, उसमें किसी के दो मत नहीं हैं॥ २॥ जो द्वादशायतन पूजा है, वही मोक्ष करने वाली है—उस पूजा के लिये बहुत से द्रव्यादि पदार्थों को प्राप्त होके ‘द्वादशायतन’ अर्थात् बारह प्रकार के स्थान विशेष बनाके सब प्रकार से पूजा करनी चाहिये, अन्य की पूजा से क्या प्रयोजन?॥३॥ द्वादशायतन पू्जा यह हैः—पाँच ‘ज्ञानेन्द्रिय’ अर्थात् श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, जिह्वा और नासिका; पाँच ‘कर्मेन्द्रिय’ अर्थात् वाक्, हस्त, पग, उपस्थ और गुह्य, मन और बुद्धि इन ही का ‘सत्कार’ अर्थात् इनको आनन्द में प्रवृत्त रखना बौद्धों का मत है॥४॥

उत्तर—जो सब संसार दुःखरूप होता तो किसी जीव की प्रवृत्ति न होनी चाहिये। संसार में जीवों की प्रवृत्ति प्रत्यक्ष दीखती है, इसलिये सब संसार दुःखरूप नहीं हो सकता किन्तु इसमें सुख-दुःख दोनों हैं। और जो बौद्घ यह बात कहते हैं तो खानपानादि और शरीररक्षण करने में प्रवृत्त होकर सुख क्यों मानते हैं? जो कहो कि हम प्रवृत्त तो होते हैं परन्तु इसको दुःख ही मानते हैं तो यह कथन ही सम्भव नहीं। क्योंकि जीव सुख जानकर प्रवृत्त और दुःख जानके निवृत्त होता है। संसार में धर्मक्रिया, विद्या, सत्सङ्ग आदि सब व्यवहार सुखकारक हैं। जो पंच स्कन्ध कहे हैं, वे भी अपूर्ण हैं। क्योंकि ऐसे जो स्कन्ध विचारने लगें तो एक-एक के अनेक भेद हो सकते हैं। जिन तीर्थङ्करों को उपदेशक और लोकनाथ मानते हैं, अनादि ईश्वर को नहीं मानते तो उन्होंने उपदेश कहाँ से पाया? जो कहो कि स्वयं प्राप्त हुए तो कारण के विना कार्य्य नहीं हो सकता। न इस समय उपदेश के विना किसी को ज्ञान हो सकता है और जो होता है तो तुम और अन्य को भी हो जायगा। उपदेशक बुद्ध आदि की क्या आवश्यकता है॥१॥ जो शून्यरूप ही अद्वैत उपदेश बौद्धों का है तो विद्यमान वस्तु शून्यरूप कभी नहीं होता; हां, सूक्ष्म कारणरूप तो हो जाता है। जो द्रव्यों के उपार्जन से पूर्वोक्त द्वादशायतनपूजा मोक्ष का साधन कहा तो दश प्राण और ग्यारहवें जीव की पूजा क्यों नहीं करते? और जब इन्द्रिय और अन्तःकरण की पूजा मोक्षप्रद है तो विषयीजन और बौद्धों में क्या भेद रहा? फिर मुक्ति कहाँ? पूर्व सब में दुःखरूप भावना की और फिर द्वादशायतनपूजा लगाई। इसलिये इनका मत सर्वांश सत्य नहीं।

बौद्धानां सुगतो देवो विश्वं च क्षणभङ्गुरम्।
आर्य्यसत्याख्यया तत्त्वचतुष्टयमिदं क्रमात्॥१॥
दुःखमायतनं चैव ततः समुदयो मतः।
मार्गश्चेत्यस्य च व्याख्या क्रमेण श्रूयतामतः॥२॥
दुःखं संसारिणः स्कन्धास्ते च पञ्च प्रकीर्त्तिताः।
विज्ञानं वेदना संज्ञा संस्कारो रूपमेव च॥३॥
पञ्चेन्द्रियाणि शब्दाद्या विषयाः पञ्च मानसम्।
धर्मायतनमेतानि द्वादशायतनानि तु॥४॥
रागादीनां गणो यस्मात् समुदेति नृणां हृदि।
आत्मात्मीयस्वभावाख्यः स स्यात्समुदयः पुनः॥५॥
क्षणिकाः सर्वसंस्कारा इति या वासना स्थिरा।
स मार्ग इति विज्ञेयः स च मोक्षोऽभिधीयते॥६॥
प्रत्यक्षमनुमानं च प्रमाणद्वितयं तथा।
चतुःप्रस्थानिका बौद्धाः ख्याता वैभाषिकादयः॥७॥
अर्थो ज्ञानान्वितो वैभाषिकेण बहु मन्यते।
सौत्रान्तिकेन प्रत्यक्षग्राह्योऽर्थो न बहिर्मतः॥८॥
आकारसहिता बुद्धिर्योगाचारस्य संमता।
केवलां संविदं स्वस्थां मन्यन्ते मध्यमाः पुनः॥९॥
रागादिज्ञानसन्तानवासनाच्छेदसम्भवा।
चतुर्णामपि बौद्धानां मुक्तिरेषा प्रकीर्तिता॥१०॥
कृत्तिः कमण्डलुर्मौण्ड्यं चीरं पूर्वाह्णभोजनम्।
संघो रक्ताम्बरत्वं च शिश्रिये बौद्धभिक्षुभिः॥११॥
[बौद्धदर्शन श्लोक ५-१३। श्लोक १-२]

अर्थ—बौद्धों का सुगतदेव बुद्ध भगवान् पूजनीय देव है और जगत् क्षणभंगुर है। ‘आर्यसत्य’ नाम से प्रसिद्ध उनके चार तत्त्व हैं, वे क्रम से इस प्रकार हैं—॥ १॥ वे हैं—दुःख, दुःख का आश्रय स्थान, समुदय=दुःख की उत्पत्ति का कारण, और मार्ग=दुःख से छूटने का मार्ग। अब इन चारों तत्त्वों=‘आर्य-सत्यों’ की व्याख्या क्रम से सुनो—॥ २॥ संसार में रहनेवाले प्राणियों के पांच स्कन्धों को ‘दुःख’ कहते हैं। वे पांच हैं—विज्ञान, वेदना, संज्ञा, संस्कार और रूप॥ ३॥ पञ्च ज्ञानेन्द्रिय, उनके शब्दादि विषय पाँच और मन-बुद्धि= अन्तःकरण, धर्म का स्थान ये द्वादश हैं॥४॥ जो मनुष्यों के हृदय में रागद्वेषादि समूह की उत्पत्ति होती है जो आत्मा के स्वभाव के नाम से प्रसिद्ध है वह समुदय होता है॥५॥ सब संस्कार क्षणिक हैं जो यह वासना स्थिर होना, वह बौद्धों का ‘मार्ग’ है और वही शून्य तत्त्व शून्यरूप हो जाना ‘मोक्ष’ है॥६॥ बौद्ध लोग प्रत्यक्ष और अनुमान दो ही प्रमाण मानते हैं। चार प्रकार के इनके भेद हैं—वैभाषिक, सौत्रान्तिक, योगाचार और माध्यमिक॥७॥ इनमें से ‘वैभाषिक’ ज्ञान में जो अर्थ है, उसी को विद्यमान मानता है। क्योंकि जो ज्ञान में नहीं है, उसका होना वह सिद्ध पुरुष नहीं मान सकता। और ‘सौत्रान्तिक’ भीतर को प्रत्यक्ष पदार्थ मानता है, बाहर नहीं॥८॥ ‘योगाचार’ आकारसहित विज्ञानयुक्त बुद्धि को मानता है और ‘माध्यमिक’ केवल अपने में पदार्थों का ज्ञानमात्र मानता है, पदार्थ को नहीं मानता॥९॥ और रागादि-ज्ञान के प्रवाह की वासना के नाश से उत्पन्न हुई मुक्ति चारों प्रकार के बौद्धों की है॥१०॥ मृगादि का चमड़ा, कमण्डलु, मुंड मुण्डाये, वल्कल वस्त्र धारण, पूर्वाह्ण अर्थात् नव बजे से पूर्व भोजन, अकेला न रहै, रक्त वस्त्र का धारण, यह बौद्धों के साधुओं का वेश है॥११॥

उत्तर—जो बौद्धों का सुगत बुद्ध ही देव है, तो उसका गुरु कौन था? जो विश्व क्षणभङ्ग हो, तो चिरदृष्ट पदार्थ का ‘यह वही है’ ऐसा स्मरण न होना चाहिये। जो क्षणभङ्ग होता, तो वह पदार्थ ही नहीं रहता, पुनः स्मरण किसका होवे?॥१॥ जो क्षणिकवाद ही बौद्धों का मार्ग है तो इनका मोक्ष भी क्षणभङ्ग होगा। जो ज्ञान से युक्त अर्थ द्रव्य हो तो जड़ द्रव्य में भी ज्ञान होना चाहिये, इसलिये ज्ञान में अर्थ का प्रतिबिम्ब सा रहता है। जो भीतर ज्ञान में द्रव्य होवे तो बाहर न होना चाहिये और वह चलनादि क्रिया किस पर करता है? बाहर दीखता है, वह मिथ्या कैसे हो सकता है? जो आकार से सहित बुद्धि होवे तो दृश्य होना चाहिये। जो केवल ज्ञान ही हृदय में आत्मस्थ होवे, बाह्यज्ञेय पदार्थों को केवल ज्ञान ही माना जाय, तो ज्ञेय के विना ज्ञान ही नहीं हो सकता। जो वासनाच्छेद ही मुक्ति है, तो सुषुप्ति में भी मुक्ति माननी चाहिये। यह संक्षेप से बौद्ध मत का विषय लिखा है। यहाँ से आगे जैनमत का वर्णन है, इसको जैन लोग मानते हैं।

बौद्ध लोग समय-समय में नवीनपन से (१) आकाश, (२) काल, (3) जीव, (4) पुद्गल, ये चार द्रव्य मानते हैं और जैनी लोग धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, जीवास्तिकाय और काल ये छः द्रव्य मानते हैं। इनमें काल की अस्तिकायता नहीं और ऐसा भी मानते हैं कि काल उपचार से द्रव्य है, वस्तुतः नहीं। उनमें से ‘धर्मास्तिकाय’ जो गतिपरिणामीपन से परिणाम को प्राप्त हुआ जीव और पुद्गल, इनकी गति के समीप से स्तम्भन करने का हेतु है वह धर्मास्तिकाय, और वह असंख्य प्रदेश परिमाण और लोक में व्यापक है। और दूसरा ‘धर्मास्तिकाय’ यह है कि जो स्थिरता से परिणामी हुए जीव तथा पुद्गल की स्थिति के आश्रय का हेतु है। तीसरा ‘आकाशास्तिकाय’ उसको कहते हैं कि जो सब द्रव्यों का आधार जिसमें अवगाहन, प्रवेश, निर्गम आदि क्रिया करनेवाले जीव तथा पुद्गलों को अवगाहन का जो हेतु और सर्वव्यापी है। चौथा ‘पुद्गलास्तिकाय’ यह है कि जो कारणरूप सूक्ष्म, नित्य, एकरस, वर्ण, गंध, स्पर्श, कार्य का लिङ्ग, पूरने और गलने के स्वभाववाला होता है। पाँचवाँ ‘जीवास्तिकाय’ यह है कि जो चेतनालक्षण ज्ञान-दर्शन में उपयुक्त, अनन्त पर्यायों से परिणामी होनेवाला कर्त्ता भोक्ता है। और छठा ‘काल’ यह है कि जो पूर्वोक्त पंचास्तिकायों का परत्व-अपरत्व, नवीन-प्राचीनता का चिह्नरूप प्रसिद्धि वर्त्तमानरूप पर्यायों से युक्त है, वह काल कहाता है।

समीक्षक—जो बौद्धों ने चार द्रव्य प्रतिसमय में नवीन-नवीन माने हैं, वे झूठे हैं, क्योंकि आकाश, काल, जीव और परमाणु, ये नये वा पुराने कभी नहीं हो सकते। क्योंकि ये अनादि और कारणरूप से अविनाशी हैं, पुनः नया और पुरानापन कैसे घट सकता है? और जैनियों का मानना भी ठीक नहीं। क्योंकि धर्माऽधर्म द्रव्य नहीं किन्तु जीव के गुण हैं, ये दोनों जीवास्तिकाय में आ जाते हैं; इसलिये आकाश, परमाणु, जीव और काल मानते तो ठीक था। और जो नव द्रव्य वैशेषिक में माने हैं वे ठीक हैं, क्योंकि पृथिव्यादि पांच तत्त्व, काल, दिशा, आत्मा और मन ये नव पृथक्-पृथक् पदार्थ निश्चित हैं। एक जीव को चेतन मानकर ईश्वर को नहीं मानना, जैन-बौद्धों की मिथ्या पक्षपात की बात है।

अब जो बौद्ध और जैनी लोग सप्तभङ्गी न्याय, और स्याद्वाद मानते हैं, वह यह है। देखो प्रथम भंग—‘सन् घटः’ इसको प्रथम भङ्ग कहते हैं, क्योंकि घट अपनी वर्त्तमानता से युक्त अर्थात् घड़ा है, इसने अभाव का विरोध किया है। दूसरा भङ्ग—‘असन् घटः’ घड़ा नहीं है, प्रथम घट के भाव से, यह घड़ा के असद्भाव से दूसरा भङ्ग है। तीसरा भङ्ग यह है कि ‘सन्नसन् घटः’ अर्थात् यह घड़ा तो है परन्तु यह पट नहीं, क्योंकि उन दोनों से पृथक् हो गया। और ‘घटोऽघटः’ यह चौथा भङ्ग कहाता है। जैसे ‘अघटः पटः’ दूसरे पट के अभाव की अपेक्षा अपने में होने से घट अघट कहाता है, युगपत् उसकी दो संज्ञा अर्थात् घट और अघट भी है। पाँचवाँ भङ्ग यह है कि जो घट को घट कहने को योग्य अर्थात् घट को पट कहने के अयोग्य। उसमें घटपन वक्तव्य है। और पटपन अवक्तव्य है। छठा भङ्ग यह है कि जो कुम्भ नहीं है, वह कहने योग्य भी नहीं और जो है वह कहने के योग्य भी है। और सातवाँ भङ्ग यह है कि जो कहने को इष्ट है परन्तु वह नहीं है और कहने के योग्य भी घट नहीं, यह सप्तम भङ्ग कहाता है। इसी प्रकार—

स्यादस्ति जीवोऽयं प्रथमो भङ्गः ॥१॥
स्यान्नास्ति जीवो द्वितीयो भङ्गः ॥२॥
स्यादस्ति नास्तिरूपो जीवस्तृतीयो भङ्गः ॥३॥
स्यादवक्तव्यो जीवश्चतुर्थो भङ्गः ॥४॥
स्यादस्ति च अवक्तव्यो जीवः पञ्चमो भङ्गः ॥५॥
स्यान्नास्ति च अवक्तव्यो जीवः षष्ठो भङ्गः ॥६॥
स्यादस्ति नास्ति अवक्तव्यो जीव इति सप्तमो भङ्गः ॥७॥
[प्रकरण रत्नाकर भाग-१]

अर्थ—“है जीव” ऐसा प्रकथन होवे तो जीव के विरोधी जड़ पदार्थों का जीव में अभावरूप भङ्ग प्रथम कहाता है॥ १॥ दूसरा भङ्ग यह है कि “नहीं है जीव जड़ में” ऐसा कथन भी होता है, इससे यह दूसरा भङ्ग कहाता है॥ २॥ “जब जीव शरीर धारण करता है तब प्रसिद्ध और जब शरीर से पृथक् होता है तब अप्रसिद्ध रहता है” ऐसा कथन होवे, उसको तीसरा भङ्ग कहते हैं॥ ३॥ “जीव कहने के योग्य नहीं” यह चौथा भङ्ग॥ ४॥ “जीव है परन्तु कहने के योग्य नहीं” जो ऐसा कथन है, उसको पञ्चम भङ्ग कहते हैं॥ ५॥ “जीव प्रत्यक्ष प्रमाण से कहने में नहीं आता, इसलिए चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं है” [जो] ऐसा व्यवहार है, उसको छठा भङ्ग कहते हैं॥ ६॥ “एक काल में जीव का अनुमान से होना और दृश्यपन में न होना और एक-सा न रहना किन्तु क्षण-क्षण में परिणाम को प्राप्त होना, अस्ति-नास्ति कथन न होवे और नास्ति-अस्ति व्यवहार भी न होवे,” यह सातवाँ भङ्ग कहाता है॥ ७॥ इसी प्रकार नित्यत्व सप्तभङ्गी, अनित्यत्व सप्तभङ्गी तथा सामान्य धर्म, विशेष धर्म, गुण और पर्यायों की प्रत्येक वस्तु में सप्तभङ्गी होती है। वैसे द्रव्य, गुण, स्वभाव और पर्यायों के अनन्त होने से सप्तभङ्गी भी अनन्त होती है। ऐसा बौद्धों तथा जैनियों का ‘स्याद्वाद’ और ‘सप्तभङ्गी न्याय’ कहाता है।

समीक्षक—यह कथन एक अन्योऽन्याभाव में साधर्म्य और वैधर्म्य में चरितार्थ हो सकता है। इस सरल प्रकरण को छोड़कर कठिन जाल-रचना केवल अज्ञानियों के फसाने के लिए होती है। देखो! जीव का अजीव में और अजीव का जीव में अभाव रहता ही है। जैसे जीव और जड़ के वर्त्तमान होने से साधर्म्य और चेतन तथा जड़ होने से वैधर्म्य अर्थात् जीव में चेतनत्व (अस्ति) है और जड़त्व (नास्ति) नहीं है। इसी प्रकार जड़ में जड़त्व है और चेतनत्व नहीं है। इससे गुण-कर्म-स्वभाव के समानधर्म, और विरुद्धधर्म के विचार से सब इनका सप्तभङ्गी और स्याद्वाद सहजता से समझ में आता है, फिर इतना प्रपञ्च बढ़ाना किस काम का है? इसमें बौद्ध और जैनों का एक मत है। थोड़ा सा ही पृथक् होने से भिन्नभाव भी हो जाता है। इसके आगे केवल जैनमत का वर्णन है—

चिदचिद् द्वे परे तत्त्वे विवेकस्तद्विवेचनम्।
उपदेयमुपादेयं हेयं हेयं च कुर्वतः॥१॥
हेयं हि कर्तृरागादि तत्कार्य्यमविवेकिनः।
उपादेय परं ज्योतिरुपयोगैकलक्षणम्॥२॥ [आर्हतदर्शन]

जैन लोग ‘चित्’ और ‘अचित्’ अर्थात् चेतन और जड़ दो ही परतत्त्व मानते हैं। उन दोनों के विवेचन का नाम ‘विवेक’। जो-जो ग्रहण के योग्य है, उस-उसका ग्रहण और जो-जो त्याग करने योग्य है, उस-उसका त्याग करनेवाले को ‘विवेकी’ कहते हैं॥१॥ जगत् का कर्त्ता और रागादि तथा ईश्वर ने जगत् किया है, इस अविवेकी मत का त्याग और योग से लक्षित परमज्योतिस्वरूप जो जीव है, उसका ग्रहण करना उत्तम है॥२॥ अर्थात् जीव के विना दूसरा चेतनतत्त्व ईश्वर को नहीं मानते। ‘कोई भी अनादि सिद्ध ईश्वर कोई नहीं’, ऐसा बौद्ध-जैन लोग मानते हैं।

इसमें राजा शिवप्रसाद जी ‘इतिहासतिमिरनाशक’ ग्रन्थ में लिखते हैं कि “इनके दो नाम हैं, एक जैन और दूसरा बौद्ध। ये पर्यायवाची शब्द हैं परन्तु बौद्धों में वाममार्गी मद्यमांसाहारी बौद्ध हैं, उनके साथ जैनियों का विरोध है। परन्तु जो महावीर और गौतम गणधर हैं, उनका नाम बौद्धों ने बुद्ध रक्खा है और जैनियों ने गणधर और जिनवर।” इसमें जिनकी परम्परा जैनमत है उन राजा शिवप्रसादजी ने अपने ‘इतिहासतिमिरनाशक’ ग्रन्थ के तीसरे खण्ड [मैडिकल हॉल, बनारस मुद्रित प्रथम संस्करण सन् १८७३, पृष्ठ १०९] में लिखा है कि “स्वामी शङ्कराचार्य्य से पहले जिनको हुए कुल हजार वर्ष के लगभग गुजरे हैं सारे भारतवर्ष में बौद्ध अथवा जैनधर्म फैला हुआ था।” इस पर नोट—“…..बौद्ध कहने से हमारा आशय उस मत से है, जो महावीर के गणधर गौतम स्वामी के समय से शंकर स्वामी के समय तक वेदविरुद्ध सारे भारतवर्ष में फैला रहा और जिसको ‘अशोक’ और ‘सम्प्रति’ महाराज ने माना, उससे जैन बाहर किसी तरह नहीं निकल सकते।…जिन, जिससे जैन निकला और बुद्ध, जिससे बौद्ध निकला दोनों पर्याय शब्द हैं। कोश में दोनों का अर्थ एक ही लिखा है और गौतम को दोनों मानते हैं। वरन् दीपवंश इत्यादि पुराने बौद्ध ग्रन्थों में शाक्यमुनि गौतम बुद्ध को अकसर महावीर ही के नाम से लिखा है। पस उसके समय में एक ही उनका मत रहा होगा।… हमने जो जैन न लिखकर गौतम के मत वालों को बौद्ध लिखा, उसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि उनको दूसरे देशवालों को बौद्ध ही के नाम से लिखा है…”। ऐसा ही अमरकोश में भी लिखा है—

सर्वज्ञः सुगतो बुद्धो धर्मराजस्तथागतः।
समन्तभद्रो भगवान् मारजिल्लोकजिज्जिनः॥१॥
षडभिज्ञो दशबलोऽद्वयवादी विनायकः।
मुनीन्द्रः श्रीधनः शास्ता मुनिः शाक्यमुनिस्तु यः॥२॥
स शाक्यसिंहः सर्वार्थः सिद्धश्शौद्धोदनिश्च सः।
गौतमश्चार्कबन्धुश्च मायादेवीसुतश्च सः॥३॥
—अमरकोश कां॰ १। वर्ग १। श्लोक ८ से १० तक॥

अब देखो! ‘बुद्ध’ ‘जिन’ और ‘बौद्ध तथा जैन’ एक के नाम हैं वा नहीं? क्या अमरसिंह भी ‘बुद्ध’ ‘जिन’ के एक लिखने में भूल गया है? जो अविद्वान् जैन हैं, वे न तो अपना जानते और न दूसरे का, केवल हठमात्र से बर्ड़ाया करते हैं, परन्तु जो जैनों में विद्वान् हैं, वे सब जानते हैं कि ‘बुद्ध’ और ‘जिन’ तथा ‘बौद्ध’ और ‘जैन’ पर्यायवाची हैं। उ न्हीं बौद्धों और जैनियों का नाममात्र भेद है, परन्तु जो मांसाहारी बौद्ध हैं, उनसे जैन भिन्न हैं। बौद्धों और चार्वाकों का मत लेके जैनमत प्रवृत्त हुआ है। और कुछ विरोध भी हैं अर्थात् जैसे चार्वाक और बौद्ध ईश्वर को नहीं मानते और जगत् को अनादिकाल से स्वभाव से सिद्ध तथा प्रत्यक्ष और अनुमान को मानते हैं। जैनी लोग जीव को अनादि और क्षणिकवाद से विरुद्ध मानते हैं। जीव कर्म का कर्त्ता, स्वयंफल भोक्ता है। फलप्रदाता और जगत् का कर्त्ता कोई नहीं। कर्मक्षय से मुक्ति, दया, क्षमा को धर्म मानते हैं। और अपने तीर्थंङ्करों ही को केवली मुक्तिप्राप्त और परमेश्वर मानते हैं, अनादि परमेश्वर कोई नहीं। सर्वज्ञ, वीतराग, अर्हन्, केवली, तीर्थकृत, जिन ये छः नास्तिकों के देवताओं के नाम हैं। अनादि देव का स्वरूप चन्द्रसूरि ने ‘आप्तनिश्चयालङ्कार’ ग्रन्थ में लिखा है—

सर्वज्ञो वीतरागादिदोषस्त्रैलोक्यपूजितः।
यथा स्थितार्थवादी च देवोऽर्हन् परमेश्वरः॥१॥ [आर्हतदर्शन]

तथा चोक्तं तौतातितैः—

सर्वज्ञो दृश्यते तावन्नेदानीमस्मदादिभिः।
दृष्टो न चैकदेशोऽस्ति लिङ्गं वा योऽनुमापयेत्॥२॥
न चाऽऽगमविधिः कश्चिन्नित्यः सर्वज्ञबोधकः।
न च तत्रार्थवादानां तात्पर्यमपि कल्प्यते॥३॥
न चान्यार्थप्रधानैस्तैस्तदस्तित्वं विधीयते।
न चानुवदितुं शक्यः पूर्वमन्यैरबोधितः॥४॥
अनादेरागमस्यार्थो न च सर्वज्ञ आदिमान्।
कृत्रिमेण त्वसत्येन स कथं प्रतिपाद्यते॥५॥
अथ तद्वचनेनैव सर्वज्ञोऽन्यैः प्रतीयते।
प्रकल्प्येत कथं सिद्धिरन्योऽन्याश्रययोस्तयोः॥६॥
सर्वज्ञोक्ततया वाक्यं सत्यं तेन तदस्तिता।
कथं तदुभयं सिध्येत् सिद्धमूलान्तरादृते॥७॥
असर्वज्ञप्रणीतात्तु वचनान्मूलवर्जितात्।
सर्वज्ञमवगच्छन्तस्तद्वाक्योक्तं न जानते॥८॥
सर्वज्ञसदृशं किञ्चिद्ययदि पश्येम सम्प्रति।
उपमानेन सर्वज्ञं जानीयाम ततो वयम्॥९॥
उपदेशोऽपि बुद्धस्य धर्माधर्मादिगोचरः।
अन्यथा नोपपद्येत सर्वज्ञं यदि नाभवत्॥१०॥
[आर्हतदर्शन]

अर्थ—जो रागादि दोषों को जीतनेहारा सर्वज्ञ सबका ज्ञाता, तीन लोक में पूजित, यथार्थवादी अर्हत् देव है वही परमेश्वर है॥१॥ जो सर्वज्ञ अनादि ईश्वर होता, तो उसको हम लोग देखते नहीं हैं, इसलिये ईश्वर प्रत्यक्ष नहीं और उसका एक देश वा चिह्न को भी हम लोग नहीं देखते हैं, जिससे अनुमान किया जाय॥२॥ और सर्वज्ञ का बोध करानेवाला कोई आगम अर्थात् किसी शास्त्र का विधि भी नहीं है, इसलिए ईश्वर में शब्दप्रमाण भी नहीं। और उसमें अर्थवाद भी नहीं घटता, क्योंकि जो कोई वस्तु हो उसके गुण-दोश जानकर स्तुति वा निन्दा होवे, तो अर्थापत्ति भी ईश्वर को सिद्ध करे॥३॥ इसलिए अर्थापत्ति से भी ईश्वर सिद्ध नहीं होता॥ और न अन्यार्थ प्रधान लिङ्गों से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है, जैसा कि रचना देखकर रचनावाले का अनुमान करते हैं। ईश्वर का अनुवाद भी कोई नहीं कर सकता, क्योंकि जो पूर्व कथित ईश्वर होता, तो उसका अनुवाद हो सकता॥४॥ और जो सर्वज्ञ आदिमान् है वह अनादि शास्त्र का वा जगत् का कर्त्ता नहीं हो सकता, जो कृत्रिम असत्य जगत् है, उससे अकृत्रिम सत्य ईश्वर सिद्ध क्योंकर हो सकता है॥५॥ जो कोई कहे कि उसी के वचनों से अन्य जीव लोग ईश्वर को जानते हैं तो ‘ईश्वर के वचन से ईश्वर की सिद्धि और ईश्वर से वचन की’ यह अन्योऽन्याश्रय दोष आता है। क्योंकि सर्वज्ञोक्तवचन से वाक्य सत्य और उससे ईश्वर अस्तित्व सिद्ध करना है, यह दोनों एक दूसरे की सिद्धि में अपेक्षा रखते हैं, उसके विना एक-दूसरे की सिद्धि नहीं होती॥६-७॥ जो मूलवर्जित असर्वज्ञप्रणीतवचनान् से सर्वज्ञ को जानते हैं, वे उसके वाक्योक्तधर्म को नहीं जानते॥८॥ जो हम इस समय किसी को सर्वज्ञ के तुल्य देखें तो उपमान से सर्वज्ञ को मान सकें और उपदेश भी बुद्ध अर्थात् जानकार का धर्माधर्म लक्षणस्वरूप हो सकता है। अन्यथा अर्थात् बुद्धि के विना सर्वज्ञ नहीं हो सकता जो सर्वज्ञ हमको उपदेष्टा प्रत्यक्ष न हो तो हम धर्माधर्म नहीं जान सकें, इसलिए सर्वज्ञ तीर्थंकरों का वचन मानना ‘अनादि ईश्वर कोई नहीं है’॥९-१०॥

उत्तर—यह सब प्रपञ्च की बात है। क्योंकि जो प्रथम रागादि दोषयुक्त है, वह सदा के लिए कभी नहीं छूट सकता, क्योंकि जो नैमित्तिक दोष हैं तो फिर भी निमित्त होने से हो जायेंगे और जो स्वाभाविक हैं, तो कभी न छूटेंगे। जो देशकाल से परिच्छिन्न वस्तु होता है, वह एकदेशी, और जो एकदेशी होता है, वह सर्वज्ञ नहीं। क्योंकि जो वस्तु अल्प है, उसके गुण, कर्म, स्वाभाव भी अल्प होते हैं, वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता। किन्तु जो सर्वव्यापक अनादि परमात्मा है, वही सनातन ईश्वर है॥१॥ क्या जो वस्तु तुमको प्रत्यक्ष न हो, वह नहीं होता और जो प्रत्यक्ष है वही होता है, ऐसा नियम है? तुम प्रत्यक्ष छः प्रकार का मानते हो। एक श्रावण, दूसरा त्वाच, तीसरा चाक्षुष, चौथा रासन, पाँचवाँ घ्राण और छठा मानस। जैसे पृथिवी के गन्धादि गुण कठिनत्वादि स्वभाव को देख के पृथिवी प्रत्यक्ष होती है, वैसे ही परमेश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव और नियम सृष्टि में रचना आदि गुण, कर्म और स्वभाव कार्यनियम देखकर सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, अनादि ईश्वर का प्रत्यक्ष करना चाहिए। और जब जीवात्मा किसी दुष्ट वा श्रेष्ठ काम का ध्यान करता है, उस समय वह तदाकार उसके अभिमुख होता है। उसी समय उसके भीतर से दूसरी प्रेरणा अर्थात् पाप में भय, शङ्का, लज्जा और पुण्य में निर्भय, उत्साह और प्रसन्नता की रहने वाली बुद्धि होती है, वह ईश्वर की ओर से है। वहां गुण-गुणी का तादात्म्य सम्बन्ध है, इसलिये परमात्मा प्रत्यक्ष है। जैसे किसी कृत्रिम पदार्थ को देखकर, उसमें रचनाविशेष लिङ्ग को देखकर, अदृष्ट कर्त्ता को निश्चित जानना होता है। क्या यह ईश्वर में अनुमान का लिङ्ग नहीं॥२॥ आगम अर्थात् आप्त के कहे का प्रमाण मानना चाहिये। तुम्हारे पुस्तकों में अनादि ईश्वर का निरूपण नहीं किया, सो भूल है। जो नित्य सर्वज्ञ न हो तो सादि ज्ञानयुक्त पुरुष का शरीर पालने के पदार्थ कहाँ से हो सकें? क्योंकि शरीर का आदि अन्त होता है, इसका कर्त्ता जीव नहीं हो सकता। जो शरीरादि का कर्त्ता होता, तो शारीरिक क्रिया भी जानता कि इस आँख में कितनी नाड़ी आदि पदार्थों के संयोग-वियोग हैं, उसको जानता। जैसे सांचे में किसी धातु को ढालते हैं, तादृश पात्र बन जाता है। अथवा बीज में जैसी रचना करता है, वैसा ही अंकुर, मूल, शाखा, पत्र, पुष्प, फल उत्पन्न होता है, यह सामर्थ्य जीव वा जड़ का नहीं है क्योंकि जीव को जब शरीर प्राप्त होता है, तभी कुछ कर सकता और ज्ञान वा सामर्थ्य को बढ़ा सकता है अन्यथा नहीं। तो जो अनादि ईश्वर जीव के शरीर वा बीज आदि का योग न करता, तो जगत् में कुछ भी न हो सकता। देखलो! कितना ही कोई विद्वान् वा योगी हो, जब सुषुप्ति को प्राप्त होते हैं, तब कुछ भी भान नहीं रहता। दूसरा—जब दुःख प्राप्त होता है, तब ज्ञान न्यून हो जाता है। जीव वा जड परमाणुओं से स्वतः कुछ भी रचनाविशेष नहीं हो सकती और अर्थवाद भी ईश्वर में यथावत् घटता है, क्योंकि जगत् में अनन्त विद्या के यथावत् रचित कार्यों को देखने से ईश्वर प्रशंसनीय होता है। जब अन्तर्यामी ईश्वर अपने गुण, कर्म और स्वभाव का प्रकाश जीवात्मा में करे, पुनः दूसरे के सामने परमेश्वर का अनुवाद करना भी सहज है। अन्योऽन्याश्रय दोष अनित्य पदार्थ में आता है नित्य में नहीं। क्योंकि जो साधनसाध्य हो उसी में अनवस्था आती है, नित्य में नहीं। जैसे सूर्य और प्रदीप का प्रकाशक और प्रकाश्य सूर्य और दीप होता है, दूसरा नहीं, इसी प्रकार परमेश्वर का वचन और परमेश्वर नित्य और स्वयं प्रकाश होने से अनवस्था नहीं आसकती। वैसे उपमान से भी ईश्वर सिद्ध होता है। क्योंकि परमेश्वर के सदृश परमेश्वर है वा एकदेश अथवा एक गुण, कर्म, स्वभाव तुल्य, दूसरा आकाश, न्यायाधीश आदि होते हैं, उसकी उपमा से भी ईश्वर सिद्ध होता है। इसलिये जो तीर्थंकरों को परमेश्वर मानते हो तो उनके माता पिता को उत्पन्न किसने किया था? जो कहो कि वे स्वभाव से हुये थे, तो अब भी स्वभाव से मनुष्य क्यों नहीं होते?॥३-१०॥

आस्तिक और नास्तिक का संवाद

इसके आगे प्रकरण रत्नाकर दूसरे भाग से जिसको बड़े-बड़े जैनियों ने अपनी सम्मति के साथ माना और मुम्बई में छपवाया है जैनियों के ईश्वरखण्डन में आस्तिक नास्तिक संवाद के प्रश्नोत्तर यहाँ लिखते हैं।

नास्तिक—ईश्वर की इच्छा से कुछ नहीं होता है, जो कुछ होता है, वह कर्म से। आस्तिक—कर्म से जो होता है, तो कर्म किससे होता है? जो कहो जीव आदि से, तो उन्हीं के फल भोगना जीव की इच्छानुकूल है। परन्तु पाप के फल दुःख को जीव अपनी इच्छा से नहीं भोगता, ईश्वर के भोगाने से भोगता है। जैसे चोर सुख अपनी इच्छा से भोगता है और दुःख राजा की व्यवस्था से। नास्तिक—ईश्वर अक्रिय है, क्योंकि जो कर्म करता होता, तो कर्म का फल भी भोगना पड़ता। आस्तिक—ईश्वर अक्रिय नहीं, क्योंकि चेतन और सृष्टिकर्त्ता है। जैसा तुम्हारा कृत्रिम बनावट का ईश्वर जैसा कि तुमने तीर्थङ्करों को जीव से ईश्वर बने हुये माना है, वैसे कदाचित् होने वाले इस प्रकार के ईश्वर को कोई विद्वान् नहीं मान सकता। क्योंकि जो निमित्तों से ईश्वर बने तो अनित्य हो जाय। क्योंकि ईश्वर बने के पहले जीव था, पश्चात् किसी निमित्त से ईश्वर बना हो, वह फिर भी जीव हो जायगा। क्योंकि यह अनादि काल से जीव था, अनन्त काल तक रहेगा। फिर बीच में ईश्वर बना, वह भी अन्त में पुनः जीव हो जायगा। इसलिये इस अनादि सिद्ध ईश्वर को मानना योग्य है। परमेश्वर पाप कभी नहीं करता। जैसे स्वाभाविक चेष्टा होती है, उसी प्रकार जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय करता है, इसलिये जगत् का कर्त्ता ईश्वर है। जो स्वभाव से जगत् बनता है, तो जगत् के कारण का स्वभाव जड़त्व है, वह ज्ञानपूर्वक श्रेष्ठ नहीं हो सकता, क्योंकि उसमें यथायोग्य बनने का ज्ञान ही नहीं। जैसा मट्टी में घट और रूई में कपड़े बनने का स्वतः सामर्थ्य नहीं। दूसरे ज्ञान वाले के बनाने से घड़ा तथा वस्त्र बनता है। नास्तिक—ईश्वर व्यापक नहीं है। जो व्यापक होता तो सब चेतन होता और बराबर चेतनता क्यों नहीं? ब्राह्मणादि में उत्तम, मध्यम, निकृष्टता क्यों हुई? क्योंकि सबमें ईश्वर एक-सा व्यापक है तो छोटाई बड़ाई क्यों हुई? आस्तिक—व्याप्य और व्यापक एक नहीं, किन्तु दो होते हैं। जैसे आकाश सब में व्यापक है और सब आकाश के सदृश नहीं होता। वैसे परमेश्वर के चेतन होने से सब जडवस्तु चेतन नहीं होता। जैसे आकाश सब में बराबर है, पृथ्वी आदि के अवयव बराबर नहीं, वैसे परमेश्वर के बराबर कोई नहीं। जैसे विद्वान् अविद्वान्, धर्मात्मा अधर्मात्मा बराबर नहीं होते, वैसे विद्यादि सद्गुण और सत्यभाषणादि कर्म तथा सुशीलतादि स्वभाव के अधिक न्यून होने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और अन्त्यज बड़े-छोटे माने जाते हैं। वर्णों की व्याख्या जैसी चतुर्थसमुल्लास में लिख आये हैं, वहाँ देख लो। नास्तिक—ईश्वर ने जगत् का अधिपतित्व और जगत्रूप ऐश्वर्य किस कारण स्वीकार किया? आस्तिक—ईश्वर ने कभी अधिपतित्व न छोड़ा था, न ग्रहण किया है, किन्तु अधिपतित्व और जगत्रूप ऐश्वर्य ईश्वर ही में है। न कभी उससे अलग हो सकता है तो ग्रहण क्या करेगा? क्योंकि अप्राप्त का ग्रहण होता है। व्याप्य से व्यापक और व्यापक से व्याप्य पृथक् कभी नहीं हो सकता। इसलिये सदैव स्वामित्व और अनन्त ऐश्वर्य अनादि काल से ईश्वर में है। इसका ग्रहण और त्याग जीवों में घट सकता है, ईश्वर में नहीं. नास्तिक—जो ईश्वर की रचना से सृष्टि होती है, तो माता पितादि का क्या काम? जब परमात्मा शाश्वत, अनादि, चिदानन्द, ज्ञानस्वरूप है तो जगत् के प्रपञ्च और दुःखरूप में क्यों पड़ा? ऐसा काम कोई साधारण मनुष्य भी आनन्द को छोड़, दुःख को ग्रहण नहीं करता, तो ईश्वर ने क्यों किया? आस्तिक—ईश्वर की सृष्टि भिन्न और मानुषी सृष्टि भिन्न होती है। इसलिये माता-पिता की आवश्यकता है। जैसे परमात्मा अनादि प्रकृति परमाणुरूप कारण से सृष्टि करता है, वैसे परमात्मा ने माता-पितारूप निमित्त कारण से उत्पत्ति का प्रबन्ध किया है। इसमें कोई दोष नहीं। परमात्मा किसी प्रपञ्च और दुःख में नहीं गिरता, न अपने आनन्द को छोड़ता है, क्योंकि प्रपञ्च और दुःख में गिरना जो एकदेशी हो उसका हो सकता है; सर्वदेशी का नहीं। जो अनादि, चिदानन्द, ज्ञानस्वरूप परमात्मा जगत् को न बनावे तो अन्य कौन बना सके? जगत् बनाने का जीव में सामर्थ्य नहीं और जड़ में स्वयं बनने का भी सामर्थ्य नहीं। इससे यह सिद्ध हुआ कि परमात्मा ही जगत् को बनाता और सदा आनन्द में रहता है। जैसे परमात्मा परमाणु रूप कारण से सृष्टि करता है वैसे माता पितारूप निमित्तकारण से भी उत्पत्ति का प्रबन्ध-नियम उसी ने किया है. नास्तिक—ईश्वर मुक्तिपद को छोड़ जगत् में अनेकरूप पदार्थों की सृष्टिधारण और प्रलय करने के बखेड़े में क्यों पडा़? आस्तिक—ईश्वर सदा मुक्त है। तुम्हारे तीर्थङ्करों के सदृश बन्धपूर्वक मुक्ति का होना ईश्वर में नहीं। जगत् को बनाता, धर्ता, पालनकर्त्ता और प्रलय करके भी बन्ध में नहीं पड़ता, क्योंकि बन्ध और मुक्त सापेक्ष है। जो बन्ध न हो, तो मुक्ति नहीं और मुक्ति हो, तो बन्ध नहीं। परमेश्वर में बन्ध-मोक्ष नहीं घट सकता, किन्तु सदा मुक्त है। और जो एकदेशी जीव हैं, वे ही बद्ध और मुक्त सदा हुआ करते हैं। अनन्त सर्वदेशी, सर्वव्यापक, ईश्वर बन्धन वा नैमित्तिक मुक्ति के चक्र में, जैसे कि तुम्हारे तीर्थंकर हैं, कभी नहीं पड़ता. नास्तिक—पी हुई भांग के नशे के समान जीव अपने-अपने कर्मों के फलों को प्राप्त होता है, इसमें ईश्वर का कुछ काम नहीं. आस्तिक—विना राजा के डाकू, चोर आदि दुष्ट मनुष्य स्वयं फांसी नहीं चढते और न कारागार में जाते, किन्तु राजा उनके कर्मों का फल देता है, वैसे ईश्वर [की न्याय व्यवस्था] के विना कर्मों का फल कोई भी नहीं भोग सकते, इसलिये ईश्वर का न्यायाधीश होना अवश्य है. नास्तिक—जगत् में एक ईश्वर नहीं, किन्तु अनेक मुक्त जीव ईश्वररूप हैं. आस्तिक—यह कहना व्यर्थ है। क्योंकि जो प्रथम बद्ध होकर मुक्त हो, तो पुनः अवश्य बन्ध में पडे़गा, जैसे कि तुम्हारे तीर्थङ्कर। और जो सदा मुक्त है, वह कभी बन्ध में न गिरेगा। और जब बहुत से ईश्वर हैं, तो जैसे जीव अनेक होने से लड़ते भिड़ते फिरते हैं, वैसे ईश्वर भी लड़ा-भिड़ा करेंगे. नास्तिक—हे मूढ! जगत् का कर्त्ता कोई नहीं, किन्तु जगत् स्वयंसिद्ध है. आस्तिक—कर्त्ता के विना कोई कर्म और कर्म के विना कोई कार्य नहीं हो सकता। इसलिये ईश्वर जगत् का कर्त्ता है। जो जगत् स्वयं सिद्ध होता तो तुम्हारे खेत के गेहूं स्वयं पिसान, रोटी बन, तुम्हारे पास आकर, मुख में घुसकर, पेट में चला जाय तो विना ईश्वर के किये जगत् भी स्वयं बन जाय. नास्तिक—ईश्वर विरक्त है वा मोही? जो विरक्त हो तो जगत् के प्रपञ्च में क्यों पड़े? जो मोहित हो तो जगत् बनाने का सामर्थ्य ही नहीं होगा. आस्तिक—परमेश्वर में वैराग्य वा मोह नहीं घट सकता। क्योंकि वह सर्वव्यापक, सर्वोत्तम होने से किसी से पृथक् वा किसी से राग नहीं कर सकता। ईश्वर से उत्तम वा उसको अप्राप्त कोई पदार्थ नहीं है, इसलिये किसी में मोह भी नहीं होता। वैराग्य और मोह का होना जीव में घटता है; ईश्वर में नहीं. नास्तिक—जो जगत् का कर्त्ता, कर्मों के फलों का दाता ईश्वर को मानोगे, तो ईश्वर प्रपञ्ची होकर दुःखी हो जायगा. आस्तिक—दुःख अज्ञान और अधर्माचरण से होता है। परमेश्वर में ये दोनों नहीं। इसलिए परमेश्वर प्रपञ्ची नहीं। प्रपञ्ची-अप्रपञ्ची जीव होते हैं इत्यादि विचार से ईश्वर की सिद्धि होती है। जो कोई इसको नहीं मानता, वह मूढमत है। हां! तुम अपने और अपने तीर्थंकरों के समान परमेश्वर को भी अपने अज्ञान से समझते हो, सो तुम्हारी अविद्या की लीला है। जो अविद्यादि दोषों से छूटना चाहो, तो वेदादि सत्य शास्त्रों का आश्रय लेओ। क्यों भ्रम में पड़े-पडे ठोकरें खाते हो?

अब जैनी लोग जीव को अनादि, अनन्त मानते हैं सो ठीक है, परन्तु जो जो विरुद्ध है, उस-उस को दिखलाकर खण्डन किया जायेगा। छः द्रव्यों में एक जीवद्रव्य भी जैनी लोग मानते हैं अर्थात् जगत् में जीव और अजीव दो ही पदार्थ हैं, तीसरा नहीं। ऐसा उनके केवली आचार्य तीर्थङ्कर का वचन है। मूल— सामि अणाई अणन्ते, चउगई संसारघोरकान्तारे। मोहाइ कम्मगुरुठिइ, विवागवसउ भमइ जीवो॥ —प्रकरणरत्नाकर भाग दूसरा (२)। षष्ठीशतक। सूत्र २॥ यह प्रकरणरत्नाकर नामक ग्रन्थ के सम्यक्त्वप्रकाश प्रकरण में गौतम और महावीर का संवाद है। इसका संक्षेप से उपयोगी यह अर्थ है कि यह संसार अनादि अनन्त है। न कभी इसकी उत्पत्ति हुई, न कभी विनाश होता है अर्थात् किसी का बनाया जगत् नहीं। सो ही आस्तिक-नास्तिक के संवाद में—हे मूढ! जगत् का कर्त्ता कोई नहीं; न कभी बना और न कभी नाश होगा। समीक्षक—अब विचारना चाहिये कि जीव अल्प और अल्पज्ञ है। जगत् का कार्य और कारण जड़ हैं। जो तीसरा अनन्त शक्तियुक्त परमात्मा न हो तो जगत् का उत्पादन, धारण आदि कर्मों को न कर सके। अब पृथिव्यादि भूत और भूगोलों को भी जैनी लोग जीव के शरीर मानते हैं। क्योंकि काची मिट्टी सजीव है, क्षार मट्टी अजीव है, इसलिये उसमें वनस्पति नहीं उगती। वाह रे जैनी लोगो! और धन्य हैं तुम्हारे केवली तीर्थङ्कर जिनको पदार्थ विद्या में बहुत ही भ्रम था। जो पृथिव्यादि किसी एक जीव का शरीर हो तो जैसे बड़ी-बड़ी तिमिङ्गिल मच्छी जिधर चाहती, उधर जाती-आती है, वैसे पृथिवी आदि क्यों नहीं स्वेच्छित चाल चलते हैं? क्या मीठी ही मट्टी में वनस्पति उगता और क्षार मट्टी में नहीं उगता? हाँ! यह तो बात है कि मीठी मट्टी के वनस्पति आदि खारी मट्टी में, खारी मट्टी के वृक्ष आदि मीठी मट्टी में नहीं होते होंगे। किन्तु अपने-अपने ठिकाने सब होते हैं। जो संयोग से उत्पन्न होता है वह अनादि और अनन्त कभी नहीं हो सकता। और उत्पत्ति तथा विनाश हुए विना कर्म नहीं रहता। जगत् में जितने पदार्थ उत्पन्न होते हैं वे सब ‘संयोगज’ उत्पत्ति-विनाशवाले देखे जाते हैं। पुनः जगत् उत्पन्न और विनाश वाला क्यों नहीं? इसलिये तुम्हारे तीर्थंकरों को सम्यग्बोध नहीं था। जो उनको सम्यग्ज्ञान होता तो ऐसी असम्भव बातें क्यों लिखते? जैसे तुम्हारे गुरु हैं, वैसे तुम शिष्य भी हो। तुम्हारी बातें सुनने वाले को पदार्थज्ञान कभी नहीं हो सकता। भला! जो प्रत्यक्ष संयुक्त पदार्थ दीखता है उसकी उत्पत्ति और विनाश क्योंकर नहीं मानते? अर्थात् इनके आचार्य वा जैनियों को भूगोल खगोल विद्या भी नहीं आती थी और न अब यह विद्या इनमें है. प्रश्न—जीव का आकार शरीर के सदृश होता है, जैसे घड़े में जल का आकार बनता. उत्तर—जो यह बात सत्य हो तो हाथी का जीव कीड़ी और कीड़ी का जीव हाथी में न समा सके. इसलिये यह बात झूठी है. यह भी एक मूर्खता की बात है! क्योंकि जीव एक सूक्ष्म पदार्थ है जो कि एक परमाणु में भी रह सकता है परन्तु उसकी शक्तियां शरीर में प्राण, बिजुली और नाड़ी आदि के साथ संयुक्त हो रहती हैं, उनसे सब शरीर का वर्त्तमान जानता है. अच्छे सङ्ग से अच्छा और बुरे सङ्ग से बुरा हो जाता है.

जिनदत्त सूरि ने इस प्रकार कहा— जिनो देवो गुरुः सम्यक् तत्त्वज्ञानोपदेशकः। ज्ञानदर्शनचारित्र्याण्यपवर्गस्य वर्तिनी॥१॥ स्याद् वादस्य प्रमाणे द्वे प्रत्यक्षमनुमापि च। नित्यानित्यात्मकं सर्वं नवतत्त्वानि सप्त वा॥२॥ जीवाजीवौ पुण्यपापे चास्रवः संवरोऽपि च। बन्धो निर्जरणं मुक्तिरेषां व्याख्याऽधुनोच्यते॥३॥ चेतनालक्षणो जीवः स्यादजीवस्तदन्यकः। सत्कर्म पुद्गलाः पुण्यं पापं तस्य विपर्ययः॥४॥ आस्रवः स्रोतसो द्वारं संवृणोतीति संवरः। प्रवेशः कर्मणां बन्धो निर्जरणं द्वियोजनम्॥ ५॥ अष्टकर्मक्षयान् मोक्षाथान्तरभावश्च कश्चन। पुण्यस्य संवरे पापस्यास्रवे क्रियते पुनः॥ ६॥ सरजोहरणा भैक्षभुजो लुञ्चितमूर्द्धजाः। श्वेताम्बराः क्षमाशीला निःसंगा जैनसाधवः॥७॥ लुञ्चिताः पिच्छिकाहस्ताः पाणिपात्रा दिगम्बराः। ऊर्ध्वाशिनो गृहे दातुर्द्वितीया स्युर्जिनर्षयः॥८॥ भुङ्क्ते न केवली न स्त्री मोक्षमेति दिगम्बरः। प्राहुरेषामयं भेदो महान् श्वेताम्बराैः सह॥९॥ —इति [आर्हतदर्शन]

अर्थ—जिन देव अर्थात् तीर्थङ्कर तत्त्व ज्ञान का उपदेशक, ज्ञान, दर्शन और चरित्र ये तीन रत्न अपवर्ग मोक्ष के मार्ग की प्राप्ति में स्याद्वाद के प्रत्यक्ष और अनुमान दो प्रमाण, नित्य और अनित्यस्वरूप सब जगत् जैनमत में नव वा सात तत्त्व हैं॥१-२॥ एक जीव, दूसरा अजीव, तीसरा पुण्य, चौथा पाप, पांचवां आस्रव, छठा संवर, सातवां बन्ध, आठवां निर्जरण और नववां मुक्तितत्त्व मानते हैं। इन नव तत्त्वों की यह व्याख्या है॥३॥ जो चेतन है वह जीव, जो जड़ है वह अजीव, जो सत्कर्म के पुद्गल हैं वह [पुण्य] कर्म और पाप का पुद्गल पाप, कर्मों का योग आस्रव, बन्ध का छुड़ाना निर्जर और ज्ञानावर्णी आदि आठ कर्मों का क्षय होना मुक्ति कहाती है॥ ४-५॥ सभी अष्टकर्मों का पूर्ण क्षय हो जाना। मोक्ष कहाता है। कुछ लोग पुण्य का अन्तर्भाव संवर में करते हैं तथा पाप का आस्रव में। इस प्रकार उनके मत से सात तत्त्व रह जाते हैं॥ ६॥ अब जैनी के साधुओं के लक्षण—धूल झाड़ने की ‘चमरी’ सदा साथरखने वाले, भिक्षान्न भोजन करें, सिर आदि के बाल लूँच डालें, एक श्वेताम्बर शुक्लवस्त्र धारण करनेहारे, क्षमायुक्त, संगदोष से रहित, दूसरे लुञ्चित केश, पिच्छिका हाथ में रक्खें, दिगम्बर वस्त्र धारण न करें, पाणिपात्र हाथ ही पात्र, गृहस्थ के घर में भोजन के पश्चात् भोजन करें और ऋषिसंज्ञक भी साधु होते हैं॥७-८॥ दिगम्बर साधुओं का मत है कि केवल्य ज्ञान से युक्त ‘केवली’ साधु भोजन पर आश्रित नहीं रहता और स्त्रियों को मोक्ष नहीं मिलता है, जबकि श्वेताम्बर इनके विपरीत मानते हैं कि स्त्रियों को भी मोक्ष मिलता है। दिगम्बरों का श्वेताम्बरों के साथ यही बड़ा मतान्तर है। दिगम्बर पहले के हैं और श्वेताम्बरों पीछे हुए हैं॥ ९॥ जैनी—हमारे धर्म अधर्म भी द्रव्य हैं. विवेकी—धर्म, अधर्म गुण हैं, द्रव्य कभी नहीं हो सकते. जो धर्माधर्म को द्रव्य मानते हो तो रूप, स्पर्श आदि को भी द्रव्य मानो. प्रश्न—जैनीलोग जगत्, जीव, जीव के कर्म और बन्ध अनादि मानते हैं. उत्तर—यहाँ भी जैनियों के तीर्थंकर भूल गये हैं, क्योंकि संयुक्त जगत् का कार्य कारण अनादिरूप और कार्य प्रवाहरूप से अनादि हो सकता. जैसा तुम इस स्थूल जगत् को अनादि मानते हो, सो नहीं बन सकता, क्योंकि संयोगजन्य पदार्थ संयोग से पूर्व संयुक्तावस्था में नहीं होता, किन्तु वियोगावस्था में होता है. जो जीव को अनादिकाल बन्ध है, वह कभी न छूट सकेगा और जो अनादि का भी छूटना मानोगे तो जितने अनादि द्रव्य तुम्हारा मत में हैं, वे सब अनित्य हो जायेंगे. और मुक्ति सब कर्मों के छूटने से तुम मानते हो, तो सब कर्मों के छूटने रूप निमित्त से मुक्ति होने से नैमित्तिक हुई, जो निमित्त से होता है वह सदा नहीं रह सकता. और कर्म, कर्त्ता का नित्य सम्बन्ध होने से कर्म भी कभी न छूटेंगे. इसलिए तुम्हारे मत में जो-जो तीर्थंकर आदि मुक्ति में गये होंगे, वे सब फिर आवेंगे. पुनः तुम्हारे मत में मुक्ति अनित्य हो गई. प्रश्न—जैसे मैल लगने के कारणों से वस्त्र में मैल लगता है और धोने से छूट जाता है, पुनः मैल लग जाता है, वैसे मिथ्यात्वादि हेतुओं से रागद्वेषादि के आश्रय से जीव को कर्मरूप मल लगता है. उत्तर—जो मिथ्यात्वादि हेतुओं से जीव मलीन होता है, तो उन निमित्तों के पूर्व जीव को निर्मल मानना पड़ेगा और जो निर्मल को मल लगा, तो अनिर्मोक्षापत्ति तुम्हारे मत में आवेगी. क्योंकि मुक्ति में जीव को तुम निर्मल मानते हो और मल लगने के कारणों से मलों का लगना मानते हो, तो मुक्त जीव संसारी और संसारीजीव मुक्त होता, ऐसा अवश्य ही मानना पड़ेगा. प्रश्न—जीव अनादि काल से कर्मसहित है. कर्म छूटे पीछे, नहीं लगते. उत्तर—जो अनादि से कर्म सहित है, उसका छूटना असम्भव है और विना छूटे मुक्ति कहाँ? इसलिए जीवों के कर्म और मुक्ति को प्रवाह रूप से अनादि मानो. अनादि अनन्तता से नहीं. प्रश्न—जीव निर्मल कभी नहीं था. उत्तर—जो कभी निर्मल नहीं था, तो कभी भी निर्मल नहीं हो सकेगा. जैसे वस्त्र का पीछे से लगा मैल धोने से छूट जाता, पुनः मैल लग जाता. परन्तु उसका श्वेतपन कभी नहीं छूट सकता. प्रश्न—जीव पूर्वोपार्जित कर्मों ही से स्वयं शरीर धारण कर लेता है. ईश्वर का मानना व्यर्थ है. उत्तर—जो केवल कर्म ही जन्म धारण करने में कारण हो, तो वह जीव बुरा जन्म जहाँ कि दुःख हो उसको धारण न करे, किन्तु सदा अच्छे-अच्छे जन्म धारण करे. जो कहो कर्म प्रतिबन्धक है, तो भी कर्म के जड़ होने से निरोधक वा प्रवर्त्तक नहीं हो सकते. इसलिए कर्म का फल प्रदाता परमेश्वर को मानना तुमको उचित है. जो कहो कि नशा के समान कर्म स्वयं परिणाम को प्राप्त होता है, तो विना किया हुआ कर्म परिणाम को प्राप्त क्यों नहीं होता? जो कहो कि जिसका जैसा स्वभाव है, वह वैसा ही होता है, तो विष विना खाये क्यों नहीं किसी को मारता? क्योंकि उसका परिणामी स्वभाव है. जो कहो संयोग के विना कर्म-परिणाम प्राप्त नहीं होता, तो जीव और कर्म को संयुक्त करनेवाला कोई तीसरा मानना पडे़गा. जो न मानोगे, तो जड़ का संयोग स्वतः नहीं हो सकता. इससे यह सिद्ध हुआ कि विना ईश्वर के कर्मफल व्यवस्था नहीं हो सकती. प्रश्न—जो कर्म से मुक्त होता है, वह ईश्वर कहाता है. उत्तर—जब अनादि काल से जीव के साथ कर्म लगे हैं तो मुक्त कैसे हो सकता है? और जिसको कर्म लगता है, वह ईश्वर ही नहीं. और कर्म, कर्त्ता का ‘समवाय’ अर्थात् नित्य सम्बन्ध होता है, यह कभी नहीं छूटता; इसलिये जैसा ९वें समुल्लास में लिख आये हैं, वैसा ही मानना ठीक है. जीव चाहै जैसा अपना ज्ञान और सामर्थ्य बढ़ावे, तो भी उसमें परिमितज्ञान और समीम सामर्थ्य रहेगा. ईश्वर के समान कभी नहीं हो सकता. हाँ जितना सामर्थ्य बढ़ना उचित है, उतना योग से बढ़ा सकता है. प्रश्न—कर्म का बन्ध सादि है. उत्तर—जो सादि है तो संयोग की आदि के पूर्व जीव निष्कर्म था. जब निष्कर्म को कर्म लग गया, तो जितने तुम्हारे निष्कर्म मुक्त जीव हैं, उनको भी कर्म लगके संसार में गिरेंगे. प्रश्न—जो पशुओं को मार यज्ञ में होम करने से पशु स्वर्ग में जाय, तो यजमानादि स्वयं अग्नि में अपने शरीर का होम कर स्वर्ग में क्यों नहीं जावें? उत्तर—यह बात वेदों की नहीं. अर्थात् पशु मारके होम करना आदि विधि वाममार्गियों ने बनाया है. परन्तु इसको कोई सज्जन मानता. परन्तु उन्हीं चार्वाक के मत की यह बात है. इसलिए जैनी लोग भी कुछ-कुछ चार्वाक के मत से भी मिलते हैं. प्रश्न—जैसे तूम्बी में से मट्टी थोड़ी निकलने से वह ऊपर आती है, वैसे जीव के कर्मबन्धन कम-कम होने से जीव की ऊ्ध्वगति होकर सिद्धशिला में जाते हैं. उत्तर—जैनियों ने ऊपर नीचे की बातें गमारूपन की समझ रक्खी हैं, जो विद्या होती, तो ऐसी निर्मूल बात क्योंकर मानते! देखो! जिसको हम ऊपर कहते हैं, उसी को उससे परे वाले लोग नीचा कहते हैं और जिसको हम नीचा कहते हैं, उसी को उससे नीचे रहने वाले ऊँचा कहते हैं. ऐसे ही अगल-बगल में रहने वाले की बात है. इसलिए सिद्धशिला और शिवपुर को मुक्ति स्थान मानना अविद्या की बात है. प्रश्न—हमारे मत में साधुओं को रागद्वेष नहीं. उत्तर—देखो! तुम्हारे मूल आवश्यक सूत्र में क्या लिखा है—अरिहन्ते सुयरागो सारीसूवं भयारीसु —इत्यादि अर्थात् अशुभ के छोड़ने में द्वेष, श्रेष्ठ और शुभ कामों में राग करना अच्छा. यह रागद्वेष किसी का नहीं छूटता. अर्थात् बुरे कामों पर द्वेष और अच्छे कामों में प्रीति करना बहुत अच्छी बात है. अब प्रकरणरत्नाकर के पहिले भाग में जो भी देवचन्द्रजी कृत नयचक्र-सार है, उसी की बातें लिखते हैं। जिसको सब जैन लोग मानते हैं। तत्र द्रव्यभेदा यथा जीवा अनन्ताः, तत्रैकस्मिन् द्रव्ये प्रतिप्रदेशे स्वरूप एककार्य्यकरणसामर्थ्यरूपा अनन्ता अविभागरूपपर्यायाः, एवं गुणा अप्यनन्ताः प्रतिगुणं प्रतिदेशं पर्यायाः, अप्यनन्ताः, प्रति वस्तूनि अनन्तास्ततोऽनन्तगुणसामर्थ्यपर्यायाः॥ —प्रकरणरत्नाकर भाग १ उत्तर—जीव अनन्त हैं, उनका ज्ञान किसी जीव का सामर्थ्य नहीं, केवल अटकरपच्चासी की बात है. अनन्त के स्थान में असंख्य कहता तो ठीक बात थी. क्योंकि हम जीव लोग जीवों की गणना नहीं कर सकते. अब एक-एक द्रव्य में अपने-अपने एक कार्यकरण सामर्थ्य को अविभाग पर्यायों से अनन्त मानना केवल अविद्या की बात है. क्योंकि जब एक परमाणु द्रव्य की सीमा है, तो उसमें अनन्त अविभाग रूप पर्याय कैसे रह सकते हैं. और एक-एक द्रव्य में अनन्त गुण और एक-एक गुण और प्रदेश में अविभागरूप अनन्त पर्याय का मानना केवल बालकों की बातें हैं. और एक-एक वस्तु में सामर्थ्य पर्याय भी अनन्त मानना केवल अविद्या की बात है. क्योंकि जिसके अधिकरण का अन्त है, उसमें अनन्त कभी नहीं रह सकता. जैसे जैनी कहते हैं कि छोटे से कन्द में अनन्त जीव हैं. जब कन्द का अन्त है तो जीवों का अन्त क्यों नहीं? जितनी विद्याशून्य मिथ्या बातें जैन के ग्रन्थों में है, उतनी अन्यत्र नहीं, और जहाँ कहीं हैं, उनका मूल जैनमार्ग है. एक उनका नवकार मन्त्र है। उसका स्वरूप— नमो अरिहन्ताणं नमो सिद्धाणं नमो आयरियाणं नमो उवज्झायाणं नमो लोए सव्वसाहूणं। एसो पंच नमुक्कारो सव्व पावप्पणासणो, मंगलाचरणं च सव्वेसिं पढमं हवइ मंगलम्॥ इस मन्त्र का अर्थ यह है— (नमो अरिहन्ताणं) सब तीर्थंकरों को नमस्कार. (नमो सिद्धाणं) जैनमत के सब सिद्धों को नमस्कार. (नमो आयरियाणं) जैन मत के सब आचार्यों को नमस्कार. (नमो उवज्झायाणं) जैनमत के सब उपाध्यायों को नमस्कार. (नमो लोए सब्बसाहूणं) जितने जैनमत के साधु इस लोक में हैं, उन सबको नमस्कार है. यद्यपि मन्त्र में जैनपद नहीं है तथापि जैनियों के अनेक ग्रन्थों में सिवाय जैनमत के अन्य किसी को नमस्कार भी न करना लिखा है. इसलिए यही अर्थ ठीक है. इसका ऐसा माहात्म्य धरा है कि तन्त्र, पुराण और भाटों की कथा को भी मात कर दिया है. अर्थात् इस मन्त्र के जप से सब पाप नष्ट हो जाते हैं. श्राद्धदिनकृत्य और आत्मनिन्दाभावना में इसका ऐसा फल लिखा है— नमुक्कारं तउ पढे॥९॥ तउ कब्बं मन्ताणमंतो परमो इमुत्ति धेयाणधेयं परमं इमुत्ति। तत्ताणतत्तं परमं पवित्तं संसार सत्ताण दुहाहयाणं॥१०॥ [ताणं अंनंतु नो अत्थि जीवाणं भवसायरे। बुड्डूं ताणं इमं मुत्तुं नमुक्कारं सुपोययम्॥११॥ कब्बं। अणेगजम्मं तरसं चिआणं। दुहाणं सारीरिअमाणु-साणुसाणुसाणं। कत्तोय भव्वाणभविज्जनासो न जावपत्तो नवकार-मंतो॥१२॥] सब मन्त्रों में यह पवित्र और परम मन्त्र है. ध्येयों के मध्य में परम ध्येय, तत्त्वों में परम तत्त्व, दुःख से पीड़ित संसारी जीवों का यह नवकार मन्त्र जैसी समुद्र के पार उतारने की नौका होती है उस नौका के समान है. संसार में डूबने वाले जीवों का एक यही रक्षक है. अनेक जन्मान्तर शरीर और मन सम्बन्धी दुःख भव्यजीवों के नहीं नष्ट होते, जब तक नवकार मन्त्र का ग्रहण न करे॥९-१२॥ अग्निप्रमुख आठ महाभय नहीं होते, भवसागर से तर जाते हैं. जैसे महारत्न वैडूर्य नामक मणि ग्रहण करने में आवे अथवा शत्रुभय में अमोघ शस्त्र ग्रहण करने में आवे, वैसे श्रुतकेवली का ग्रहण करे. और सब द्वादशाङ्गी का नवकार मन्त्र रहस्य है. [—श्रा॰दि॰कृ॰पृ॰ ३, सूत्र १३] समीक्षक—यह गपोड़ा नहीं तो क्या है? जो संसार में पाषाणादि मूर्तिपूजा चली है, वह सब बौद्ध और जैनियों से चली है कि जिसने सब जगत् को भरमाया है. देखलो! श्राद्धदिनकृत्य के पहिले पृष्ठ में लिखा है कि— सन्ध्या समय के भोजन में जिनबिम्ब अर्थात् उनकी मूर्तियों का पूजना, द्वारपूजा में बड़े-बड़े बखेड़े और नियम, मन्दिर बनाने और पुराने मन्दिरों की मरम्मत करने से मुक्ति हो जाती है. यह बीसवें पृष्ठ में और तेईसवें पृष्ठ में— मन्दिर में इस प्रकार जावे, जाकर बैठे, बड़े भाव, प्रीति से पूजा करे. “नमो जिनेन्द्रेभ्यः” इत्यादि मन्त्रों से स्नानादि करावे, जल, चन्दनादि चढावे. वैसे ही रत्नसारभाग के बारहवें पृष्ठ में मूर्त्तिपूजा का फल—पुजारी को राजा और प्रजा कोई न रोक सके. तेरहवें पृष्ठ में—मूर्त्तिपूजा से रोग, पीड़ा, महादोष छूट जाय. पांच कौड़ी का फूल चढाया, उसने १८ देश का राज पाया, उसका नाम कुमारपाल हुआ था, इत्यादि. समीक्षक—जो ये बातें सच्ची हों, तो जैनी लोगों में से राजा और प्रजा का दण्ड, रोग, पीड़ा क्यों भोगते? और महादोषों में क्यों फस रहे हैं. जो मूर्त्तिपूजा से भवसागर से छूट जाय तो ज्ञान, सम्यग्दर्शन और चारित्र की प्राप्ति क्यों करना? वाह! पांच कौड़ी के फूल चढाने से १८ देश का राज मिल जाये, तो सौ रुपये के फूल चढाने से क्या मिल जाय अर्थात् ब्रह्माण्ड में सब लोक-लोकान्तर का भी राजा होता है? और गोतम का अंगूठा धोके पीये तो अमृत का फल पावे. यह बारहवें पृष्ठ में लिखा है. तो जैनी लोग गोतम का अंगूठा धोकर पीके अमर क्यों नहीं हो जाते? अब इनकी मुक्ति का थोड़ा-सा वर्णन करते हैं— उसी रत्नसारभाग के २३वें पृष्ठ में [लिखा है] सिद्धशिला अर्थात् जिस पर सिद्धपुरुष रहते हैं, वह पैंतालीस लाख योजन लम्बी, पोली और आठ योजन चौड़ी है. एक करोड़, अस्सी लाख कोश लम्बी और पोली है और बत्तीस कोश चौड़ी है. वह सिद्ध शिला चौदहवें लोक की शिखा पर है. समीक्षक—यह बात महावीर तीर्थङ्कर के मुुख की है और यहीं शिवपुर का भी वर्णन किया है. भला! यह बात किसी बुद्धिमान् के मन में आ सकती है? जो यही मुक्ति का स्थान हो तो बन्धन हो जाय. क्योंकि इसके ऊपर और चारों ओर आकाश ही होगा. फिर उस धाम से बाहर जाने में डरते होंगे. और इतनी लंबी चौड़ी एक शिला जैनी के तीर्थङ्कर नाप और देख के कहने को आये होंगे. जो ऐसा ही हो तो अब क्यों नहीं कहने को आते? यह जैनी भी मुक्तिविषय में भ्रम से फसे हैं. यह सच है कि विना वेदों के यथार्थ अर्थबोध के मुक्ति के स्वरूप को कभी नहीं जान सकते. उसी रत्नसार पृष्ठ २९ में आबू, गिरनार, शत्रुञ्जय, शम्मेत शिखर आदि तीर्थ करें, वे धन्य हैं. और कर्म का क्षय मुक्ति पर्यन्त माना है. समीक्षक—यह भी बुद्धिमानों की समझ से सब प्रकार विरुद्ध है. और देखो! बड़ा पक्षपात और अन्धाधुन्ध लेख विवेकसार के ५५ पृष्ठ में—गंगादि तीर्थ और काशी आदि क्षेत्रों के सेवने से कुछ भी परमार्थ सिद्ध नहीं होता. समीक्षक—वाह रे जैनी लोगो! अपने जल, स्थल, पाषाणरूप मूर्त्ति आदि की सेवा से सब पाप क्षय और मुक्तिपर्यन्त फल मानो और दूसरे के जल, स्थल, पाषाणमूर्त्ति का खण्डन करो, यह अपनी मूर्खता, छल, झूठ, मतलबसिन्धु की बात नहीं तो क्या है? सच तो यह है कि तुम दोनों झूठे हो. जल, स्थल और पाषाणादि मूर्त्तियों से पापक्षय और मुक्ति कभी नहीं होती. यह इनका श्लोक है, जल, चन्दनादि चढाने का— जलचन्दनधूपनैरथदीपाक्षतकैर्नैवेद्यवस्त्रैः। उपचारवरैर्वयं जिनेन्द्रान् रुचिरैरद्य यजामहे॥१॥ [विवेकसार पृ॰ ५२] अर्थात् जल, चन्दन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्र, अतिरुचिकारक उत्तम उपचार से आनन्दपूर्वक जिनेन्द्रों अर्थात् तीर्थङ्कर की मूर्त्तियों की पूजा करते हैं॥१॥ समीक्षक—जितना यह पूजा का आडम्बर चला है, वह सब जैनों के घर से चला है. यह श्लोक विवेकसार के ५२ पृष्ठ में लिखा है. पृष्ठ १३६ विवेकसार में दशार्ण राजा चौबीसवें तीर्थङ्कर महावीर के दर्शन करने को गया. वहाँ कुछ अभिमान किया तो वहां महावीर के दर्शन को १६,७७,७२,१६००० इतने इन्द्र के स्वरूप और १३,३७,०५,७२, ८०,००००००० इतनी इन्द्राणी आई थीं. देखकर राजा आश्चर्य [में] हो गया. समीक्षक—अब विचारना चाहिये कि इन्द्र और इन्द्राणियों के खड़े रहने के लिए ऐसे-ऐसे कई भूगोल हों तो भी नहीं समा सकें. परन्तु इसमें ऐसा होगा कि कितने ही ग्रन्थकार के घर में बैठे होंगे. कितने ही उनके चेलों के घर में और कितने उनके कांधे पर बैठे होंगे और कितने ही पुकारते होंगे. अब इनके पक्षपात की बातें देखो! अपने तीर्थंकरों का जिन्होंने गृहाश्रम किया, पुत्रोत्पत्ति की, संसार भोगा, पश्चात् साधु हुये, उनका मान करते हैं. और विवेकसार १०३ पृष्ठ में श्री स्थूलभद्र स्वामी की कथा. रत्नसारभाग, पृष्ठ ११० में—ब्रह्मा, विष्णु, महादेव स्त्री के गुलाम बताये हैं. रत्नसारभाग, पृष्ठ १११ में—कृष्णादि नव वासुदेव और प्रह्लादादि प्रतिवासुदेव नरक में गये. रत्नसारभाग, पृष्ठ २०—ब्रह्मा, विष्णु, नारायण आदि सब कामी हैं, इसलिये इनको छोड़ने योग्य कहा है. समीक्षक—और जिन ऋषभदेव आदि ने विवाह कर गृहाश्रम भोगा, वे त्यक्तव्य क्यों नहीं? जो ये त्यक्तव्य नहीं तो नारायण आदि अच्छे क्यों नहीं? ऋषभदेव संसारदुःख के तरने के लिये काष्ठ की नौका के समान तारने वाले और महादेव, विष्णु आदि पत्थर की नौका के समान डुबाने वाले हैं. भला! यह झूठ, पक्षपात की बात जैसे कूंजरी अपने खट्टे बेरों को मीठे बतलाती है, वैसी यह क्या नहीं है? विवेकसार पृष्ठ २१—जिनमन्दिर में मोह नहीं आता. भवसागर के पार उतारने वाला है. विवेकसार पृष्ठ ५१ और ५२—मूर्त्तिपूजा से मुक्ति होती है और जैनमन्दिर में जाने से सद्गुण आते हैं. जो जल चन्दनादि से जिनमूर्त्तियों की पूजा करे वह नरक से छूट स्वर्ग को जाय. विवेकसार पृष्ठ ५५ में—जिनमन्दिर में ऋषभदेव आदि की मूर्त्तियों के पूजने से धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष सिद्ध होता है. विवेकसार पृष्ठ ६१ में—जिनमूर्त्तियों की पूजा से सब पाप छूट जाते हैं. पृष्ठ ६७ में—जिनमूर्त्तियों की पूजा करें तो जगत् के क्लेश छूट जांय. पृष्ठ ८१ में—श्री जिन की पूजा से सब पाप छूट जाते हैं. इत्यादि बड़े-बड़े विचित्र, असम्भव बातों के गपोड़े उड़ाये हैं. और यह भी विवेकसार के तीसरे पृष्ठ में लिखा है कि— जो ‘जिन’ की मूर्त्ति स्थापन करते हैं, उन आचार्यों ने अपनी और अपने कुटुम्ब की आजीविका चलाई है, ऐसा खण्डन भी करते हैं. और उसी ग्रन्थ के २२५ पृष्ठ में शिव, विष्णु आदि मूर्त्ति की पूजा करनी बहुत बुरी है अर्थात् नरक का साधन है. समीक्षक—भला! इनके पत्थर और जैनियों के पत्थरों में कुछ भेद है? जो कहै कि हमारी मूर्त्तियां त्यागी और शान्त हैं. भला! हम इनसे पूछते हैं कि तुम्हारी मूर्त्ति तो लाखों रुपये के मन्दिरों में रहतीं और चन्दन, पुष्पादि चढता है, इससे तो अधिक त्यागी और तपस्वी पहाड़ है. और तुम्हारी मूर्त्तियां नंगी मनुष्यों के बीच में लज्जाकारक हैं. भला! वे तो ऐब ढांक रखते हैं. इससे तुम दोनों मूर्त्तिपूजा छोड़ दो. सब मतों की मूर्त्तिपूजा व्यर्थ है. अब और देखिये लड़केपन की बातें. विवेकसार पृष्ठ १०१ में—एक नन्दीषेण ने दश पूर्व तक भोग किया. एक मुनि वेश्या के घर में रहा, भोग किया, फिर मुनि की दीक्षा ले, स्वर्ग को गया. और स्थूलभद्र मुनि भी ऐसा ही काम करके स्वर्ग को गया. विवेकसार पृष्ठ २२८ में—एक पुरुष ने कोशा वेश्या का भोग किया, पश्चात् त्यागी होकर स्वर्ग को गया. विवेकसार पृष्ठ १०१ में—अर्णकमुनि चरित्र से चूक, कई वर्ष दत्त सेठ के घर में भोग किया, पश्चात् देवलोक को गया. विवेकसार पृष्ठ १०६ में—श्रीकृष्ण तीसरे नरक में गये. विवेकसार पृष्ठ १४५ में—धन्वन्तरि वैद्य नरक को गया. और देखो विचित्र लीला! विवेकसार पृष्ठ १०६ में—श्री कृष्ण के पुत्र ढण्ढण मुनि को स्यालिया उठा लेगया और खा गया, पश्चात् देवता हुआ. जैनियों के सर्व तीर्थङ्कर और उनके गण तथा उनके शिष्य और जैनमतस्थ मनुष्य क्रोडान् क्रोड कोई शिवपुर, कोई सिद्धशिला, कोई देवलोक और कोई स्वर्ग में गये, परन्तु श्रीकृष्णादि और अन्य भी अनेक नरक को गये और जायंगे. समीक्षक—भला! अब विचारिये कि ये बातें! क्या जैनियों के ही हाथ में स्वर्ग-नरक की कुंजी है? इनको ऐसा महाझूठ लिखते बोलते लज्जा भी नहीं आई कि श्रीकृष्णादि महात्मा नरक में गये और इनके रण्डीबाज भी स्वर्ग और मुक्ति को चले गये. हम जानते हैं कि जितने झूठे, महामूर्ख, हठी और पक्षपाती जैनी लोगों में थे और हैं, वैसे अन्य लोगों में नहीं. भला! इन जैनियों के ऋषभदेवादि तीर्थङ्कर नरक में गये, महापापी थे और सब उनके चेले भी वैसे थे और हैं, ऐसा कोई लिखे वा कहे तो इनको कितना बुरा लगेगा. वैसा ही दूसरे का भी समझ लेना चाहिये. क्योंकि इन महाहठी, दुराग्रही, मूर्खों के संग से सिवाय बुराइयों के, अन्य कुछ भी पल्ले न पड़ेगा. हां! जो जैनियों में उत्तमजन हैं, उनसे सत्संगादि करने में कुछ भी दोष नहीं. और भी इनकी धर्म से उल्टी बातें सुनो. विवेकसार पृष्ठ ७ में—जो शुद्ध जिनवचन यथास्थितक है, उसी को सुगुरु अर्थात् अन्य को कुगुरु मानते हैं. विवेकसार पृष्ठ ४८ में—योगी, जंगम, काजी, मुल्ला कितने ही अज्ञान से तप कष्ट करके कुगति को पाते हैं. रत्नसार भा॰ १ पृष्ठ १७०-१७१ में लिखा है कि नव वासुदेव अर्थात् त्रिपृष्ठ वासुदेव, द्विपृष्ठ वासुदेव, स्वयंभू वासुदेव, पुरुषोत्तम वासुदेव, सिंहपुरुष वासुदेव, पुरुषपुण्डरीक वासुदेव, दत्त वासुदेव, लक्ष्मण वासुदेव और ९ श्रीकृष्ण वासुदेव ये सब ग्यारहवें, बारहवें, चौदहवें, पन्द्रहवें, अठारहवें, बीसवें और बाईसवें तीर्थकरों के समय नरक को गये. और नव प्रतिवासुदेव अर्थात् अश्वग्रीव प्रतिवासुदेव, तारक प्रतिवासुदेव, मोदक प्रतिवासुदेव, मधु प्रतिवासुदेव, निशुम्भ प्रतिवासुदेव, बली प्रतिवासुदेव, प्रह्लाद प्रतिवासुदेव, रावण प्रतिवासुदेव और जरासन्ध प्रतिवासुदेव ये भी सब नरक को गये. विवेकसार पृष्ठ १५४ में—अदेवा गुरवो धर्मेषु या देवगुरुधर्मधीः। यह श्री हेमचन्द्र सूरि ने लिखा है. अर्थात् ब्रह्मादि अदेव, जैन से भिन्न मार्ग के उपदेशक अगुरु और जैनधर्म से भिन्न सब अधर्म, इनमें देवगुरु, धर्मबुद्धि करना मिथ्यादृष्टि, चौथे गुण ठाणे वाले, असंयति, अविरति, रजोहरणादि साधुवेश रहित जीवों को सम्यग् दृष्टि कहते हैं तो रजोहरणादि भगवान् का वेश तथा शुद्ध धर्म, जैनमार्ग का उपदेशक सम्यग् दृष्टि क्यों कहाता है? विवेकसार पृष्ठ १५६ में—लिङ्गधारी अर्थात् वेशधारी मात्र का भी सत्कार श्रावक लोग करें. चाहे वे शुद्ध चरित्र हों वा अशुद्ध चरित्र. विवेकसार पृष्ठ १६८ में—जैन साधु चरित्रहीन भी हो तो भी अन्य साधुओं से श्रेष्ठ ही है. विवेकसार पृष्ठ १७१ में—श्रावक लोग जैन के साधुओं को धर्मरहित भ्रष्ट देखकर भी निस्नेह न होने चाहियें. विवेकसार पृष्ठ १९४ में—जैन मत में स्थित होना सार, शेष सब संसार के मत असार. विवेकसार पृष्ठ १९६ में—अन्य मत की अभिलाषा जैनी को न करनी चाहिए. उनकी बात सुनने में भी दोष है. विवेकसार पृष्ठ २१६ में—एक चोर ने पांच मूठी लोच के चारित्र ग्रहण किया. बड़ा कष्ट और पश्चात्ताप किया. छठे महीने में केवलज्ञान पाके सिद्ध हो गया. विवेकसार पृष्ठ २२१ में—अन्य मत वाले को खाने-पीने की चीज़ भी न देनी चाहिये. विवेकसार पृष्ठ २२१ में—१. ‘परमती की स्तुति’ अर्थात् उनका गुण कीर्तन, २. ‘नमस्कार’ उनको वन्दना, ३. ‘आलपन’ अर्थात् उनसे थोड़ा बोलना, ४. ‘संलपन’ अर्थात् उनसे वार-वार बोलना, ५. ‘अन्नादिदान’ अर्थात् उनको खाने-पीने की चीज देना, ६. ‘गन्धपुष्पादिदान’ अर्थात् परमती की प्रतिमा के पूजने के लिये गन्ध, पुष्प देना. ये छः यतना अर्थात् इन छः कर्मों को जैनी लोगों को नहीं करना चाहिये। ऐसे इनके सब ग्रन्थों में लिखा है. समीक्षक—अब बुद्धिमानों को यहां विचार करना चाहिये कि जैसे जैनमती दूसरे मत के विरोधी, निन्दक, हानिकारक हैं, वैसे दूसरे मत के नहीं हैं. जहां देखो, वहां बहुधा अपने मत की प्रशंसा स्तुति और दूसरे मतवालों की निन्दाओं से इनके ग्रन्थों का खजाना भरा है. सच है जो ऐसा जाल न रचते, तो ऐसे विद्याविरुद्ध अज्ञानियों के मत में फसकर बन्धन में फसे क्योंकर रहते. इसीलिये जैनीलोग कुत्ते आदि को तो लड्डू लप्सी खिलावें, परन्तु दूसरे मत के मनुष्यों में प्रीति करने वाला करोड़ों में एक आध है. अब देखिये! इनका साधु कैसा ही भ्रष्ट-ष्ट हो तो भी उत्तम, और दूसरा चाहे कितना भी श्रेष्ठ हो, तो कुछ नहीं समझते. यद्यपि विवेकसार पृष्ठ २१७ में—अनुकम्पा अर्थात् दुःखियों का निष्कारण दुःख दूर करने की इच्छा अर्थात् कुछ प्रयोजन न विचारना कि मुझको स्वर्ग, देवलोक वा मुक्ति होगी, ऐसे ही इच्छा करनी. यह कहने मात्र है वा कोई कभी जैनमत में आग्रह न होगा वा किसी के दबाव से करता होगा, वह जानो नहीं करने के समान है. क्योंकि— ‘प्रयोजनमननुदिश्य मन्दोऽपि न प्रवर्त्तते’ इति न्यायात्। अर्थात् प्रयोजन के विना किसी की भी प्रवृत्ति नहीं होती है. विवेकसार पृष्ठ १०८ में लिखा है कि मथुरा के राजा के नमुची नामक दीवान को जैनमतियों ने अपना विरोधी समझकर मार डाला और आलोयणा करके शुद्ध हो गये. यह भी दया और क्षमा का नाशक कर्म है. जब अन्य मतवालों पर प्राण लेने पर्यन्त वैर बुद्धि रखते हैं तो इनको दयालु के स्थान पर हिंसक कहना ही सार्थक है. और भी देखो इनकी मिथ्या बातें! जिन तीर्थंकरों को जैन लोग सम्यग्ज्ञानी और परमेश्वर मानते हैं, उनकी मिथ्या बातों के ये नमूने हैं—रत्नसार भाग १ के पृष्ठ १४५—इस ग्रन्थ को जैन लोग मानते हैं, और यह ईसवी सन् १८७९ अप्रैल तारीख २८ में बनारस जैनप्रभाकर प्रेस में नानकचन्द जती ने छपवा कर प्रसिद्ध किया है, उसके पूर्वोक्त पृष्ठ [एवं पृष्ठ १४६-१४७] में काल की इस प्रकार व्याख्या की है— ‘समय’ का नाम सूक्ष्मकाल है. असंख्यात समयों को ‘आवलि’ कहते हैं. एक क्रोड़, सड़सठ लाख, सतत्तर सहस्र, दो सौ सोलह आवलियों का एक ‘मुहूर्त्त’ होता है. तीस मुर्हूर्त्तों का एक ‘दिवस’, वैसे पन्द्रह दिवसों का एक ‘पक्ष’, वैसे दो पक्षों का एक ‘महीना’, वैसे बारह महीनों का एक ‘वर्ष’ होता है. सत्तर लाख क्रोड़ और छप्पन सहस्र करोड़ वर्षों का एक ‘पूर्व’, असंख्यात पूर्वों का एक ‘पल्योपम’ काल. असंख्यात इसको कहते हैं कि—एक चार कोश का चौरस और गहिरा भी चार कोश के खाढे में जुगुलिये मनुष्य के शरीर के निम्नलिखित बालों के टुकड़ों से भरना. अर्थात् वर्त्तमान मनुष्य के शरीर के बालों से जुगुलिये मनुष्य के बाल चार हजार छानवें भाग सूक्ष्म हैं. अर्थात् जुगुलिये मनुष्यों के चार सहस्र छानवें बालों को इकट्ठे करने से मनुष्यों का एक बाल होता है. ऐसे जुगुलिये मनुष्यों के एक बाल का एक अङ्गुल टुकड़ा सात वार करना, फिर उसके आठ-आठ टुकड़े करना, तो २२९३७६ अर्थात् दो लाख उनत्तीस सहस्र तीन सौ छियत्तर एक बाल के इतने टुकड़े होते हैं. ऐसे टुकड़ों से वह कुआ भरना, सौ वर्ष के अन्तरे एक एक टुकड़ा निकालना, जब सब टुकड़े निकल जावें और कुआ खाली हो जाय, वह भी संख्यात काल है. और एक-एक टुकड़े का असंख्यात टुकड़ा करना, टुकड़ा करके, उसी कुए को ऐसा ठस भरना कि ऊपर से चक्रवर्त्ती राजा की सेना चली जाय, तो भी दबे नहीं. उन टुकड़ों में से एक सौ वर्ष में एक टुकड़ा निकालना, जब वह कुआ खाली हो जाय, तब उसका नाम असंख्यात. असंख्यात पूर्व पड़ें, तब एक ‘पल्योपम’. वह पल्योपम कुआ के दृष्टान्त से जानना. जब दशकरोड़ान् करोड़ पल्योपम काल बीत जायें, तब एक ‘सागरोपम’ होता है. जब दशकरोड़ान् करोड़ सागरोपम काल व्यतीत हो जायें, तब एक ‘उत्सर्प्पिणी’ काल हो. जब दश करोड़ान् करोड़ उत्सर्पिणीकाल व्यतीत हो जायें तब एक अवसर्पिणी काल हो. एक उत्सर्प्पिणी और अवसर्प्पिणी काल व्यतीत हो जाय तब एक ‘कालचक्र’ हो. अनन्त कालचक्र व्यतीत होंवे तब एक ‘पुद्गलपरावर्त्त’ होता है. अब अनन्तकाल किसको कहते हैं कि जो सिद्धान्त पुस्तकों में नव दृष्टान्तों से काल की संख्या कही है, उससे उपरान्त ‘आनन्तकाल’ कहाता है. वैसे अनन्त पुद्गलपरावर्त्त काल जीव को भ्रमते हुए बीते हैं. सुनो भाई! गणितविद्यावाले लोगो! जैनियों के ग्रन्थों की कालसंख्या कर सकोगे वा नहीं? और तुम इसको सच भी मान सकोगे वा नहीं? देखो! इन तीर्थंकरों ने ऐसी गणितविद्या पढ़ी थी. ऐसे-ऐसे तो इनके मत में गुरु और शिष्य हैं, जिनकी अविद्या का कुछ पारावार नहीं. और भी इनका अन्धेर सुनो— रत्नसार भाग १ पृष्ठ १३४ से लेके जो कुछ ‘बूट्टाबोल’ अर्थात् जैनियों के सिद्धान्तग्रन्थ जो कि उनके ‘तीर्थंकर’ अर्थात् ऋषभदेव से लेके महावीर पर्य्यन्त चौबीस हुए हैं, उनके वचनों का सारसंग्रह है, ऐसा रत्नसारभाग पृ. १४८ में लिखा है कि—पृथिवीकाय के जीव मट्टी पाषाणादि पृथिवी के भेद जानना. उनमें रहनेवाले जीवों का शरीर का परिमाण एक अङ्गुल का असंख्यातवाँ भाग समझना, अर्थात् अतीव सूक्ष्म होते हैं. उनका आयुमान अर्थात् वे अधिक से अधिक २२ सहस्र वर्ष पर्यन्त जीते हैं. रत्नसार पृष्ठ १४९—वनस्पति के एक शरीर में अनन्त जीव होते हैं, वे साधारण वनस्पति कहाती हैं. जो कि कन्दमूलप्रमुख और अनन्तकायप्रमुख होते हैं, उनको साधारण वनस्पति के जीव कहने चाहिएँ. उनका आयुमान अन्तर्मुहूर्त्त होता परन्तु यहाँ पूर्वोक्त इनका मुहूर्त्त समझना चाहिए. और एक शरीर में जो ‘एकेन्द्रिय’ अर्थात् स्पर्श इन्द्रिय इनमें है और उसमें एक जीव रहता है, उसको प्रत्येक-वनस्पति कहते हैं. उसका देहमान एक सहस्र योजन अर्थात् ४ सहस्र कोश का शरीर होता है, उसका आयुमान अधिक से अधिक दश सहस्र वर्ष का होता. अब दो इन्द्रियवाले जीव अर्थात् एक उनका शरीर और एकमुख जो शंखादि उनका शरीर १२ योजन का जानना. वैसे ही [तीन इन्द्रिय वाले] कीड़ी-मकोड़ादि का [शरीर] ३ तीन कोश का जानना. और चतुरिन्द्रिय भ्रमरादि का शरीर ४ कोश का और पञ्चेन्द्रिय एक सहस्र योजन अर्थात् ४ सहस्र कोश के शरीरवाले जानना॥२६७॥ समीक्षक—चार-चार सहस्र कोश के प्रमाणवाले शरीर हों तो भूगोल में तो बहुत थोड़े मनुष्य अर्थात् सैकड़ों मनुष्यों से भूगोल ठस भर जाय, किसी को चलने की जगह भी न रहे. फिर वे जैनियों से रहने का ठिकाना और मार्ग पूछें। और जो इन्होंने लिखा है, तो अपने घर में रख लें। परन्तु चार सहस्र कोश के शरीरवाले को निवासार्थ कोई एक के लिए ३२ सहस्र कोश का घर तो चाहिए। ऐसे एक घर के बनाने में जैनियों का सब धन चुक जाय, तो भी घर न बन सके. इतने बड़े आठ सहस्र कोश की छत्त बनाने के लिए लट्ठे कहाँ से लावेंगे? और जो उसमें खंभा लगावें तो वह भीतर प्रवेश भी नहीं कर सकता। इसलिए ऐसी बातें मिथ्या हुआ करती हैं॥ २६६-२६७॥ ते थूला पल्ले विहु. संखिज्जाचेवहुंति सव्वेवि. ते इक्किक्क असंखे. सुहुमे खंडे पकप्पेह॥ ४॥ —प्रकरण॰ भा॰ ४। लघुक्षेत्रसमासप्रकरण ४॥ अर्थ—पूर्वोक्त एक अंगुल लोम के खण्डों से ४ कोश का चौरस और उतना ही गहिरा कुआ हो, अंगुल प्रमाण लोम का खण्ड सब मिलके २२९३७६ दो लाख उनत्तीस सहस्र तीन सौ छिहत्तर होते हैं और अधिक से अधिक (३३०७६२१०४, २४६५६२५, ४२१९९६०, ९७५३६००, ०००००००) तैंतीस करोड़ा-करोड़ी, सात लाख बासठ हजार एक सौ चार करोड़ा-करोड़ी, चौवीस लाख पैंसठ हजार छः सौ पच्चीस इतने करोड़ा-करोड़ी तथा बयालीस लाख उन्नीस हज़ार नौ सौ साठ इतनी करोड़ा-करोड़ी तथा सत्तानवे लाख त्रेपन हजार और छः सौ क्रोड़ाक्रोड़ी, इतनी वाटला घन जोजन पल्योपम में सर्व स्थूल रोम खण्ड की संख्या होवे, यह भी संख्यातकाल होता है। पूर्वोक्त एक-एक लोम खण्ड के असंख्यात खंड मन से कल्पे तब असंख्यात सूक्ष्म रोमाणु होवें॥४॥ समीक्षक—अब देखिये इनकी गिनती की रीति! एक अंगुल प्रमाण लोम के कितने खंड किये! यह कभी किसी की गिनती में आ सकते हैं? और उसके उपरान्त मन से असंख्य खंड कल्पते हैं, इससे पूर्वोक्त खंड जैनियों ने हाथों से किये होंगे, ऐसा विदित होता है. यह बात कभी सम्भव नहीं॥ ४॥ जंबूद्वीव पमाणं गुलजोयाण लरक वट्ट विरकंभो. लवणाई यासेसा. वलयाभा दुगुण दुगुणाय॥१२॥ —प्र॰ भा॰ ४ लघुक्षेत्रस॰ १२॥ अर्थ—प्रथम जम्बूद्वीप का लाख योजन का प्रमाण और पोला है। और बाकी लवणादि सात समुद्र तथा सात द्वीप, जम्बूद्वीप के प्रमाण से दुगुणे-दुगुणे हैं। इस एक पृथिवी में जम्बूद्वीपादि सात द्वीप और सात समुद्र हैं, जैसे कि पूर्व लिख आये हैं॥१२॥ समीक्षक—अब जम्बूद्वीप से दूसरा द्वीप दो लाख योजन, तीसरा चार लाख योजन, चौथा आठ लाख योजन, पाँचवाँ सोलह लाख योजन, छठा बत्तीस लाख योजन और सातवाँ चौसठ लाख योजन और उतने प्रमाण वा उनसे अधिक समुद्र के प्रमाण से इस पन्द्रह सहस्र [कोश] परिधिवाले भूगोल में क्योंकर समा सकते हैं? इससे यह बात केवल मिथ्या है॥ १२॥ कुरु नइ चुलसी सहसा. छच्चेवंतर नईउ पइ विजयं. दो दो महा नईउ. चउ दस सहसाउ पत्तेयं॥६३॥ प्रकरणरत्ना॰ भा॰ ४, लघुक्षेत्रस॰ ६3॥ अर्थ—कुरुक्षेत्र में ८४ चौरासी सहस्र नदी हैं॥६3॥ समीक्षक—भला, कुरुक्षेत्र बहुत छोटा देश है, उसको न देखकर एक मिथ्या बात लिखने में इनको लज्जा भी न आई॥ ६3॥ जामुत्तराउ ताउ. इगेग सिंहासणाउ अइपुव्वं. चउसुवि तासु नियासण, दिसिभवजिणमज्जणं होइ॥ ११९॥ —प्र॰ भा॰ ४। लघुक्षेत्रस॰ सू॰ ११९॥ अर्थ—उस शिला के विशेष दक्षिण और उत्तर दिशा में एक-एक सिंहासन जानना चाहिये। उन शिलाओं के नाम दक्षिण दिशा में अति-पाण्डु-कम्बला, उत्तर दिशा में अति-रक्त-कम्बला शिला है। उन सिंहासनों पर तीर्थङ्कर बैठते हैं॥११९॥ समीक्षक—देखिये इनके तीर्थङ्करों के जन्मोत्सवादि करने की शिला को! ऐसी ही मुक्ति की सिद्धशिला है। ऐसी इनकी बहुत बातें गोलमाल पोलपाल बहुत-सी हैं, कहाँ तक लिखें?॥ ११९॥ किन्तु जल छान के पीना, और सूक्ष्म जीवों पर नाममात्र दया करना, रात्रि को भोजन न करना ये तीन बातें अच्छी हैं। बाकी जितना इनका कथन है, सब असम्भवग्रस्त है। इतने ही लेख से बुद्धिमान् लोग बहुत सा जान लेंगे, यह थोड़ा सा दृष्टान्तमात्र लिखा है. जो इनकी असम्भव सब बातें लिखें तो इतने पुस्तक हो जायें कि एक पुरुष आयुभर में पाठ भी न कर सके. इसलिये एक हण्डे में चुड़ते चावलों में से एक चावल की परीक्षा से कच्चे वा पक्के हैं, सब चावल विदित हो जाते हैं। ऐसे ही इस थोड़े से लेख से सज्जन लोग बहुत सी बातें समझ लेंगे। बुद्धिमानों के सामने बहुत लिखना आवश्यक नहीं। क्योंकि दिग्दर्शनवत् सम्पूर्ण आशय को बुद्धिमान् लोग जान ही लेते हैं। इसके आगे ईसाइयों के मत के विषय में लिखा जायगा। इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिनिर्मिते सत्यार्थप्रकाशे सुभाषाविभूषिते नास्तिकमतान्तर्गतचार्वाक- बौद्धजैनमतखण्डनमण्डनविषये द्वादशः समुल्लासः सम्पूर्णः॥१२॥

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