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सत्यार्थ प्रकाशद्वादश समुल्लास
नास्तिक मत समीक्षा

द्वादश समुल्लास

चार्वाक, बौद्ध और जैन मतों के सिद्धांतों की विस्तृत परीक्षा।

द्वादश समुल्लास

ओ३म्

अनुभूमिका (२)

जब आर्य्यावर्त्तस्थ मनुष्यों में सत्याऽसत्य का यथावत् निर्णय कारक वेदविद्या छूटकर अविद्या फैलके मतमतान्तर खड़े हुए, यही जैन आदि के विद्याविरुद्धमतप्रचार का निमित्त हुआ। क्योंकि ‘वाल्मीकीय’ और ‘महाभारतादि’ में जैनियों का नाममात्र भी नहीं लिखा और जैनियों के ग्रन्थों में ‘वाल्मीकीय’ और भारत में कथित ‘राम-कृष्णादि’ की गाथा बड़े विस्तारपूर्वक लिखी हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि यह मत इनके पीछे चला, क्योंकि जैसा अपने मत को बहुत प्राचीन जैनी लोग लिखते हैं, वैसा होता तो वाल्मीकीय आदि ग्रन्थों में उनकी कथा अवश्य होती, इसलिये जैनमत इन ग्रन्थों के पीछे चला है।

कोई कहे कि जैनियों के ग्रन्थों में से कथाओं को लेकर वाल्मीकीय आदि ग्रन्थ बने होंगे तो उनसे पूछना चाहिये कि वाल्मीकीय आदि में तुम्हारे ग्रन्थों का नाम लेख भी क्यों नहीं? और तुम्हारे ग्रन्थों में क्यों है? क्या पिता के जन्म का दर्शन पुत्र कर सकता है? कभी नहीं। इससे यही सिद्ध होता है कि जैन-बौद्ध मत; शैव-शाक्तादि मतों के पीछे चला है।

अब इस १२ बारहवें समुल्लास में जो-जो जैनियों के मतविषयक लिखा गया है, सो-सो उनके ग्रन्थों के पतेपूर्वक लिखा है। इसमें जैनी लोगों को बुरा न मानना चाहिये, क्योंकि जो-जो हमने इनके मतविषय में लिखा है, वह केवल सत्याऽसत्य के निर्णयार्थ है, न कि विरोध वा हानि करने के अर्थ। इस लेख को जब जैनी, बौद्ध वा अन्य लोग देखेंगे तब सबको सत्याऽसत्य के निर्णय में विचार और लेख करने का समय मिलेगा और बोध भी होगा। जबतक वादी-प्रतिवादी होकर प्रीति से वाद वा लेख न किया जाय तबतक सत्याऽसत्य का निर्णय नहीं हो सकता। जब विद्वान् लोगों में सत्याऽसत्य का निश्चय नहीं होता तभी अविद्वानों को महा अन्धकार में पड़कर बहुत दुःख उठाना पड़ता है, इसलिये सत्य के जय और असत्य के क्षय के अर्थ सुहृदता से वाद वा लेख करना हम मनुष्य जाति का मुख्य काम है। यदि ऐसा न हो तो मनुष्यों की उन्नति कभी न हो सके।

और यह बौद्ध-जैन मत का विषय विना इनके अन्य-मतवालों को अपूर्व लाभ और बोध करनेवाला होगा, क्योंकि ये लोग अपने पुस्तकों को किसी अन्य मतवाले को देखने, पढ़ने वा लिखने को भी नहीं देते। बड़े परिश्रम से मेरे और विशेष आर्यसमाज मुम्बई के मन्त्री ‘सेठ सेवकलाल कृष्णदास’ के पुरुषार्थ से ग्रन्थ प्राप्त हुए हैं। तथा काशीस्थ ‘जैनप्रभाकर’ यन्त्रालय में छपने और मुम्बई में ‘प्रकरणरत्नाकर’ ग्रन्थ के छपने से भी सब लोगों को जैनियों का मत देखना सहज हुआ है।

भला, यह किन विद्वानों की बात है कि अपने मत के पुस्तक आप ही देखना और दूसरों को न दिखलाना? इसी से विदित होता है कि इन ग्रन्थों के बनानेवालों को प्रथम ही शङ्का थी कि इन ग्रन्थों में असम्भव बातें हैं, जो दूसरे मतवाले देखेंगे तो खण्डन करेंगे और हमारे मतवाले दूसरों के ग्रन्थ देखेंगे तो इस मत में श्रद्धा न रहेगी।

अस्तु, जो हो परन्तु बहुत मनुष्य ऐसे हैं, कि जिनको अपने दोष तो नहीं दीखते, किन्तु दूसरों के दोष देखने में अति उद्युक्त रहते हैं। यह न्याय की बात नहीं, क्योंकि प्रथम अपने दोष देख निकालके पश्चात् दूसरे के दोषों में दृष्टि देके निकालें।

अब इन बौद्ध-जैनियों के मत का विषय सब सज्जनों के सन्मुख धरता हूँ, जैसा है, वैसा विचारें।

किमधिकलेखेन बुद्धिमद्वर्य्येषु

अथ द्वादशसमुल्लासारम्भः

अथ नास्तिकमतान्तर्गतचार्वाकबौद्धजैनमत- खण्डनमण्डनविषयान् व्याख्यास्यामः

कोई एक ‘बृहस्पति’ नामा पुरुष हुआ था जो वेद, ईश्वर और यज्ञादि उत्तम कर्मों को भी नहीं मानता था। देखिये! उनका मत—

यावज्जीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥
[सर्वदर्शनसंग्रह चार्वाकदर्शन]

कोई मनुष्यादि प्राणी मृत्यु के अगोचर नहीं है अर्थात् सबको मरना है, इसलिये जबतक शरीर में जीव रहै, तबतक सुख से रहै। जो कोई कहे कि “धर्माचरण से कष्ट होता है, जो धर्म को छोड़ें तो पुनर्जन्म में बड़ा दुःख पावें।” उसको ‘चार्वाक’ उत्तर देता है कि अरे भोले भाई! जो मरे के पश्चात् शरीर भस्म हो जाता है कि जिसने खाया-पीया है, वह पुनः संसार में न आवेगा। इसलिये जैसे हो सके वैसे आनन्द में रहो, लोक में नीति से चलो, ऐश्वर्य्य को बढ़ाओ और उससे इच्छित भोग करो। यही लोक समझो, परलोक कुछ नहीं।

देखो! पृथिवी, जल, अग्नि, वायु इन चार भूतों के परिणाम से यह शरीर बना है, इसमें इनके योग से चैतन्य उत्पन्न होता है। जैसे मादक द्रव्य खाने-पीने से मद (नशा) उत्पन्न होता है, इसी प्रकार जीव शरीर के साथ उत्पन्न होकर शरीर के नाश के साथ आप भी नष्ट हो जाता है, फिर किसको पाप-पुण्य का फल होगा?

तच्चैतन्यविशिष्टदेह एव आत्मा देहातिरिक्त आत्मनि प्रमाणाभावात्॥ [चार्वाक दर्शन]

इस शरीर में चारों भूतों के संयोग से जीवात्मा उत्पन्न होकर उन्हीं के वियोग के साथ ही नष्ट हो जाता है, क्योंकि मरे पीछे कोई भी जीव प्रत्यक्ष नहीं होता। हम एक प्रत्यक्ष ही को मानते हैं, क्योंकि प्रत्यक्ष के विना अनुमानादि होते ही नहीं। इसलिए मुख्य प्रत्यक्ष के सामने अनुमानादि गौण होने से उनका ग्रहण नहीं करते। सुन्दर स्त्री के आलिङ्गन से आनन्द का करना पुरुषार्थ का फल है।

उत्तर—ये पृथिव्यादि भूत जड़ हैं, उनसे चेतन की उत्पत्ति कभी नहीं हो सकती। जैसे अब माता-पिता के संयोग से देह की उत्पत्ति होती है, वैसे ही आदि सृष्टि में मनुष्यादि शरीरों की आकृति परमेश्वर कर्त्ता के विना कभी नहीं हो सकती। मद के समान चेतन की उत्पत्ति और विनाश नहीं होता, क्योंकि मद चेतन को होता है, जड़ को नहीं। पदार्थ ‘नष्ट’ अर्थात् अदृष्ट होते हैं परन्तु अभाव किसी का नहीं होता, इसी प्रकार अदृश्य होने से जीव का भी अभाव न मानना चाहिये। जब जीवात्मा सदेह होता है तभी उसकी प्रकटता होती है। जब शरीर को छोड़ देता है, तब यह शरीर जो मृत्यु को प्राप्त हुआ है, वह जैसा चेतनयुक्त पूर्व था, वैसा नहीं हो सकता। यही बात बृहदारण्यक में कही है—

नाहं मोहं ब्रवीमि अनुच्छित्तिधर्मायमात्मेति॥ [तुलना—अ॰ ४।ब्रा॰ ५। कं॰ १४]

याज्ञवल्क्य कहते हैं कि “हे मैत्रेयि! मैं मोह से बात नहीं करता किन्तु आत्मा अविनाशी है, जिसके योग से शरीर चेष्टा करता है।” जब जीव शरीर से पृथक् हो जाता है तब शरीर में ज्ञान कुछ भी नहीं रहता। जो देह से पृथक् आत्मा न हो, तो जिसके संयोग से चेतनता और वियोग से जड़ता होती है वह देह से पृथक् है। जैसे आँख सबको देखती है परन्तु अपने को नहीं, इसी प्रकार प्रत्यक्ष का करनेवाला अपने ऐन्द्रिय प्रत्यक्ष नहीं कर सकता। जैसे अपनी आँख से सब घट-पटादि पदार्थ देखता है, वैसे आँख को अपने ज्ञान से देखता है। जो द्रष्टा है वह द्रष्टा ही रहता है, दृश्य कभी नहीं होता। जैसे विना आधार आधेय, कारण के विना कार्य्य, अवयवी के विना अवयव और कर्त्ता के विना कर्म नहीं रह सकते, वैसे कर्त्ता के विना प्रत्यक्ष कैसे हो सकता है?

जो सुन्दर स्त्री के साथ समागम करने ही को पुरुषार्थ का फल मानो तो क्षणिक सुख और उससे दुःख भी होता है, वह भी पुरुषार्थ ही का फल होगा। जब ऐसा है तो स्वर्ग की हानि होने से दुःख भोगना पड़ेगा। जो कहो दुःख के छुड़ाने और सुख के बढ़ाने में यत्न करना चाहिये तो मुक्ति-सुख की हानि हो जाती है, इसलिये वह पुरुषार्थ का फल नहीं।

चार्वाक—जो दुःख-संयुक्त सुख का त्याग करते हैं, वे मूर्ख हैं। जैसे धान्यार्थी धान्य का ग्रहण और बुस का त्याग करता है, वैसे इस संसार में बुद्धिमान् सुख का ग्रहण और दुःख का त्याग करें। क्योंकि इस लोक के उपस्थित सुख को छोड़के अनुपस्थित स्वर्ग के सुख की इच्छा कर धूर्तकथित वेदोक्त अग्निहोत्रादि कर्म, उपासना और ज्ञानकाण्ड का अनुष्ठान परलोक के लिये करते हैं, वे अज्ञानी हैं। जो परलोक है ही नहीं, तो उसकी आशा करना मूर्खता का काम है। क्योंकि—

अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम्। बुद्धिपौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पतिः॥ [चार्वाकदर्शन]

चार्वाकमतप्रचारक ‘बृहस्पति’ कहता है कि—“अग्निहोत्र, तीन वेद, three दण्ड और भस्म का लगाना बुद्धि और पुरुषार्थरहित पुरुषों ने जीविका बना ली है।” किन्तु काँटे लगने आदि से उत्पन्न हुए दुःख का नाम ‘नरक’, लोकसिद्ध राजा ‘परमेश्वर’ और देह का नाश होना ‘मोक्ष’, अन्य कुछ भी नहीं है।

उत्तर—विषयरूपी सुखमात्र को पुरुषार्थ का फल मानकर विषयदुःख-निवारणमात्र में कृतकृत्यता और स्वर्ग मानना मूर्खता है। अग्निहोत्रादि यज्ञों से वायु, वृष्टि, जल की शुद्धि द्वारा आरोग्यता का होना, उससे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की सिद्धि होती है, उसको न जानकर वेद, ईश्वर और वेदोक्त धर्म की निन्दा करना धूर्तों का काम है। जो त्रिदण्ड और भस्मधारण का खण्डन है, सो ठीक है।

यदि कण्टकादि से उत्पन्न ही दुःख का नाम नरक हो तो उससे अधिक महारोगादि नरक क्यों नहीं? यद्यपि राजा को ऐश्वर्यवान् और प्रजापालन में समर्थ होने से श्रेष्ठ मानें, तो ठीक है परन्तु जो अन्यायकारी पापी राजा हो, उसको भी परमेश्वरवत् मानते हो, तो तुम्हारे जैसा कोई भी मूर्ख नहीं। शरीर का विच्छेद होना मात्र मोक्ष है, तो गदहे, कुत्ते आदि और तुममें क्या भेद रहा, किन्तु आकृति ही मात्र भिन्न रही।

चार्वाक और अन्य नास्तिकों का विचार

अग्निरुष्णो जलं शीतं समस्पर्शस्तथाऽनिलः।
केनेदं चित्रितं तस्मात् स्वभावात्तद्व्यवस्थितिः॥१॥
न स्वर्गो नाऽपवर्गो वा नैवात्मा पारलौकिकः।
नैव वर्णाश्रमादीनां क्रियाश्च फलदायिकाः॥२॥
पशुश्चेन्निहतः स्वर्गं ज्योतिष्टोमे गमिष्यति।
स्वपिता यजमानेन तत्र कस्मान्न हिंस्यते॥३॥
मृतानामपि जन्तूनां श्राद्धं चेत्तृप्तिकारणम्।
गच्छतामिह जन्तूनां व्यर्थं पाथेयकल्पनम्॥४॥
स्वर्गस्थिता यदा तृप्तिं गच्छेयुस्तत्र दानतः।
प्रासादस्योपरिस्थानामत्र कस्मान्न दीयते॥५॥
यावज्जीवेत्सुखं जीवेदृणं कृत्वा घृतं पिबेत्।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः॥६॥
यदि गच्छेत्परं लोकं देहादेष विनिर्गतः।
कस्माद् भूयो न चायाति बन्धुस्नेहसमाकुलः॥७॥
ततश्च जीवनोपायो ब्राह्मणैर्विहितस्त्विह।
मृतानां प्रेतकार्याणि न त्वन्यद्विद्यते क्वचित्॥८॥
त्रयो वेदस्य कर्त्तारो भण्डधूर्तनिशाचराः।
जर्फरीतुर्फरीत्यादि पण्डितानां वचः स्मृतम्॥९॥
अश्वस्यात्र हि शिश्नन्तु पत्नीग्राह्यं प्रकीर्त्तितम्।
भण्डैस्तद्वत्परं चैव ग्राह्यजातं प्रकीर्त्तितम्॥१०॥
मांसानां खादनं तद्वन्निशाचरसमीरितम्॥११॥
[चार्वाकदर्शन, श्लोक ११-१२। श्लोक १४-२२]

‘चार्वाक’, ‘आभाणक’, ‘बौद्ध’ और ‘जैन’ भी जगत् की उत्पत्ति स्वभाव से मानते हैं। जो-जो स्वाभाविक गुण हैं, उस-उससे द्रव्य संयुक्त होकर सब पदार्थ बनते हैं, कोई जगत् का कर्त्ता नहीं॥१॥ परन्तु इनमें से चार्वाक ऐसा मानता है। किन्तु परलोक और जीवात्मा बौद्ध-जैन मानते हैं, चार्वाक नहीं। शेष इन तीनों का मत कोई-कोई बात छोड़के एक सा है। न कोई स्वर्ग, न कोई नरक और न कोई परलोक में जानेवाला आत्मा है और न वर्णाश्रम की क्रिया फलदायक है॥२॥ जो यज्ञ में पशु को मार होम करने से वह स्वर्ग को जाता हो, तो यजमान अपने पिता आदि को मार यज्ञ में होम करके स्वर्ग को क्यों नहीं भेजता?॥३॥

जो मरे हुए जीवों को श्राद्ध और तर्पण तृप्तिकारक होता है तो परदेश में जानेवाले मार्ग में निर्वाहार्थ अन्न, वस्त्र, धन को क्यों ले जाते? ले[जा]ना व्यर्थ हो जाय। क्योंकि जैसे मृतक के नाम से अर्पण किया हुआ स्वर्ग में पहुँचता है, तो परदेश में जानेवालों के लिए उनके सम्बन्धी भी घर में अर्पण कर देशान्तर में पहुँचा देवें। जो यह नहीं पहुँचता, तो स्वर्ग में क्योंकर पहुँच सकता है?॥४॥ जो मर्त्यलोक में दान करने से स्वर्गवासी तृप्त होते हैं, तो नीचे देने से घर के ऊपर स्थित पुरुष तृप्त क्यों नहीं होता?॥५॥

इसलिए जबतक जीवे, तबतक सुख से जीवे। जो घर में पदार्थ न हो तो ऋण करके आनन्द करे, ऋण देना नहीं पड़ेगा। क्योंकि जिस शरीर में जीव ने खाया-पीया है, उन दोनों का पुनरागमन न होगा, फिर किससे कौन माँगे और देवेगा?॥६॥ जो लोग कहते हैं कि मृत्युसमय जीव शरीर से निकलके परलोक को जाता है, यह बात मिथ्या है, क्योंकि जो ऐसा होता, तो कुटुम्ब के मोह से बद्ध होकर पुनः घर में क्यों नहीं आ जाता?॥७॥ इसलिए यह सब ब्राह्मणों ने अपनी जीविका का उपाय किया है। जो दशगात्रादि मृतकक्रिया करते हैं, यह सब उनकी जीविका की लीला है॥८॥ वेद के करनेहारे भांड, धूर्त्त और राक्षस, ये तीन हैं। ‘जर्फरी’ ‘तुर्फरी’ इत्यादि पण्डितों के धूर्त्ततायुक्त वचन हैं॥९॥

देखो धूर्त्तों की रचना! “घोड़े के लिङ्ग को स्त्री ग्रहण करे।” उसके साथ समागम यजमान की स्त्री से कराना, कन्या से ठट्ठा आदि लिखना, धूर्त्तों के विना नहीं हो सकता॥१०॥ और जो मांस का खाना लिखा है, वह वेदभाग राक्षस का बनाया है॥११॥

उत्तर—विना चेतन परमेश्वर के निर्माण किये जड़ पदार्थ आपस में स्वभाव से नियमपूर्वक मिलकर उत्पन्न नहीं हो सकते। इस वास्ते सृष्टि का कर्त्ता अवश्य होना चाहिये। जो स्वभाव से हों तो द्वितीय पृथिवी, सूर्य, चन्द्र आप से आप क्यों नहीं होते॥१॥ ‘स्वर्ग’ सुखभोग और ‘नरक’ दुःखभोग का नाम है। जो जीवात्मा न होता, तो सुख-दुःख का भोक्ता कौन हो सके? जैसे इस समय सुख-दुःख का भोक्ता जीव है, वैसे परजन्म में भी होता है। क्या सत्यभाषणादि दया आदि क्रिया भी वर्णाश्रमियों की निष्फल होगी? कभी नहीं॥२॥

पशु मारके होम करना वेद में कहीं नहीं है, इसलिये यह खण्डन अखण्डनीय है और मृतकों का श्राद्ध भी कपोलकल्पित होने से वेदविरुद्ध पुराण मत-वालों का है॥३, ४, ५॥ जो वस्तु है, उसका अभाव कभी नहीं होता। तो विद्यमान जीव का अभाव कभी नहीं हो सकता। देह भस्म हो जाता है, जीव नहीं। जीव तो दूसरे शरीर में जाता है, इसलिए जो कोई ऋणादि पाप से सुख भोग करेगा, वह दूसरे जन्म में अवश्य भोगेगा॥६॥ देह से निकलके जीव स्थानान्तर और शरीरान्तर [को] प्राप्त होता है, उसको पूर्वजन्म का ज्ञान कुछ भी नहीं रहता, इसलिए पुनश्च कुटुम्ब में नहीं आता॥७॥ हाँ ब्राह्मणों ने प्रेत का कर्म जीविका के लिये किया है, वेदोक्त नहीं॥८॥

जो चार्वाक आदि ने असल वेद देखे होते, तो वेद की निन्दा कभी न करते। भाँड, धूर्त्त और निशाचरवत् पुरुष टीकाकार हुए हैं, उन्हीं की धूर्त्तता है, वेद की नहीं। परन्तु शोक है चार्वाक, आभाणक, बौद्ध और जैनियों पर कि इन्होंने मूल वेद न सुने, न देखे और न किसी विद्वान् से पढ़े, इसीलिए भ्रष्ट टीका और वाममार्गियों की लीला देखके वेदों से विरोध करके, नष्ट-भ्रष्ट बुद्धि होकर वेदों की निन्दा करने लगे हैं। यही वाममार्गियों की दुष्ट चेष्टा चार्वाक, बौद्ध और जैन मत के होने का कारण है, क्योंकि चार्वाक आदि भी वेदों का सत्य अर्थ [नहीं जान सके]॥९॥ भला! विचार करना चाहिए कि स्त्री [से] अश्व के उपस्थ ग्रहण आदि लीला, और मांस का खाना आदि टीकाकारों की धूर्तता है, वेद की नहीं। सिवाय वाममार्गी लोगों के अन्य भ्रष्ट, वेदार्थ से विपरीत, अशुद्ध व्याख्यान कौन करता? ॥ १०। ११॥

यही चार्वाक बौद्धों के होने का कारण है, क्योंकि बौद्ध लोगों ने चार्वाकों में से बहुत-सा चार्वाकों का मत और थोड़ा-सा अपना भी गाँठ का लगाया है, इसी से बौद्धों की शाखा पृथक् चली है।

बौद्धमत की समीक्षा

अब बौद्धमत के विषय में संक्षेप से लिखते हैं—

कार्य्यकारणभावाद्वा स्वभावाद्वा नियामकात्।
अविनाभावनियमो दर्शनान्तरदर्शनात्॥ [सर्वदर्शनसंग्रह बौद्धदर्शन]

‘कार्य्यकारणभाव’ अर्थात् कार्य्य के दर्शन से कारण और कारण के दर्शन से कार्य्यादि का साक्षात्कार प्रत्यक्ष से शेष में अनुमान होता है, इसके विना प्राणियों के सम्पूर्ण व्यवहार पूर्ण नहीं हो सकते, इत्यादि लक्षण से अनुमान को अधिक मानकर चारवाक से भिन्न शाखा बौद्धों की हुई, अन्य बहुत-सी बातें चारवाकों की ली हैं। ये बौद्ध चार प्रकार के होते हैं— एक ‘माध्यमिक’, दूसरा ‘योगाचार’, तीसरा ‘सौत्रान्तिक’ और चौथा ‘वैभाषिक’। ‘बुद्ध्या निर्वर्त्तते सः बौद्धः’ जो बुद्धि से सिद्ध हो अर्थात् जो-जो बात अपनी बुद्धि में आवे उस-उस को माने और जो न आवे उसको न मानते।

इनमें से पहला ‘माध्यमिक’ सर्वशून्य मानता है। अर्थात् जितने पदार्थ हैं, वे सब ‘शून्य’ हैं अर्थात् आदि में नहीं होते, अन्त में नहीं रहते, मध्य में जो प्रतीत होता है वह भी प्रतीत समय में है, पश्चात् शून्य हो जाता है। जैसे उत्पत्ति के पूर्व घट नहीं था, प्रध्वंस के पश्चात् नहीं रहता और घटज्ञान समय में भासता और पदार्थान्तर में ज्ञान जाने से घटज्ञान नहीं रहता, इसलिए शून्य ही एक तत्त्व है, ऐसा मानता है।

दूसरा ‘योगाचार’ जो बाह्य शून्य मानता है। अर्थात् पदार्थ भीतर ज्ञान में भासते हैं, बाहर नहीं। जैसे घट का ज्ञान आत्मा में है तभी मनुष्य कहता है कि “यह घट है”, जो भीतर ज्ञान न हो तो नहीं कह सकता, ऐसा मानता है।

तीसरा ‘सौत्रान्तिक’ जो बाहर अर्थ का अनुमान मानता है, क्योंकि बाहर कोई पदार्थ साङ्गोपाङ्ग प्रत्यक्ष नहीं होता किन्तु एकदेश प्रत्यक्ष होने से शेष में अनुमान किया जाता है, इसका ऐसा मत है।

चौथा ‘वैभाषिक’ है, उसका मत बाहर पदार्थ प्रत्यक्ष होता है, भीतर नहीं। जैसे ‘अयं नीलो घटः’ इस प्रतीति में नीलयुक्त घटाकृति बाहर प्रतीत होती है, यह ऐसा मानता है। यद्यपि इनका आचार्य्य बुद्ध उपदेष्टा जनानेवाला एक था तथापि सुननेवाले पुरुषों और शिष्यों के बुद्धिभेद से चार प्रकार शाखा हो गई हैं।

उत्तर—जो सब शून्य हो तो शून्य का जाननेवाला शून्य नहीं होता और जो सब शून्य होवे तो शून्य को शून्य नहीं जान सके, इसलिए शून्य का ज्ञाता और ज्ञेय शून्य दो पदार्थ सिद्ध होते हैं। और जो योगाचार बाह्य-शून्यत्व मानता है तो पर्वत इसके भीतर होना चाहिये। जो कहे कि पर्वत भीतर है तो उसके हृदय में पर्वत के समान अवकाश कहाँ है? इसलिए बाहर पर्वत है और पर्वतज्ञान आत्मा में रहता है। सौत्रान्तिक किसी पदार्थ को प्रत्यक्ष नहीं मानता, तो वह आप स्वयं और उसका वचन भी अनुमेय होना चाहिये, प्रत्यक्ष नहीं। जो प्रत्यक्ष न हो तो ‘अयं घटः’ यह प्रयोग न होना चाहिये, किन्तु ‘अयं घटैकदेशः’ यह घड़ा का एक देश है और एक देश का नाम घड़ा नहीं, किन्तु समुदाय का नाम घट है। ‘यह घड़ा है’ वह प्रत्यक्ष है, अनुमेय नहीं। चौथा वैभाषिक जो बाह्य पदार्थों को प्रत्यक्ष मानता है, वह भी ठीक नहीं। क्योंकि जहाँ ज्ञाता और ज्ञान होता है, वहीं प्रत्यक्ष होता है। अर्थात् आत्मा में सबका प्रत्यक्ष होता है।

क्षणिकवाद: जो क्षणिक पदार्थ और उसका ज्ञान क्षणिक हो तो ‘प्रत्यभिज्ञा’ अर्थात् ‘मैंने वह बात की थी’ अथवा ‘वह चीज देखी थी’ स्मरण न होना चाहिये, परन्तु पूर्व दृष्ट-श्रुत का स्मरण होता है, इसलिये क्षणिकवाद भी ठीक नहीं। जो सब दुःख ही हो और सुख न हो तो सुख की अपेक्षा के विना दुःख सिद्ध नहीं हो सकता, इसलिये सबको दुःख मानना ठीक नहीं।

सर्वस्य संसारस्य दुःखात्मकत्वं सर्वतीर्थङ्करसंम्मतम्॥ [बौद्धदर्शन]

[सब संसार दुःखमय है, यह सब तीर्थंकरों का मत है।] जिनको बौद्ध तीर्थंकर मानते हैं, उन्हीं को जैन भी मानते हैं, इसीलिये ये दोनों एक हैं। और पूर्वोक्त ‘भावनाचतुष्टय’ अर्थात् चार भावनाओं से सकल वासनाओं की निवृत्ति से शून्यरूप ‘निर्वाण’ अर्थात् मुक्ति मानते हैं। अपने शिष्यों को ‘योग’ और ‘आचार’ का उपदेश करते हैं। और चित्तचैत्तात्मक स्कन्ध पांच प्रकार का मानते हैं— रूपविज्ञानवेदनासंज्ञासंस्कारसंज्ञकः॥ [बौद्धदर्शन]

उनमें से प्रथम स्कन्ध—जो इन्द्रियों से रूपादि विषय ग्रहण किया जाता है, वह ‘रूपस्कन्ध’। (दूसरा) आलयविज्ञान, प्रवृत्ति अर्थात् जिसमें रूपादि विषय रहते हैं उनका विज्ञान-प्रवृत्ति का जाननारूप व्यवहार को ‘विज्ञानस्कन्ध’। (तीसरा) रूपस्कन्ध और विज्ञानस्कन्ध से उत्पन्न हुआ सुख-दुःख आदि प्रतीतिरूप व्यवहार को ‘वेदनास्कन्ध’। (चौथा) गौ आदि संज्ञा का सम्बन्ध नामी के साथ मानने रूप को ‘संज्ञास्कन्ध’। (पाँचवाँ) वेदनास्कन्ध से रागद्वेषादि क्लेश और क्षुधा-तृषादि उपक्लेश, मद, प्रमाद, अभिमान, धर्म और अधर्मरूप व्यवहार को ‘संस्कारस्कन्ध’ मानते हैं।

द्वादशायतनपूजा: ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्चैव तथा कर्मेन्द्रियाणि च। मनो बुद्धिरिति प्रोक्तं द्वादशायतनं बुधैः॥४॥ [बौद्धदर्शन] अर्थ—पाँच ‘ज्ञानेन्द्रिय’, पाँच ‘कर्मेन्द्रिय’, मन और बुद्धि इन ही का ‘सत्कार’ अर्थात् इनको आनन्द में प्रवृत्त रखना बौद्धों का मत है॥४॥

उत्तर—जो सब संसार दुःखरूप होता तो किसी जीव की प्रवृत्ति न होनी चाहिये। संसार में जीवों की प्रवृत्ति प्रत्यक्ष दीखती है, इसलिये सब संसार दुःखरूप नहीं हो सकता किन्तु इसमें सुख-दुःख दोनों हैं। जो पंच स्कन्ध कहे हैं, वे भी अपूर्ण हैं। जो द्वादशायतनपूजा मोक्ष का साधन कहा तो जब इन्द्रिय और अन्तःकरण की पूजा मोक्षप्रद है तो विषयीजन और बौद्धों में क्या भेद रहा? फिर मुक्ति कहाँ? इसलिये इनका मत सर्वांश सत्य नहीं।

जैनमत की समीक्षा

यहाँ से आगे जैनमत का वर्णन है, इसको जैन लोग मानते हैं। प्रकरणरत्नाकर १ भाग, नयचक्रसार में निम्नलिखित बातें लिखी हैं—

जैनी लोग धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय, आकाशास्तिकाय, पुद्गलास्तिकाय, जीवास्तिकाय और काल ये छः द्रव्य मानते हैं।

१. ‘धर्मास्तिकाय’ जो जीव और पुद्गल की गति का हेतु है। २. ‘अधर्मास्तिकाय’ जो स्थिति के आश्रय का हेतु है। ३. ‘आकाशास्तिकाय’ जो सब द्रव्यों का आधार और सर्वव्यापी है। ४. ‘पुद्गलास्तिकाय’ जो कारणरूप सूक्ष्म परमाणु है। ५. ‘जीवास्तिकाय’ जो चेतनालक्षण कर्त्ता भोक्ता है। ६. ‘काल’ जो नवीन-प्राचीनता का चिह्नरूप है।

समीक्षक—जैनियों का मानना ठीक नहीं। क्योंकि धर्माऽधर्म द्रव्य नहीं किन्तु जीव के गुण हैं। एक जीव को चेतन मानकर ईश्वर को न मानना, जैन-बौद्धों की मिथ्या पक्षपात की बात है। विना चेतन परमेश्वर के निर्माण किये जड़ परमाणु आपस में स्वभाव से नियमपूर्वक मिलकर उत्पन्न नहीं हो सकते।

सप्तभङ्गी न्याय और स्याद्वाद: जैनी लोग सप्तभङ्गी न्याय मानते हैं— स्यादस्ति जीवोऽयं प्रथमो भङ्गः (है जीव), स्यान्नास्ति (नहीं है जीव जड़ में), स्यादस्ति नास्तिरूपो (जब शरीर धारण करे तब प्रसिद्ध, पृथक् हो तब अप्रसिद्ध), स्यादवक्तव्यो (कहने योग्य नहीं), स्यादस्ति च अवक्तव्यो, स्यान्नास्ति च अवक्तव्यो, स्यादस्ति नास्ति अवक्तव्यो।

समीक्षक—यह कथन एक अन्योऽन्याभाव में साधर्म्य और वैधर्म्य में चरितार्थ हो सकता है। इस सरल प्रकरण को छोड़कर कठिन जाल-रचना केवल अज्ञानियों के फसाने के लिए होती है। जैन लोग जीव के विना दूसरा चेतनतत्त्व ईश्वर को नहीं मानते। ‘कोई भी अनादि सिद्ध ईश्वर नहीं’, ऐसा बौद्ध-जैन लोग मानते हैं।

अनादि देव का स्वरूप: जैनी लोग अपने तीर्थंकरों (ऋषभदेव से महावीर पर्यन्त) ही को केवली और परमेश्वर मानते हैं। चन्द्रसूरि ने ‘आप्तनिश्चयालङ्कार’ में लिखा है— सर्वज्ञो वीतरागादिदोषस्त्रैलोक्यपूजितः। यथा स्थितार्थवादी च देवोऽर्हन् परमेश्वरः॥१॥

उत्तर—जो तीर्थङ्करों को परमेश्वर मानते हो तो उनके माता पिता को उत्पन्न किसने किया था? जो कहो कि वे स्वभाव से हुये थे, तो अब भी स्वभाव से मनुष्य क्यों नहीं होते? जो देशकाल से परिच्छिन्न वस्तु होता है, वह एकदेशी होता है, वह सर्वज्ञ नहीं हो सकता। इसलिये तीर्थंकरों को ईश्वर मानना भ्रम है।

जैनियों के नव तत्त्व: जीवाजीवौ पुण्यपापे चास्रवः संवरोऽपि च। बन्धो निर्जरणं मुक्तिरेषां व्याख्याऽधुनोच्यते॥३॥ १. जीव, २. अजीव, ३. पुण्य, ४. पाप, ५. आस्रव (कर्मों का योग), ६. संवर, ७. बन्ध, ८. निर्जरण (बन्ध छुड़ाना), ९. मुक्ति (अष्टकर्मों का क्षय)।

जैन साधुओं के लक्षण: सिर के बाल लूँच डालें (केशलुञ्चन), धूल झाड़ने की चमरी रक्खें, श्वेताम्बर या दिगम्बर रहें। दिगम्बरों का मत है कि स्त्रियों को मोक्ष नहीं मिलता, जबकि श्वेताम्बर कहते हैं मिलता है।

समीक्षक—जो जीव को अनादिकाल बन्ध है, वह कभी न छूट सकेगा। और मुक्ति सब कर्मों के छूटने से तुम मानते हो, तो वह नैमित्तिक हुई, जो सदा नहीं रह सकती। इसलिये तुम्हारे तीर्थंकर भी फिर जन्म लेंगे। कर्म का फल प्रदाता परमेश्वर को मानना तुमको उचित है, विना उसके कर्मफल व्यवस्था नहीं हो सकती।

नवकार मन्त्र का माहात्म्य: नमो अरिहन्ताणं...। जैनी लोग कहते हैं इस मन्त्र के जप से सब पाप नष्ट हो जाते हैं। श्राद्धदिनकृत्य में लिखा है कि मन्दिर बनाने और पुराने मन्दिरों की मरम्मत करने से मुक्ति हो जाती है।

समीक्षक—यह गपोड़ा नहीं तो क्या है? जो संसार में पाषाणादि मूर्तिपूजा चली है, वह सब बौद्ध और जैनियों से चली है। पांच कौड़ी का फूल चढाने से १८ देश का राज मिल जाये, तो सौ रुपये के फूल चढाने से क्या मिल जाय? इतनी अविद्यायुक्त बातें इनके सिद्धान्तग्रन्थों में भरी हैं।

अद्भुत भूगोल और काल: रत्नसार भाग १ में लिखा है—ऋषभदेव का शरीर ५०० धनुष् लम्बा और ८४ लाख पूर्व का आयु। वैसे ही १३२ सूर्य और १३२ चन्द्रमा जम्बूद्वीप में मानते हैं। ५० करोड़ योजन की पृथिवी मानते हैं।

समीक्षक—ये बातें भूगोल-खगोल और गणितविद्या के विरुद्ध हैं। इतने बड़े शरीरवाले मनुष्य इस भूगोल में समा ही नहीं सकते। और इतने सूर्य-चन्द्र तपें तो सब जल मरे। यह सब अविद्या का फल है।

परमतद्वेष: विवेकसार पृष्ठ २२१ में लिखा है—परमती की स्तुति, नमस्कार, आलाप, सँलाप, अन्नदान और गन्धपुष्पादिदान—इन छः यतनाओं को जैनी न करें। अर्थात् जैनमत से भिन्न किसी का सत्कार न करें।

समीक्षक—इससे सिद्ध होता है कि जैनमती दूसरे मत के महान् विरोधी और निन्दक हैं। जहाँ देखो, वहाँ अपने मत की प्रशंसा और दूसरे की निन्दा भरी है। इनका दया-धर्म केवल नाममात्र है, क्योंकि अन्य मत वालों के प्रति इनके हृदय में अतीव द्वेष है।

निष्कर्ष: जैनी लोग जल छान के पीयें, सूक्ष्म जीवों पर दया करें, रात्रि को भोजन न करें—ये तीन बातें तो अच्छी हैं। बाकी जितना इनका कथन है, सब असम्भवग्रस्त है। बुद्धिमानों के सामने बहुत लिखना आवश्यक नहीं, क्योंकि एक चावल की परीक्षा से सब चावल विदित हो जाते हैं। इसी प्रकार इस थोड़े से लेख से सज्जन लोग जैन-बौद्ध मत के सम्पूर्ण आशय को जान लेंगे।

इति श्रीमद्दयानन्दसरस्वतीस्वामिककृते सत्यार्थप्रकाशे
सुभाषाविभूषिते नास्तिकमतान्तर्गतचार्वाक-
बौद्धजैनमतखण्डनमण्डनविषये
द्वादशः समुल्लासः सम्पूर्णः॥१२॥

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